CONSUMER MOVEMENT
Saturday, 21 March 2026
CONSUMER MOVEMENT : विश्व की अर्थव्यवस़्था किस करवट बैठने जा रही है।
Monday, 6 May 2024
मंहगी दवाओं का उच्चतम न्यायालय संज्ञान ले
बाबा रामदेव की पतंजलि के विरूद्ध धूम-धड़ाके के साथ भ्रामक विज्ञापनों पर नकेल कसने की कार्यवाही करने के साथ ही उच्चतम न्यायालय के माननीय न्यायाधीश द्वय हिमा कोहली तथा अहसानुद्दीन अमानुल्लाह ने याचिकाकर्ता द्वारा किए जाने वाले अनैतिक कृत्यों पर भी पूरा संज्ञान लेते हुए, IMA से यह पूछ लिया कि उसके सदस्य डाक्टर जो मरीजों को मंहगी और अनावश्यक दवायें अपने prescription में लिखते हैं, उसके लिए उनकी संस्था क्या कर रही है। माननीय न्यायालय की इस टिप्पणी से IMA अध्यक्ष आर वी अशोक तिलमिला गए और वह बाबा रामदेव से भी बड़ी ग़लती कर बैठे। अब यह देखना दिलचस्प होगा कि माननीय न्यायालय बाबा रामदेव और आचार्य बालकृष्ण की तरह आर वी अशोक की भी नाक रगड़वाता है या नहीं, वैसे उच्चतम न्यायालय ने IMA अध्यक्ष के बारे में पूरी तैयारी कर इशारा दे दिया है।
सिर्फ IMA सच्चा
जब बाबा रामदेव के वकील मुकुल रोहतगी ने अदालत के संज्ञान में यह बात लाई कि इधर अभी मामला लंबित है, उधर याचिकाकर्ता समाचार पत्रों में साक्षात्कार देकर माननीय उच्चतम न्यायालय की आलोचना कर रहा है। अपने साक्षात्कार में IMA अध्यक्ष ने कहा है - "न्यायालय हमारी तरफ उंगली क्यों उठा रहा है, उच्चतम न्यायालय की यह टिप्पणियां दुर्भाग्यपूर्ण और अनावश्यक हैं।" इस पर माननीय न्यायालय ने कहा - "आप पूरे साक्षात्कार को अदालत के रिकॉर्ड पर लाइये, अब तक जो हुआ है, यह उससे भी अधिक गंभीर है। अतः गंभीर परिणाम भुगतने के लिए तैयार रहिए।" मुकुल रोहतगी ने कहा कि वह IMA अध्यक्ष के विरुद्ध अवमानना की अर्जी दाखिल करेंगे।
मंहगी दवाओं का कारण
मंहगी दवाओं और ईलाज के संबंध में उच्चतम न्यायालय का स्वत: संज्ञान लेना स्वागत योग्य कदम है। इसके लिए माननीय न्यायालय ने केन्द्रीय और सभी राज्यों के स्वास्थ्य सचिवों को नोटिस जारी कर उनसे जानकारी मांगी है कि उन्होंने अब तक इस बारे में कौन से कदम उठाए हैं। माननीय अदालत इस तथ्य पर ध्यान दें कि "डब्बा बंद वस्तु अधिनियम" के प्रावधानों में सभी पैक की गई वस्तुओं पर MRP लिखने का प्रावधान तो है, परंतु यह MRP लिखने के संबंध में कोई दिशा निर्देश नहीं हैं। जिसके कारण निर्माता के मन में जो भी आता है, वह उतनी MRP लिख देता है। यही वजह है बाजार में दवायें MRP पर 20 से 40% तक छूट पर बेची जाती हैं। अतः यह आवश्यक है कि उच्चतम न्यायालय केंद्र और राज्य सरकारों को MRP लिखने के लिए नियम बनाने का निर्देश दे, ताकि वस्तुओं पर युक्ति संगत MRP लिखी जाये तथा मरीज मंहगी दवाओं और ईलाज से मुक्ति पा सकें। उदाहरण के रूप मे वस्तुओं पर MRP लिखने के लिए मूल्य सूत्र इस प्रकार बनाया जा सकता है, जिसका मुख्य आधार निम्न हो -
दवा का उत्पादन मूल्य + दवा की बिक्री पर आने वाला खर्च + उचित लाभ = MRP
भ्रामक विज्ञापनों का सरताज IMA
वैसे गौरतलब बात यह है कि जिस प्रकार के भ्रामक विज्ञापनों के लिए IMA पतंजलि और बाबा रामदेव को उच्चतम न्यायालय में खींच कर ले गया। उस प्रकार के भ्रामक विज्ञापनों के जरिए ग्राहकों को को लूटने के अभियान चलाने के लिए IMA का इतिहास भरा पड़ा है। लाखों करोड़ों रुपए लेकर विभिन्न उत्पादों का बिना कोई परीक्षण किए, अपने लोगो(Logo) और संदेश के साथ ग्राहकों को खरीदने के लिए कहना, क्या भ्रामक विज्ञापनों की श्रेणी में नहीं आता है। माननीय उच्चतम न्यायालय इसका संज्ञान ले। IMA पेप्सिको के ट्रापिकाना जूस, नाश्ते के लिए क्यूआकेर ओट्स, क्राम्पटन ग्रीव्स के LED बल्ब, एशियन पेंट्स के बनाये पेंट, डिटाल साबुन, केन्ट के बनाये वाटर प्यूरीफायर पर मोटी मोटी रकम वसूल कर, अपना लोगो व समर्थन लिखकर ग्राहकों को पूरी तरह भ्रमित कर रही है। यह बात सिर्फ हम नहीं कह रहे, 28 मई 2015 को टाईम्स ऑफ इंडिया में छपे एक समाचार के अनुसार, इन सभी भ्रामक विज्ञापनों के विरोध में IMA के सदस्यों ने ही आवाज उठाई थी। उन्होंने यह भी माना था कि विज्ञापित इन वस्तुओं की गुणवत्ता तथा दावा किये गये लाभदायक परिणामों की सत्यता का परीक्षण करने के लिए I MA के पास कोई प्रयोगशाला या परीक्षण सुविधा नहीं है। IMA काम के लिए दाम लेकर इन सभी विज्ञापनों में दी गई वस्तुओं की भ्रामक पुष्टि कर रहा है।
Thursday, 6 April 2023
कृषि कानूनों की वापसी किसानों पर भारी पड़ रही है।
वर्ष 2020-21 का किसान आंदोलन और तीनों कृषि कानूनों को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी द्वारा वापस लिए जाने को देश भूल चुका है, क्यों ना भूले किसान जो चाहते थे, उन्हें वह मिल गया। बाकी देश का उससे लेना-देना भी क्या, जो उसे याद रखे। आंदोलन के समय विभिन्न समूह और सरकार लगातार यह बात कहते रहे कि यह तीनों कानून किसानों के हित में हैं। कानूनों के प्रावधानों से किसानों को कोई परेशानी है, उन पर चर्चा कर उन्हें बदला जा सकता है। परंतु किसान आंदोलन का नेतृत्व किसान नहीं कर रहे थे। मोदी विरोधी राजनीतिक दलों के हाथ में इस किसान आंदोलन का नेतृत्व था, जिसके तार विदेशों तक फैले थे, जो मोदी को असफल और परेशान देखना चाहते थे। वह किसी भी तरह मोदी को नीचा दिखाना चाहते थे। अतः वह किसानों को बेवकूफ बनाते रहे, किसान इन विपक्षी नेताओं के झांसे में आकर उनका दिया झुनझुना बचाते बजाते रहे। अंततः मोदी सरकार ने 19 नवंबर 2021 को तीनों कृषि कानून वापस ले लिए।
सरकार की इस कार्यवाही से विपक्षी राजनीतिक दलों की तो बांछे खिल गई। उनको विजेता होने का एहसास भी हुआ। जिसकी पूरी कीमत किसानों ने चुकाई। परंतु किसान ना तो यह समझ पाया, ना ही यह सोच पाया कि उसने क्या खोया है या उसे क्या मिला है। इसी कशमकश में किसान 1 वर्ष बाद फिर अपनी 70 वर्ष पुरानी उन्हीं खस्ताहाल मांगों और समस्याओं को लेकर दिल्ली के मुहाने को ताकने के लिए मजबूर है। तीनों कृषि कानूनों की वापसी न तो सरकार की हार थी और ना ही विपक्षी राजनीतिक दलों की जीत। कानूनों की यह वापसी किसानों की बहुत बड़ी हार थी। किसानों की फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने की दिशा में सरकार के द्वारा किए जाने वाले प्रयास को किसानों ने खुद ही पलीता लगा दिया। वह भी विपक्षी राजनीतिक दलों और बाजार के दलालों के बहकावे में आकर।
तीनो कृषि कानून, ग्राहक और किसान
ग्रामीण आर्थिक संरचना से संबंधित कोई नया कानून बनाने या किसी प्रचलित कानून को बदलने से पहले, सरकारों को यह ध्यान रखना चाहिए कि ग्रामीण संरचना के लिए बनाए जाने वाले आर्थिक कानूनों का स्वरूप विशुद्ध रूप से आर्थिक नहीं हो सकता। इन कानूनों को आर्थिक-सामाजिक स्वरूप के रूप में ही लिया जाना चाहिए। इसी आधार पर इनको सही तरीके से विकसित कर लागू किया जा सकता है। इसी स्वरूप में इन कानूनों को लागू करने पर सफलता व आशा के अनुरूप परिणाम प्राप्त किए जा सकते हैं। सरकार द्वारा तीनों कृषि कानूनों को लागू करते समय बस यही चूक हो गई। जिसका पूरा लाभ विपक्षी राजनीतिक दलों और उनकी विचारधारा से प्रभावित किसान नेताओं ने किसानों को बरगला कर उठाया। जिसके कारण अंततः सरकार को किसानों के लाभ के लिए बनाए तीनों कृषि कानूनों को वापस लेना पड़ा। यदि पूर्व में ही इन कानूनों की आधारभूत आर्थिक- सामाजिक संरचना को लेकर कुछ कार्य कर लिया जाता। किसानों को आने वाले सामाजिक बदलाव के बारे में कल्पना दे दी जाती या इन कानूनों को लागू करने के लिए एक सामाजिक संरचना बनाने की दिशा में प्रयास शुरू होता नजर आता, तो किसान हित के यह कानून सफलतापूर्वक लागू हो जाते।
यदि तीनों कृषि कानूनों के मूल ढांचे का विचार किया जाए तो यह कानून ग्रामीण संरचना से संबंधित आर्थिक कानून होने के साथ ही सामाजिक स्वरूप में भी बदलाव लाने वाले हैं। क्योंकि यह कानून आर्थिक पक्ष के साथ-साथ किसानों के बीच वर्षों से प्रचलित व्यवस्था में भी परिवर्तन लाने वाले थे। अतः इन कानूनों के सामाजिक पक्ष पर भी कार्य करने की आवश्यकता थी। किसानों के बीच यह समझ विकसित की जानी थी कि अपनी उपज की बिक्री हेतु वह आवश्यक समुचित मात्रा की व्यवस्था किस प्रकार करें। उनकी उपज बेचने के लिए बाजार किस प्रकार विकसित होगा। बाजार विकसित करने में उनकी भूमिका क्या होगी। वह किस तरह उस बाजार तक अपनी पहुंच बनायेंगे। इन सभी व्यवस्थाओं से किसानों का परिचय जिन लोगों को कराना था। वह सब सरकार से राजनीतिक मतभेदों के चलते, किसानों को कानूनों के विरुद्ध बरगलाने में लग गये। सरकार ने भी कानून लाने के पूर्व इस दिशा में ध्यान नहीं दिया। इसमें सबसे महत्वपूर्ण बात किसानों को यह समझाना था कि इस प्रक्रिया में किसानों की सहभागिता किस प्रकार की होगी। ताकि आने वाले समय में इस व्यवस्था में शोषणकारी तत्वों की उत्पत्ति ना हो सके।
ध्यान देने वाली बात यह है कि एपीएमसी कानून भी किसानों की भलाई के लिए ही बनाया गया था। इस कानून में भी आदर्श व्यवस्थायें थी। कानून के अनुसार किसान एक निर्धारित स्थान पर अपनी उपज लेकर आना था। उस स्थान पर विभिन्न व्यापारी/दलाल आपस में प्रतिस्पर्धा करते, किसानों को उनकी उपज का अधिकतम मूल्य मिलता। परंतु कालांतर में यह आदर्श व्यवस्था किसानों का शोषण करने वाली व्यवस्था बन गई। व्यापारियों/दलालों ने संगठित होकर, किसानों का शोषण शुरू कर दिया। किसानों के पास अपनी उपज बेचने के लिए कोई अन्य वैकल्पिक बाजार उपलब्ध न होने के कारण, वह इन्हीं बाजारों में आने और व्यापारियों/दलालों के हाथों लूटने के लिए मजबूर हो गए।
केंद्र सरकार अपने तीनों कृषि कानूनों में इन बातों का ध्यान तो रखा। कृषि उपज व्यापार और वाणिज्य (संवर्धन और सरलीकरण) अधिनियम 2020 के अंतर्गत उसने किसानों को एपीएमसी के अतिरिक्त अपनी उपज बेचने के लिए असंख्य वैकल्पिक बाजार तो उपलब्ध करा दिए। यही नहीं, सरकार ने किसानों को उनकी उपज को बेचने में लिए जाने वाले टैक्स से भी राहत दी। परंतु वह किसानों को व्यापारियों की कारटेलिंग और अपनाए जाने वाले हथकंडों से बचाने का कोई ठोस आधार नहीं समझा सके। वह यह बताने में असफल रहे कि सरकार नये कानून में व्यापारी/दलालों को इन नवीन बाजारों पुराने हथकंडे अपनाने से कैसे रोकेगी। जिसके कारण किसान नेता और व्यापारी/दलाल उन्हें बरगलाने में सक्षम हुए। इसके पीछे विपक्षी राजनेताओं द्वारा किसानों को गुमराह कर सरकार को किसान विरोधी दिखाने की योजना भी काम कर रही थी।
प्रसिद्ध विचारक दार्शनिक दत्तोपंत ठेंगड़ी अपनी पुस्तक Consumer - Souvergen without Sourveginity में लिखते हैं -
किसानों को इस बात को याद रखना चाहिए कि ग्राहकों के द्वारा की जाने वाली उचित दामों की मांग और उनकी लाभकारी मूल्यों की मांग के बीच कोई भी असंगति नहीं है। यह दोनों मांगे दोषपूर्ण सरकारी नीतियों और योजनाओं के कारण परस्पर विरोधी लगती हैं।
ग्राहक या उनकी सहकारी संस्थाएं जहां कहीं पर भी किसानों के सीधे संपर्क में हैं। दोनों को ही इसका लाभ मिलता है। क्योंकि इस प्रक्रिया में मध्यस्थ और उनके द्वारा लिया जाने वाला कमीशन बच जाता है। अधिकतर वस्तुएं मध्यस्थों की एक लंबी श्रृंखला से होकर गुजरती हैं। इन दलालों की कीमत, किसान तथा ग्राहक दोनों को चुकानी पड़ती है। जहां कहीं राज्य मध्यस्थ की भूमिका में होता है। वहां भी इन स्थितियों में कोई अंतर नहीं आता।
कृषि फसलों के बारे में छोटे और मझले किसानों को तो बहुत ही विचित्र परिस्थिति का सामना करना पड़ता है। क्योंकि उनके पास फसल भंडारण की कोई सुविधा नहीं होती। दूसरी तरफ पूंजीपति बैंकों से कर्ज लेकर बहुत बड़ी मात्रा में भंडारण की सुविधा बना लेते हैं। नई फसलों के आने के पहले यह लोग समाचार माध्यम से प्रचारित करवाते हैं कि फसल बहुत अच्छी हुई है। यह प्रचार प्रमुख रूप से छोटे और मझोले किसानों पर मानसिक दबाव बनाने के लिए किया जाता है। ताकि किसान अपनी फसल बाजार में सस्ते दामों पर बेच दे। किसान गरीब होते हैं। वह बाजार में स्थितियों के बेहतर होने की प्रतीक्षा नहीं कर सकते। वह अपने उत्पादन को लंबे समय तक सुरक्षित रख पाने में भी असमर्थ होते हैं। यदि उत्पादन खराब होने वाला हो, तब तो स्थिति और भी गंभीर हो जाती है। किसान बिल्कुल असहाय हो जाते हैं। दलाल इस स्थिति का निर्दयता पूर्वक दोहन करते हैं। ग्राहकों को आवश्यक कृषि उत्पादनों की ऊंची कीमत चुकानी पड़ती है। लेकिन किसान न्यायपूर्ण मूल्य प्राप्त करने से वंचित कर दिए जाते हैं।
सरकार को उदाहरण के रूप में किसानों को उनकी फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए कृषि कानून के अंतर्गत उपलब्ध कराए जाने वाले अतिरिक्त बाजारों को विकसित करने के कुछ मॉडल खड़े करने की आवश्यकता है। यह कार्य किसान संघ और ग्राहक संगठनों के साथ-साथ आने पर आसानी से संपादित है सकता है। किसानों को अपने गांव के आसपास ही बाजार मिले। ग्राहकों को उनकी फसलें उचित दामों पर उपलब्ध हो सकें। यह सिलसिला शुरू किए जाने की आवश्यकता है। एक बार इस सिलसिले के शुरू होने के बाद यह किसी के भी रोके रुकने वाला नहीं है।
किसानों की आर्थिक स्थिति सुधारने के लिए तथा उनकी फसलों के लाभकारी मूल्य दिलाने के लिए प्रारंभिक तौर पर दो स्तरीय व्यवस्था बनाने की जरूरत है। पहले स्तर पर किसानों को ग्राम स्तर पर उनकी उपज बेचने के लिए संगठित करना। उपज के विक्रय मूल्य का निर्धारण करना। उपज की बिक्री हेतु नजदीक ही समुचित बाजार उपलब्ध कराना। इसके लिए किसान संघ और ग्राहक संगठन आपसी संपर्क बनाकर किसानों की फसल के लाभकारी मूल्य दिला सकते हैं। इन मूल्यों को देने के लिए ग्राहक सहर्ष तैयार हो जाएंगे।
इस व्यवस्था को सरकारी स्तर पर नहीं बल्कि सामाजिक आधार पर विकसित करना चाहिए। इसमें किसान संघ और ग्राहक संगठनों को प्रमुख भूमिका निभानी चाहिए। सरकार इन संगठनों को मूलभूत संरचनात्मक सुविधाएं उपलब्ध कराकर मदद दे सकती है। यदि कृषि उपज के निस्तारण की यह बाजार व्यवस्था विकसित हो गई, तो सदियों से चली आ रही किसानों और ग्राहकों के शोषण की कहानी का अंत हो जाएगा।
इस व्यवस्था का सबसे बड़ा लाभ यह होगा कि किसानों को अपनी आंखों के सामने अपनी उपज के निस्तारण की सुविधा नजर आएगी। जिसके कारण वह राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित किसान नेताओं के बरगलाने से प्रभावित नहीं होगा और के।फिर कानूनों के समर्थन में डटकर खड़ा होगा।
Sunday, 8 January 2023
अंतर्राष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ी थे, ग्राहक पंचायत के उपाध्यक्ष केदारनाथ पटेल
अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के उड़ीसा प्रांत के उपाध्यक्ष सुंदरगढ़ के निवासी श्री केदारनाथ पटेल जी के आकस्मिक निधन से मैं स्तब्ध हूं। कुछ वर्ष पूर्व जब मैं उनके निमंत्रण पर ग्राहक पंचायत के एक कार्यक्रम में भाग लेने सुंदरगढ़ गया था। वह मुझे लेने झारसुगड़ा स्टेशन पर आए थे। झारसुगड़ा से सुंदरगढ़ जिला जो एक खनन क्षेत्र है, लगभग 15 किलोमीटर दूर है। हम उनकी कार से सुंदरगढ़ पहुंचे, रात हो गई थी। अतः उन्होंने मुझे मेरे विश्राम स्थल पर छोड़ दिया, उन दिनों उनकी माता जी अस्वस्थ थी, वह उनकी बहुत सेवा करते थे। उन्होंने मुझसे कहा कि माता जी की देखभाल के लिए उनका घर पर रहना आवश्यक है। अगले दिन प्रातः हम शाखा में जाकर कई स्वयंसेवकों से मिले। कार्यक्रम लगभग 11:00 से शुरू होना था। जिसमें केदारनाथ जी ने सुंदरगढ़ की कई तहसीलों से ग्राहक पंचायत के कार्यकर्ताओं को बुलाया था। कार्यक्रम की समाप्ति के बाद मुझे संभलपुर जाना था संभलपुर से मुझे लेने के लिए आने वाली गाड़ी में कुछ विलंब था। इस बीच हम दोनों उनके स्कूटर पर संभलपुर की सड़कों पर काफी देर तक घूमे। मुझे उनके साथ बिताया वह समय आज भी अच्छी तरह याद है।
श्री केदारनाथ जी अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट थे। तेज गति से चलने में उनका कोई सानी न था। उन्होंने तेज गति से चलने की अनेकों प्रतियोगिताओं में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का प्रतिनिधित्व किया था। जिसमें ओलंपिक तथा एशियाड जैसी अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताएं भी हैं। उन्होंने दक्षिण अफ्रीका के डरबन, इंग्लैंड के लंदन, ऑस्ट्रेलिया के मेलबोर्न के साथ ही चीन तथा अनेकों देशों में तेज गति से चलने की प्रतियोगिताओं में भारत का प्रतिनिधित्व किया था। उन्होंने अनेकों पदक भी जीते। राष्ट्रीय स्तर की की प्रतियोगिताओं में भी उन्होंने भाग लेकर स्वर्ण पदक जीते।
अंतरराष्ट्रीय खिलाड़ी ने चलते चलते ही अपनी अंतिम सांस ली, रविवार की प्रातः केदारनाथ जी जो इन दिनों अपने पुत्र सस्मित के पास राउरकेला में रह रहे थे, प्रातः भ्रमण की स्वाभाविक दिनचर्या थी के कारण वह प्रायः घर से बहुत दूर तक भ्रमण करने निकल जाते थे। रविवार को भी ऐसा ही हुआ, वह भ्रमण करने अपने घर से काफी दूर तक निकल गए। उनके पुत्र सस्मित से पता चला कि सुबह दूधवाले ने उन्हें बताया कि वहां सड़क पर एक बूढ़ा आदमी गिर पड़ा है। उसे दिल का दौरा पड़ा है। उन्होंने कहा कि हम लोगों ने इस बात को साधारण तौर पर लिया और आपस में कहा भी कि बूढ़े व्यक्ति को इतनी सर्दी में घूमने के लिए नहीं निकलना चाहिए। परंतु जब पिताजी काफी देर तक घर नहीं लौटे, तो हम उनको ढूंढने पार्क तक गए, इधर उधर सड़कों पर भी उनकी तलाश की, परंतु वह नहीं मिले। जब हम उनकी तलाश में भटक रहे थे, हमें दूध वाले की बात याद आई, मैंने दूध वाले को फोन कर पूछा तो उसने बताया कि वह बूढ़ा व्यक्ति टोपी पहने हुए था। मेरे पिताजी हमेशा ही स्पोर्ट्स कैप लगाते हैं। अतः मैं दूधवाले के द्वारा बताएं स्थान पर पहुंचा। वहां कुछ दूर पीसीआर वैन खड़ी थी। जब हमने पुलिस वालों से पूछताछ की तो पता चला कि उन्होंने ही पिताजी को एंबुलेंस के द्वारा अस्पताल भिजवाया था।
ग्राहक पंचायत के ओजस्वी कार्यकर्ता और अंतरराष्ट्रीय स्तर के एथलीट श्री केदारनाथ जी के अचानक इस तरह चले जाने की घटना दुखद है मुझे रह रह कर उनके साथ बिताया गया 2 दिन का समय याद आता है। मेरे सुंदरगढ़ प्रवास के बाद भी अनेकों बार ग्राहक पंचायत की बैठकों में मेरी केदारनाथ जी से भेंट हुई सोशल मीडिया प्लेटफार्म व फोन के द्वारा उनसे अक्सर चर्चा होती रहती थी। मैं अंतर्राष्ट्रीय स्तर के इस एथलीट और ग्राहक पंचायत के कार्यकर्ता के आकस्मिक निधन पर अपनी भावपूर्ण श्रद्धांजलि अर्पित करता हूं। साथ ही ईश्वर से प्रार्थना करता हूं की उनके शोकाकुल परिवार को इस आकस्मिक क्षति को सहने की शक्ति प्रदान करे।
हरि ओम!
Wednesday, 4 January 2023
आनलाईन होटल बुकिंग में बड़ा घपला, पर्यटकों की लूट
पर्यटक विशेष अवसरों पर होने वाली छुट्टियों में पर्यटन के लिए निकलते हैं। पर्यटन स्थल पर किसी प्रकार की असुविधा ना हो इस कारण पूर्व में ही विभिन्न ऑनलाइन एजेंसियों के माध्यम से होटल की बुकिंग भी करवा लेते हैं। पर्यटक सावधानी अपनाएं, ऑनलाइन होटल बुकिंग पर आंख बंद कर विश्वास करने से बचें, उन्हें पर्यटन स्थल पर कई समस्याओं का सामना करना पड़ सकता है, यह ध्यान रहे। बात को अधिक स्पष्ट करने के लिए, मैं एक सच्ची घटना का सिलसिलेवार वर्णन करता हूं।
इस वर्ष क्रिसमस और नववर्ष की छुट्टियां गोवा में बिताने की मैंने योजना बनाई। इस अवसर पर गोवा में बहुत भीड़ होती है। अतः असुविधा ना हो इसलिए सितंबर माह में ही 26 दिसंबर से 28 दिसंबर तक, गोवा के पंजीम शहर में और 31 दिसंबर से 4 जनवरी तक गोवा के कैलेंगुटे शहर में एक ऑनलाइन एजेंसी के माध्यम से होटल भी बुक कर लिए। मैंने होटल बुकिंग की राशि चुका दी, ताकि कोई गलतफहमी ना रहे। परंतु मुझे मालूम नहीं था कि उधर पर्यटकों को ठगने के लिए, ऑनलाइन बुकिंग एजेंसी एवं होटल वालों के बीच पहले से ही एक अलग षड्यंत्र चलता है। जिसकी कार्य पद्धति लगभग सभी पर्यटन स्थलों पर एक जैसी ही है।
Friday, 16 December 2022
मुफ्तखोरी का खेल, कोई पास - कोई फेल
देश में लोगों को मुफ्त में वस्तुएं और सुविधाएं उपलब्ध कराने का जो खेल राजनीतिक दल खेल रहे हैं , यदि उसे सरल भाषा में समझा जाए तो टैक्स की गुल्लक में हमसे रोजाना अप्रत्यक्ष कर के माध्यम से जो पैसे डलवाए जाते हैं, उन्हीं पैसों से राजनीतिक दल वस्तुएं और सुविधाएं हमें उपलब्ध कराकर, मुफ्तखोरी का भोंपू बजाते हैं। कब तक राजनैतिक दल हमें मूर्ख बना कर ठगते रहेंगे और हम मूर्ख बनकर ठगे जाते रहेंगे, इस बात पर हमें गंभीरता से विचार करना है।
"थोड़ा है थोड़े की जरूरत है ......"
प्रसिद्ध गीतकार गुलजार के द्वारा फिल्म खट्टा मीठा के लिए लिखे गए इस गीत में जीवन की वास्तविक स्थितियों का दर्शन छिपा है। लगभग सभी की इच्छा होती है कि जो कुछ भी उसके पास है, काश उससे थोड़ा सा अधिक उसे मिल जाए, मानव स्वभाव की इसी कमजोर नस को कुछ राजनीतिक दल अपना उल्लू साधने के लिए दबाते हैं। वास्तविकता है की राजनीतिक दल इस काम में सफल भी हुए हैं। थोड़े से अधिक की अपेक्षा करने वाले लोग उनके इस जाल में फंसे हैं। यह दीगर बात है कि मुफ्त में थोड़ा और पाने की इच्छा उन लोगों को अनेकों स्थानों पर दर्द भरे दंश देकर गई है।
कोई वस्तु या सुविधा आपको मुफ्त में मिल जाएगी यह मन का भ्रम ही हो सकता है, सत्य नहीं। प्रत्येक वस्तु या सुविधा का कुछ ना कुछ मूल्य होता है, जिसे हमें चुकाना ही पड़ता है। यह दीगर बात है की उस वस्तु का मूल्य हम धन के रूप में न चुका कर, किसी अन्य रूप में चुकाते हैं और सही स्थिति का आकलन करने में हम सक्षम न हों। मुफ्त मिलने वाली वस्तु या सुविधा का मूल्य किसी भी स्वरूप में हो सकता है। श्रम के रूप में, प्राकृतिक संसाधनों के रूप में या फिर ऊर्जा के किसी रूप में। जिसे हमें मुफ्त में मिलने वाली उस वस्तु या सुविधा के लिए चुकाना ही पड़ता है।
पिछले कुछ वर्षों से देश में एक रवायत चल पड़ी है। कुछ राजनीतिक दल चुनावों के वक्त वोटरों को (जो ग्राहक ही होते हैं) लुभाने के लिए तरह-तरह की वस्तुएं या सुविधाएं मुफ्त में उपलब्ध कराने का लालच देते हैं। आर्थिक विषयों का समुचित ज्ञान या समझ ना होने के कारण, ग्राहक उनके झांसे में फंसकर देश समाज और परिवार का बड़ा अहित कर बैठते हैं।
आज यह आवश्यक हो गया है की ग्राहक आंदोलन से जुड़े कार्यकर्ता मुफ्त के इस खेल को समझें तथा इसे समाज को समझाएं कि मुफ्त के आवरण में लिपटी जिन वस्तुओं और सुविधाओं को देने का वादा राजनीतिक दल कर रहे हैं। उससे देश की अर्थव्यवस्था खोखली होती है। इससे देश समाज परिवार और व्यक्ति को ही नहीं, बल्कि आने वाली पीढ़ियों को भी आर्थिक विपन्नता की गर्त में धकेला जाता है। देश और समाज को मुफ्त की इस लत से बचने की आवश्यकता है। राजनीतिक दल लोगों को मुफ्त में जो भी वस्तुएं या सुविधाएं उपलब्ध कराते हैं। वह उन्हीं लोगों के द्वारा अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में खरीदी गई वस्तुओं पर चुकाए गए टैक्स से ही खरीदी जाती है। अतः यह समझने की आवश्यकता है कि मुफ्त के नाम पर लोगों को जो कुछ भी उपलब्ध कराया जा रहा है। उसका मूल्य उन्हीं से विभिन्न अप्रत्यक्ष करों के माध्यम से वसूला जाता हैं।
सरकार के पास आने वाले राजस्व का बड़ा भाग ग्राहकों के द्वारा चुकाये गये अप्रत्यक्ष टैक्स जीएसटी से आता है। यह जीएसटी सुबह से शाम तक ग्राहक माचिस से लेकर बड़ी-बड़ी वस्तुओं को खरीदने में सरकार को चुकाता है। ग्राहकों के इसी पैसे का दुरुपयोग कर राजनीतिक दल चतुराई से मुफ्तखोरी का खेल खेलते हैं। हम से ही लिए गए पैसे से वस्तुएं या सेवाएं खरीद कर मुफ्त के नाम पर राजनैतिक दल हम पर चिपकाते हैं।
राजस्व का सही उपयोग न किए जाने से देश की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है। उसका बड़ा नुक़सान होता है। देश का विकास रुकता है। हमारे द्वारा दिए गए टैक्स के पैसे का अधिक से अधिक उपयोग सरकार को देश की जीडीपी बढ़ाने वाली योजनाओं में करना चाहिए। जिनमें उद्योग एवं कृषि क्षेत्र आते हैं। इन क्षेत्रों में खर्च करने से रोजगार का सृजन होता है। देश समृद्ध होता है। देश में प्रति व्यक्ति आय बढ़ती है। इसके अतिरिक्त देश की आधारभूत संरचना के निर्माण में भी इस टैक्स द्वारा प्राप्त इस धन का उपयोग सरकारों को प्राथमिकता के साथ करना चाहिए। इन योजनाओं का उपयोग देश की जीपीडीपी बढ़ाने में सहायक होता है। इसके अतिरिक्त देश की आंतरिक एवं बाह्य सुरक्षा को चुस्त-दुरुस्त बनाने, प्रशासनिक एवं न्यायिक व्यवस्था के संचालन के लिए किए जाने वाले खर्च का उपयोग भी सरकारें हम सभी से वसूले गए टैक्स के धन से ही करती हैं। देश में यदा-कदा प्राकृतिक व अन्य आपदाएं भी आती रहती हैं। इस कठिन समय में राहत देने के लिए आवश्यक धन की व्यवस्था भी सरकारें ग्राहकों से वसूली इसी टैक्स की राशि से करती हैं।
यदि राजनीतिक दलों के द्वारा मुफ्तखोरी के लोकलुभावन वादों को पूरा करने में सरकारी धन की लूट होगी तो या तो सरकारों को देश की विकास योजनाओं पर किए जाने वाले खर्च में कमी करनी पड़ेगी या फिर ग्राहकों से वसूले जाने वाले टैक्स को बढ़ाना पड़ेगा। प्रत्येक नागरिक की यह अपेक्षा होती है कि सरकार उन पर पड़ने वाले टैक्स के बोझ को कम करे। ताकि वह कुछ बचत कर अपने लिए कुछ अतिरिक्त संसाधन जुटाने में सक्षम हो सकें। परंतु मुफ्तखोरी की योजनाओं के चलते सरकारी सिर्फ और सिर्फ टैक्स बढ़ाने की ही सोच सकती है। इसके लिए वह नए-नए तरीके और माध्यम तलाश करती हैं।
अर्थव्यवस्था में अनुदान सब्सिडी की व्यवस्था होती है। परंतु इसका उपयोग लोगों को मुफ्त में सामान या सुविधाएं बांटने की लोकलुभावन तात्कालिक सुविधाएं देने के लिए नहीं, बल्कि आर्थिक रूप से कमजोर लोगों को जीवनावश्यक वस्तुयें उपलब्ध कराने के लिए किया जाना चाहिए। देश की जीडीपी बढ़ाने के लिए, उत्पादन बढ़ाने में सहायक संसाधनों का मूल्य घटाने के लिए किया जाना चाहिए। सरकारों को अपने आवश्यक एवं अनावश्यक खर्चों को पहचानने की तमीज होनी चाहिए। उन्हें निरंतर कम करने का प्रयास करते दिखना चाहिए। सभी राजनीतिक दलों का जोर इन बातों पर होना चाहिए, ना कि मुफ्तखोरी, वस्तुओं और सेवाओं को लोगों में बांटकर सस्ती लोकप्रियता हासिल कर, हमें बेवकूफ बनाने के दुष्प्रचार में जुटना चाहिए।
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