Wednesday, 20 May 2015

रोकी जा सकती थी डीजल - पैट्रोल की मूल्यवृध्दि

पैट्रोल डीजल की कीमतें मंहगाई मे विशेष भूमिका अदा करती हैं।सरकार द्वारा विगत दिनो बढाई गई पैट्रोल डीजल की कीमतों को मंहगाई की नवीन किश्त माना जा सकता है।यह तर्क कितना तर्कसंगत है कि अर्न्तराष्ट्रीय स्तर पर कच्चे तेल की मूल्यवृध्दि देखते हुए यह कदम उठाना अनिवार्य हो गया था।सरकार सर्मथकों की यह युक्ति भी समझ से परे है कि लगातार एक वर्ष तक पैट्रोल डीजल की कीमतें कम करने के बाद यदि अर्न्तराष्ट्रीय कीमतों के दबाव मे कुछ मूल्यवृध्दि की जाती है तो इस पर चिल्ल पों मचाना गलत है।

महत्वपूर्ण है कि एक वर्ष के शासन के बाद सरकार देश में अपनी उपलब्धियां गिनाने के लिये भारत पर्व मनाने में जुटी है।इस अवसर पर क्या इस अप्रिय घटनाक्रम से बचा जा सकता था। वैसे भी ग्राहकों ने पैट्रोल डीजल के नाम पर सरकारी खजाने मे बहुत अतिरिक्त पैसा जमा किया है।पिछले एक वर्ष के कच्चे तेल के अर्न्तराष्ट्रीय बाजार और उस पर आधारित देश मे होने वाली उठापटक का यदि विश्लेषण करें तो यह बात सामने आती है कि सभी को मालूम था कि कच्चे तेल की कीमतें न तो स्थिर रहने वाली हैं, न ही सदैव नीचे खिसकने वाली हैं। अतः आगे की योजना बनाते समय पिछले एक वर्ष और वर्तमान घटनाक्रम का विश्लेषण करते हुये ही भविष्य की योजना बनानी चाहिये ।

वर्ष 2014 में कच्चे तेल की अर्न्तराष्ट्रीय कीमतें 107 डालर प्रति बैरल से लुढक कर 45 डालर प्रति बैरल आने के पीछे तेल उत्पादक देशों के घरेलू हालातों के साथ साथ अमेरिका द्वारा तेल उत्पादन में आत्मनिर्भर होने के लिये उठाये जाने वाले कदम थे।अमेरिका द्वारा तेल उत्पादन का निर्णय लेने के बाद एक तरफ जहां अरब के देशों ने अपना उत्पादन इसलिये बढा दिया क्योंकि उनकी उत्पादन लागत अमेरिकी लागत लगभग 70 डालर प्रति बैरल से काफी कम थी। परन्तु अमेरिका लगा रहा उसने अपना उत्पादन बन्द नहीं किया। दूसरी तरफ ईरान अमेरिकी तथा यूरोपीय समुदाय द्वारा प्रतिबन्ध लगाये जाने के बाद भी अपना उत्पादन पूर्ववत करता रहा।नतीजतन मांग और पूर्ति मे लम्बा अन्तराल आता चला गय, कच्चे तेल की कीमतें गिरती चली गई।

यदि आने वाले समय पर नजर डालें तो एक तरफ ईरान परमाणु निरस्त्रीकरण के समझौते पर दस्तखत कर चुका है, आने वाले कुछ माह मे ही यह लागू भी होगा, जिसके कारण उस पर लगे सभी प्रतिबन्ध हटने वाले हैं। अब तक तेल का उत्पादन कर उसने जो भण्डार बनाये हैं वह सभी बाजार मे आयेंगे। ओपेक देशों का समूह कमजोर हो चुका है, पहले यह जो तेल उत्पादन नियंत्रित कर बाजार भाव निर्धारित करने मे महत्वपूर्ण भूमिका निभाता था, आज वह समाप्त हो चुकी है, सऊदी अरब लगातार अपना उत्पादन बढा रहा है, फ्रेकिंग की तमाम आशंकाओं और अधिक लागत को पीछे छोड अमेरिका आगे निकल चुका है। रही बात यूक्रेन पर हमले के बाद रूस को प्रतिबन्धित करने की, आर्थिक रूप से कमजोर पडा रूस भी यूक्रेन पर हमले की उन स्थितियों से बाहर निकलता जा रहा है ।उधर चीन भी लगातार तेल उत्पादन बढाता जा रहा है। इन परिस्थितियों में निकट भविष्य मे कच्चे तेल की कीमतें 60 - 70 डालर के बीच ही रहने का अनुमान है। देश की सरकार के लिये आर्थिक उन्नति के रास्ते पर तेजी से बढने और मंहगाई नियन्त्रित रखने के लिये परिस्थितियां सर्वथा अनुकूल हैं।

ग्राहकों के लिये ध्यान रखने की बात यह है कि डीजल-पैट्रोल की कीमतें कच्चे तेल के भावों से तो प्रभावित होती हैं, साथ ही डालर/रूपये की विनिमय दर भी उसे प्रभावित करती है।सरकार द्वारा पैट्रोल/डीजल की कीमत बढाने के पीछे यही तर्क दिये जा रहे हैं, कच्चे तेल के दामों का 50 डालर प्रति बैरल से ऊपर जाना और रूपये की तुलना में डालर का मजबूत होना।परन्तु सरकार बडी आसानी से यह भूल गई कि उसने 2015 के बजट मे पैट्रोल/डीजल पर लगने वाले उत्पादन शुल्क को 6 रू कर दिया था। दरअसल सरकार के हाथ सोने का अण्डा देने वाली यह मुर्गी लगी है, जिसे वह सहेजना चाहती है। इसी के कारण तो सरकार अप्रैल 2014 मे 8665 करोड की तुलना में अप्रैल 2015 में 18373 करोड एक्साईज ड्यूटी वसूल कर सकी है। विशेष बात यह कि इसका 26% हिस्सा पैट्रोल/डीजल से आया है। इन सब बातों से लगता है कि देश भर मे अपनी उपलब्धियां गिनाने के भारत पर्व अवसर पर सरकार को देश के ग्राहकों को मंहगाई का यह ईन्जेक्शन देने से बचना चाहिये था।

Wednesday, 24 September 2014

हर खेत को पानी, हर हाथ को काम

 हर खेत को पानी, हर हाथ को काम, पंडित दीनदयाल जी का यह वाक्य आज भी भारत की अर्थव्यवस्था की मुख्य कुंजी बना हुआ है। यह वाक्य आज भी देश को समृद्ध बनाने का मन्त्र है, विशेष बात तो यह है कि अपने देश में इस मन्त्र को अपनाने के सम्पूर्ण साधन सामग्री के साथ ही परिस्थितियाँ भी मौजूद हैं। आवश्यकता बस इच्छाशक्ति की है जिसका आज़ादी के बाद से ही इस देश में अभाव रहा है। यदि हम एक दो अपवादों को छोड़ दें तो हमारे देश के नेतृत्व को प्रारम्भ से ही अपने लोगों से अधिक भरोसा पश्चिमी देशों के लोगों पर रहा है। पश्चिम के अर्थशास्त्र से प्रभावित हमारे देश का नेतृत्व यह भी भूल गया कि देश की राजनीतिक स्वतन्त्रता  बनाये  रखने के लिए कम से कम खाद्यान्नों के मामले में देश का आत्मनिर्भर होना बहुत जरुरी है। दीनदयाल जी देश की भौगोलिक ,सामाजिक विविधता के साथ ही विशाल जनसँख्या को ध्यान में रखते हुए, उसके अनुरूप ही उचित मार्ग चुनने के पक्षधर थे।

देश की विशाल जनसंख्या को देखते हुए उसे खाद्यान्नों के मामले में आत्मनिर्भर बनाते हुए विकास के मार्ग की दिशा ही 'हर खेत को पानी, हर हाथ को काम' के रास्ते वाली है। जिसका सीधा अर्थ है देश में पर्याप्त खाद्यान्नों का उत्पादन तथा प्रत्येक ग्राहक के हाथ में क्रय शक्ति का नियोजन। पश्चिम के अर्थशास्त्री भी इसी बात को मानते हैं कि अर्थव्यवस्था की प्रगति के लिए अधिक से अधिक ग्राहकों के हाथ में अधिक से अधिक क्रय शक्ति का होना जरुरी है। क्योंकि जब ग्राहकों के हाथ में क्रयशक्ति होगी तभी वह बाजार में अपनी आवश्यकता के उत्पादनों की मांग करेगा।  बाज़ारों में मांग आने से उद्योगों को अधिक से अधिक उत्पादन करने की आवश्यकता होगी। जिससे देश की कुल आय भी बढ़ेगी और देश के लोगों को रोजगार भी मिलेगा। दीनदयाल जी कृषि के विका पर जोर इसीलिए देते थे क्योंकि वह ज़मींन से जुड़े थे तथा जानते थे कि देश में पूंजी का अभाव है और खेती ही एकमात्र उपाय है जिससे देश में आसानी से पूंजी का निर्माण हो सकता है। यही नहीं भारत जैसे कृषि प्रधान देश में खेती उत्पादन पर निर्भरता पूंजी निर्माण का सबसे सरल और सटीक उपाय है।  इसके साथ ही खेती देश के एक बहुत बड़े वर्ग को रोजगार देने में भी सक्षम है।

देश में उस समय के नेतृत्व को देशी से अधिक विदेशी पर विश्वास था या फिर वह देश के विषय में अधिक जनता ही नहीं था। अतः उसने देश के विकास के लिए जो आर्थिक और राजनीतिक मार्ग चुना वह खेती से दूर बड़े उद्योगों तथा बड़ी पूंजी निवेश वाला था, पंडित जी इस मार्ग के पक्षधर नहीं थे। देश को शीघ्र ही अहसास हो गया कि यह सही मार्ग नहीं था पर तब तक देर हो चुकी थी। हम भूल गए कि हमें अपनी राजनीतिक स्वतन्त्रता की रक्षा की सामर्थ्य शीघ्र से शीघ्र हासिल करनी है जिसकी कीमत हमे 1962 के चीन युद्ध में पराजय झेलकर चुकानी पड़ी। हम अपनी लचर अर्थव्यस्था के चलते हर बात यहाँ तक रोटी के लिए भी विदेशों का मुँह ताकने को लाचार थे। फिर युद्ध लड़ना तो दूर की बात थी। खेती को दुर्लक्ष्य करने के कारण खाद्यान्नों की कमी को पूरा करने के लिए हमें अमेरिका से पी एल 480 जैसे अनुबन्धों को करना पड़ा। हम भिखारी बन चुके थे, दुनिया के आगे झुकना और उनकी बात मानना हमारी नियति बन चुकी थी,  इसका अहसास हमें 1966 की पाकिस्तान लड़ाई के समय हुआ। जब अमेरिका ने पाकिस्तान के कहने पर हमें पी एल 480 के तहत अनाज देने से मना कर दिया , अनाज देने की शर्त रखी की हम पाकिस्तान के साथ युद्ध तुरंत बंद करें, और पाकिस्तान का पूरा जीता हुआ भाग उसे बिना शर्त वापस कर दें। हमें अपने नेतृत्व की गलत नीतियों के कारण यह अपमान का घूंट पीना पड़ा। इसी कारण उस समय लालबहादुर शास्त्री ने देश की जनता से साप्ताहिक उपवास करने की प्रार्थना की थी तथा 'जय जवान, जय किसान' का नारा दिया था।

पंडित दीनदयाल जी का स्पष्ट चिंतन था "हमारी योजनाओं का प्रथम लक्ष्य होना चाहिए अपनी राजनितिक स्वतन्त्रता की रक्षा का सामर्थ्य उत्पन्न करना। दूसरे हमने अपने लिए प्रजातंत्रीय ढांचा चुना है।  यदि आर्थिक समृद्धि का कोई भी कार्यकृम हमारी प्रजातंत्रीय पद्धति के मार्ग में बाधक होता है तो वह हमें स्वीकार नहीं होगा।  तीसरे हमारे जीवन के कुछ सांस्कृतिक मूल्य हैं जो हमारे लिए तो राष्ट्रीय जीवन के कारण परिणाम और सूचक हैं तथा विश्व के लिए भी अत्यंत उपादेय हैं।  विश्व को इस संस्कृति का ज्ञान कराना हमारा राष्ट्रीय जीवनोद्देश्य हो सकता है।  इस संस्कृति को गंवाकर यदि हमने अर्थ कमाया भी तो वह निरर्थक और अनिष्टकारी होगा। "  दुर्भाग्य की बात है कि हमने अपनी गलतियों से सबक लेने के स्थान पर उसी मार्ग पर आगे बढ़ना और उसमें उलझना अधिक श्रेयष्कर समझा।  जिसके परिणाम आज देश भोग रहा है। दीनदयाल जी के विचार आज देश ही नहीं पूरे विश्व के लिए सार्थक बन चुके हैं। आज भारत ही नहीं पूरे विश्व के सामने हर हाथ को काम देने का प्रश्न चुनौती बनकर खड़ा है। जिसका कोई हल किसी को नहीं सूझ रहा है। पश्चिम के अर्थशास्त्रियों के सिद्धांतों के अनुरूप विकास का मार्ग खोजते खोजते विश्व की अर्थव्यवस्था आज अन्धे मोड़ पर पहुँच चुकी है।  इस परिस्थिति को पंडित दीनदयाल जी ने 50 वर्ष पूर्व ही भांप लिया था। समाज के अंतिम व्यक्ति तक आवश्यक सुविधाएँ पहुँचाने के लिए इस मार्ग के अलावा कोई पर्याय नहीं हैं।

Wednesday, 27 August 2014

वर्तमान में पंडित दीनदयाल जी की एकात्म अर्थनीति कितनी सार्थक


पंडित दीनदयाल जी उपाध्याय के बारे में चर्चा या लेखन करते समय यदि हम इस बात को भी ध्यान में रखें कि पंडित जी का स्वर्गवास फ़रवरी 1968 में लगभग 46 वर्ष पूर्व हो गया था।अल्पायु में पंडित जी के निधन के कारण उनके विचारों की वृहद्ता जनमानस तक नहीं पहुँच सकी। दीनदयाल जी का मौलिक लेखन बहुत कम है, जो कुछ भी दीनदयाल जी के नाम पर लिखा गया वह उनके भाषणों में उपस्थित महानुभावों द्वारा ग्रहण किये गए विचारों का संकलन तथा विस्तार है। यह साहित्य भी अधिक मात्रा में उपलब्ध नहीं है, इसका एक महत्वपूर्ण कारण आज़ादी के बाद से ही कांग्रेसी सरकारों का पश्चिमी देशों के प्रति भक्तिभाव निश्चित रूप से रहा है। क्योंकि देश में जब किसी महत्वपूर्ण विषय पर चर्चा करने की पद्धति ही न हो, तो अनेकों मौलिक विचारों को पनपने का अवसर नहीं मिल पाता है। अतः दीनदयाल जी के विचार सतह पर प्रमुखता से नहीं आ पाये। परन्तु आज जो कुछ भी उपलब्ध है, जब उसकी टिमटिमाती रोशनी में हम देश की वर्तमान आर्थिक स्थिति पर नज़र डालते हैं, तो उस काल में दीनदयाल जी द्वारा विश्लेषित आशंकाएं हमारे सामने सजीव स्वरूप में आकर खड़ी हो जाती हैं। हमारा दुर्भाग्य तो यह है कि हम 'अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत ' भी नहीं कह सकते क्योंकि हमने चिड़ियाओं को खुद खेत चुगने का निमन्त्रण दिया था। दीनदयाल जी की बातों को दरकिनार कर दिया था। 

 दीनदयाल जी के समय देश की आर्थिक व् राजनैतिक परिस्थिति भिन्न थी। देश आज़ाद हुआ ही था, पंचवर्षीय योजनाओं का सूत्रपात प्रारम्भ ही हुआ था। नेतृत्व पश्चिम में पले बढे, पश्चिम से नीचे से ऊपर तक प्रभावित नेहरू के हाथों में था।  दीनदयाल जी तथा नेहरू एवं अन्य योजनाकारों के विचारों  में भिन्नता थी।   दीनदयाल जी  देश की जनसंख्या ,उपलब्ध संसाधन ,देश के व्यक्ति व समाज की आवश्यकताएं, उपलब्ध प्राकृतिक संसाधन तथा राष्ट्रीय परिवेश के आधार पर , उसे समझकर , उसमे से लोकहितकारी मार्ग निकालने के पक्ष में थे, एकात्म मानववाद इन्ही विचारों का प्रतिबिम्ब है। परन्तु हम पश्चिमी देशों का अन्धानुकरण करने की दिशा में आगे बढ़ गए, लिहाजा इसमें जो भी बुराइयाँ थी उन्हें हम आज पश्चिमी देशों के साथ भुगत रहे हैं।

 दीनदयाल जी के सिद्धांतों की वर्तमान में उपयोगिता के सम्बन्ध में आज के आलोचक आसानी से कह सकते हैं कि आज परिस्थितियां भिन्न हैं, बात सच भी है, उस समय हम देश गढ़ने की प्रक्रिया में थे , आज 67 वर्षों के अन्तराल के बाद हम विभिन्न प्रयोग कर उनके परिणाम चख चुके हैं। परन्तु आज भी घूम फिर कर हम उसी दोराहे पर आ खड़े हुए हैं, जिस पर  दीनदयाल जी के काल खंड में थे।  हमें किसी एक मार्ग को चुनना है। विचित्र बात तो यह है कि आज भी हम उसी मार्ग को अपनाने के लिए लालायित हैं जिसका  दीनदयाल जी ने निषेध किया था।  हम यह समझाना ही नहीं चाहते कि वर्तमान में पूंजीवाद , साम्यवाद तथा समाजवाद तीनों अपनी सार्थकता खो चुके हैं।  विश्व ने इन तीनों के तम्बू उखड़ते हुए देखे हैं। उन देशों में भी ये वाद अपनी जड़ें टिकाने में सफल नहीं हुए जहाँ इन्होने अपने स्वर्णिम अध्याय लिखे थे। हम आज भी 67 वर्षों के अनुभवों से सीखकर  दीनदयाल जी के रास्ते पर चलने की हिम्मत जुटाने में अपने को असमर्थ पा रहे हैं। 

शायद यह लार्ड मेकाले द्वारा दी गई हमारी शिक्षा पद्धति का परिणाम है, हमने लगातार पश्चिमी विद्वानों का ही अनुवादित साहित्य पढ़ा है, हमें वही रास्ता मालूम है , हमारा विचार करने का तरीका भी वही है, हम अपना मौलिक तरीका खोकर एडम स्मिथ,रिकार्डो ,मिल ,मार्क्स ,हॉब्सन ,वेब्लेन ,केन्स ,बर्नहम ,शुम्पीटर ,प्रो मिड्ल ,प्रो जैकब विनर तथा प्रो जॉन मेलोर की आर्थिक संकल्पनाओं को यथार्थ के धरातल पर टूटते बिखरते देखकर भी (विकसित देशों की जमीन पर ) यह सोचने की स्थिति में नहीं हैं कि इससे हटकर भी एक मार्ग हमारे पास है। यह विडंबना ही है कि हम न तो उस मार्ग को अपनाने के इच्छुक दिखाई दे रहे हैं, न ही उस मार्ग पर कदम बढ़ाने की हिम्मत दिखा पा रहे हैं।  दीनदयाल जी के आर्थिक सिद्धान्त आज भी उतने ही नवीन तथा व्यवहारिक हैं जितने उस काल खंड में थे। मानव जीवन के शाश्वत सिद्धान्त शायद कभी भी कहीं भी सटीक ही होते हैं।

मेरे लेखन के सम्बन्ध में यह सन्देह हो सकता है कि मै ग्राहक आंदोलन का कार्यकर्ता अपना मूल कार्य छोड़कर कहां  दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद का आर्थिक सिद्धान्त ले बैठा। मुझे अर्थ संरचना से क्या मतलब। स्पष्ट कर दूँ ! अनेक वर्षों से यह छटपटाहट थी कि ग्राहक आंदोलन का स्वरूप क्या प्रतिक्रियात्मक ही रहेगा। पूरे विश्व ने ग्राहक आंदोलन के प्रतिक्रियात्मक स्वरूप को ही अपनाया है। पहले समस्या पैदा करो फिर उसका हल खोजो। मै सोचता था कि हम कभी इस क्रिया प्रतिक्रिया के द्वन्द से बाहर निकलकर कुछ मौलिक कुछ अलग कर सकते हैं क्या , जिससे ग्राहकों को कष्ट देने वाली क्रिया को ही रोका जा सके। ग्राहकों को कुछ भी प्रतिक्रिया करने की आवश्यकता ही न पड़े। दीनदयाल जी के एकात्म मानववाद के आर्थिक सिद्धान्त अंधकार के सागर में दीपस्तम्भ की रोशनी बनकर सामने आये हैं ,जिन्हे मै अगले लेखों में शनः शनः स्पष्टता से रखने का प्रयास करता रहूँगा।

Friday, 8 August 2014

किसी भी वस्तु पर बिका हुआ मॉल वापस नहीं होगा लिखना गैर क़ानूनी

महाराष्ट्र राज्य ग्राहक विवाद निवारण आयोग द्वारा एक महत्वपूर्ण निर्णय दिया गया है , जिसके अनुसार किसी भी दुकानदार द्वारा बिका  हुआ माल वापस नहीं होगा  लिखना गैरकानूनी  है। किसी भी दुकान से कोई भी ख़रीदा हुआ मॉल पसंद न आने पर वापस किया जा सकता है , और यदि उस मॉल के बदले में ग्राहक कोई दूसरा मॉल बदल कर लेता है, और ग्राहक को वह मॉल भी पसंद नहीं आता है तो दुकानदार को ग्राहक को पूरे पैसे वापस देने बंधनकारी हैं। 

लोनके नामक ग्राहक ने एक दुकान से १४ अगस्त २०१३ को  2  हज़ार 198 रूपये में 2 पैंट व 1190 रूपये की 2 कमीजें खरीदीं। इस खरीद पर दुकानदार ने ग्राहक को 2 % छूट भी दी, परन्तु ग्राहक को कपड़ा पसंद नहीं आया, अतः दुकानदार ने दूसरे दिन ग्राहक को कपड़े बदल दिये , परन्तु ग्राहक को यह बदले हुए कपड़े भी पसंद नहीं आये , इसलिए उसने दुकानदार से अपने पैसे वापस मांगे। दुकानदार ने एक बार बिका हुआ मॉल वापस नहीं होगा कहकर ग्राहक को पैसे देने से मना कर दिया। बात न बनने पर ग्राहक ने जिला फोरम में विवाद दाखिल किया , परन्तु जिला मंच ने ग्राहक की शिकायत को निरस्त कर दिया।  ग्राहक ने राज्य आयोग में अपील की , केंद्रीय ग्राहक व्यवहार मन्त्रालय द्वारा  22 दिसम्बर 1999  को जारी एक निर्देश के अनुसार किसी भी बिल पर यह लिखना या छापना कि  एक बार बिकी हुई वस्तु वापस नहीं होगी गलत है।  इसी नियम का सहारा लेकर ग्राहक ने दुकानदार को चुके गई मूल रकम के साथ 1000 रूपये दण्ड की भी मांग की, जिसे स्वीकार कर आयोग ने ग्राहक के पक्ष में निर्णय दिया. 

Thursday, 17 July 2014

कब तक इन्सानियत को कत्ल होते देखेगी दुनिया

इस बात में कोई शक नहीं कि वह लोग महान हैं जो साँपों को पालते हैं दूध पिलाते हैं। बाद में जब कभी भी मौका मिलता हे यही साँप कई निर्दोष लोगों को डसकर मौत की नींद सुला देते हैं।  यही नहीं कभी घात लगी तो सांप  इन दूध पिलाने वाले लोगों को भी मारने में कोई कसर नहीं छोड़ता। अब इसे इन लोगों की महानता कहा जाये या मूर्खता यह बताने की स्थिति में तो हम नहीं हैं पर हम यह जरूर कह सकते हैं कि मौत की इबारतों को सहेज कर रखना किसी के लिए भी फायदेमंद नहीं हो सकता। इससे होने वाले नुकसान को हम अपना या दूसरे का नहीं कह सकते।  अंततोगत्वा यह नुकसान समाज का होता है , ऐसे समय में निर्णय लेने में समाज के हितों की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। परन्तु आजकल हो यही रहा है, अपने निजी या राजनीतिक स्वार्थों के चलते हम समाज के इन दुश्मनों को हवा दे रहे हैं ,पाल रहे हैं।  

इंदिरा गांधी और राजीव गांधी इसी तरह के सांपों द्वारा डसे जाने के विश्व के सामने उदाहरण हैं।  भिंडरनवाले और प्रभाकरण को पालते वक्त इंदिरा, राजीव  ने यह नहीं सोचा होगा कि वह सामाजिक हित को किस बलिवेदी पर चढ़ा रहे हैं। दुर्भाग्य की ही बात है कि आज समाज में इन लोगों का झंडा उठाने वाले लोग काफी तादाद में पैदा हो गए हैं। जरा सी हवा चली नहीं की सड़क से लेकर संसद तक इन लोगों की तरफदारी की आवाजें सुनाई देने लगती हैं। इन लोगों को न तो इराक का नरसंहार दिखाई देता है ,न गाजा में बच्चों की चीखती आवाजें सुनाई देती हैं। मलेशिया के विमान में सफर करने वाले उन 80  बच्चों व् 250 लोगों का क्या कसूर था जो उन्हें उक्रेनी आतंकवादियों ने मौत की नींद सुला दिया, अगर इन लोगों को जीने का अधिकार है तो फिर किसको मरना पड़ेगा यह सारी दुनिया देख रही है झेल रही है। मैं एक और विचित्र बात इन दिनों देख रहा हूँ , दुनिया के सभी मानवतावादी इन दिनों खामोश हैं , उन्हें लगता है सांप सूंघ गया है। मानवता के प्रति ये कैसा दृष्टिकोण है। इन लोगों को भी क्या खा जाये आप ही सोचिये, यह किन लोगों के इशारे पर किसके लिए काम कर रहे हैं।   

आज लगभग पूरी दुनिया इस तरह के लोगों की गिरफ्त में है। जो किसी को भी कहीं भी मौत की नींद सुलाने को तैयार बैठे हैं। कोई कारण नहीं है उन लोगों को मारने का जिन्हें ये मारने को तैयार बैठे हैं, ठीक उसी तरह जैसे साँप को नहीं मालूम होता वह किसे काटेगा। जो लोग इन्हे दूध पिला रहे हैं उन्हें भी आज सोचना है और सोचना उन्हें भी है जो मरने वालों की लाइन में खड़े हैं। क्या इलाज होना चाहिए इस बीमारी का, उन्हें किश्तों में तबाही चाहिये जैसे आजकल हो रही है या फिर एक बार गुलशन से काँटों को उखाड फेको बाद में उसे बेहतर बना लेंगे। जो बात तय है वह यह कि इस तरह से वही मरेंगे जो किसी दूसरे को मारने के लिए जी रहे हैं, इसमें भी बड़ी बात यह कि ये लोग यह नही जानते कि इन्हे लोगों को क्यों मारना है। 

आतंक के साये से निकलने के लिए कम से कम आज तो दुनिया में वह छटपटाहट नहीं दिखाई दे रही जो दिखाई देनी चाहिए। शायद इस इंतजार में कि कोई दूसरा ही मरेगा मैं नहीं। जो लोग दुनिया को खून से रंगने का डर दिखाते हैं ,जो दूसरा रास्ता निकालने की बात सुझाते हैं वह दिवास्वप्न देख रहे हैं।उन्हें भी यह मालूम है कि दुनिया किश्तों में मर रही है और वह इसे रोक नहीं सकते। कुछ भी हो कोई भी रास्ता निकला जाये दुनिया को इस बीमारी से निजात दिलाना जरूरी हो गया है।  सभी को इस विषय पर कम से कम खुलकर अपने विचार रखने की आज जरूरत है।

Saturday, 12 July 2014

अच्छे दिन आने वाले हैं - मोदी सरकार की महत्वाकांक्षी योजना



मोदी सरकार ने १० जुलाई को जबसे अपना पहला आंशिक बजट संसद में रखा है , देश भर के सभी मीडिया में यह गहन चर्चा का विषय बना हुआ है। तमाम टी वी चैनलों पर पेनलिस्ट बजट की चीरफाड़ में व्यस्त हैं। इस बार 6 माह के बजट पर कुछ इस तरह लोग पिले हैं कि लगता है इसके बाद दुनिया नहीं है।  लेकिन सभी एक महत्वपूर्ण बात को छोड़ रहे हैं या फिर इस तरफ उनका ध्यान ही नहीं है। जिसके आधार पर निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि अच्छे दिन जरूर आएंगे।  अर्थव्यस्था ठीक पटरी पर आयेगी।  देश के सूखे जैसे हालात कुछ समय के लिए लोगों को विचलित कर सकते हैं, परन्तु अंतिम बाज़ी मोदी सरकार के हाथ में ही होगी।  अपने बजट भाषण में वित्तमन्त्री ने एक जिक्र सामान्य सा किया था, या तो लोगों ने उसे सुना नहीं या फिर उसे अनसुना कर दिया. क्योंकि कहीं भी उस बात का जिक्र बजट की चीरफाड़ करने में सुनाई नहीं दिया।  वित्तमंत्री ने कहा था कि हर परिवार के 2 बैंक खाते खोले जायेंगे। यह छोटी सी घोषणा आने वाले दिनों में देश की अर्थव्यस्था में क्रन्तिकारी परिवर्तन लाने वाली है। वित्तमंत्री ने चाहे अत्यंत सहजता से यह घोषणा की, परन्तु  पूरी गंभीरता से इस योजना पर काम शुरू कर दिया है।

सभी जानते हैं देश में लोगों के पास सरकारी पैसा एक रूपये के स्थान पर 10 से 20 पैसे ही पहुँचता है।  बाकी का 80 से 90  पैसा रास्ते में ही खा लिया जाता है।जिसके कारण 66 वर्षों से देश में कोई भी योजना बना लो, उसमें पलीता लग जाता है।  भ्रष्टाचार की इस दलदल से सभी परेशान हैं , इस पर नकेल चाहते हैं। इस पर नकेल तभी कसी जा सकती है जब कोई फुलप्रूफ तरीका निकाला जाये कि जिसको जितना पैसा पहुँचाना है उतना ठीक उसी के हाथ में जाय। इधर होता यह है कि सरकार किसी वर्ग विशेष को वित्तीय अनुदान देती है, जिसको अनुदान दिया जाता है ,उस तक पहुँचने के स्थान पर पैसा रास्ते में ही गायब हो जाता है । 

काफी समय से यह बात चर्चा में है कि सरकार जिसको मदद देना चाहती है ,पैसा सीधे उसके बैंक खाते में सरकार द्वारा ही स्थानान्तरित किया जाये।  परन्तु यह बात जितनी सरल दिखाई देती है उतनी है नहीं।  6,00,000 से अधिक गावों वाला विविधता भरा हमारा देश। साक्षरता बहुत कम, इसे किस तरह किया जाये।  कठिन असम्भव काम को करने का नाम ही मोदी है।  वित्तमन्त्री ने सहजता से जिस बात का उल्लेख किया , जिसे दिग्गज पकड़ नहीं पाये वह यही असंभव काम था। सिर्फ घोषणा ही नहीं हुई है, सरकार ने इस पर गंभीरता से काम भी शुरू कर दिया है , इस काम को पूरा करने का लक्ष्य भी तय कर दिया है। जो असम्भव को चुटकी बजाते करने की सामर्थ्य रखता हो, उसके नेतृत्व में अच्छे दिन आने में किसी को संदेह भला हो सकता है ,सिर्फ उनको छोड़कर जो देख समझ रहे हैं कि यह लम्बी दौड़ का घोडा आ गया है और बाज़ी उनके हाथ से निकल गई है। 

अब बात करते हैं इस योजना की,सरकार देश के सभी परिवारों को बैंक से जोड़ने जा रही है, सरकार ने 200 मिलियन नए बैंक खाते 1 वर्ष में खोलने का लक्ष्य रखा है, प्रत्येक परिवार के 2 बैंक खाते खोले जायेंगे। 'सम्पूर्ण वित्तीय समावेशन योजना' नाम की इस योजना के अन्तर्गत अन्य वित्तीय सेवाओ तथा पेंशन को भी समाहित करने की योजना है। यह काम ढंग से तय समय सीमा में पूरा हो इसके लिए वित्तमन्त्री ,रिजर्व बैंक के गवर्नर ,बीमा नियामक आयोग के अध्यक्ष तथा पेन्सन बोर्ड के अध्यक्ष को इस काम के देखरेख की जिम्मेदारी भी दे दी गई है। 2011 की जनगणना को आधार मानते हुए देश के 246.7 मिलियन परिवारों में से सिर्फ 144. 8 मिलियन परिवारों की ही बैंकों तक पहुँच है।सभी परिवारों को बैंक से जोड़ने वाली इस योजना को सफल बनाने वाले यह सभी बैंक खाते 15 अगस्त 2014 से खुलना प्रारम्भ होकर 14 अगस्त 2015 तक पूरे कर लिए जायेंगे। सभी जिलों को सहायक सेवा क्षेत्र योजना के अन्तर्गत 1000 से 1500 परिवारों तक इस योजना से इस तरह जोड़ा जायेगा कि किसी भी परिवार को बैंक के लिए 5 कि. मी. से अधिक दूर न जाना पड़े। मार्च 2016 तक देश के सभी 6,00,000 गावों को इस योजना का अंग बना लिया जायेगा। यही नहीं इस योजना को समय से पूरा करने के लिए 60,000 बैंक संवाददाताओं की नियुक्ति, भी की जाएगी जिसके लिए सरकार और बैंकों के सेवानिवृत्त कर्मचारी ,डाकघर कर्मचारियों तथा किराना दुकानदारों की मदद ली जाएगी। 

इस योजना का सीधा अर्थ है की देश में चलने वाले सभी पैसे के लेनदेन बैंकों के माध्यम से करना।पैसों का गायब होना रोकना, एक बार यह योजना पूरी हो गई तो शायद सरकार द्वारा दी जाने वाली वित्तीय सहायता में कटौती करने की जरूरत ही न पड़े , क्योंकि पैसा सीधा उन तक पहुंचेगा जिनको देना है , बीच में भ्रष्टाचार के सभी रस्ते बंद हो जायेंगे। शायद इस योजना के गर्भ में बहुत कुछ छिपा है,शायद सरकार जो बहुचर्चित टैक्स सुधार  लागू करना चाहती  है। वह रास्ता भी इसी से निकलने वाला होगा।  जिस पर अभी से कुछ कहना उचित नहीं है वह समय समय पर बाहर आयेगा, परन्तु एक बात तय है, यह रास्ता देश को खुशहाल बनायेगा - अच्छे दिन लायेगा।

Thursday, 5 June 2014

क्यों नहीं लिख रहे डाक्टर जेनरिक दवाइओं के प्रिस्क्रिप्शन

दवाई कंपनियों और दवाई के दामों पर चर्चा कोई नई नहीं है। पेटेन्टेड दवाइओं और जेनेरिक दवाइओं की कीमतों में अन्तर पर चर्चा वर्षों से चल रही है। अब तो यह पूरे विश्व में फ़ैल चुकी है। बड़ी कम्पनियाँ अपनी दवाइओं के दाम उनकी उत्पादन लागत से हज़ारों  गुना ज्यादा वसूलती हैं। इन कम्पनियों ने इस बात पर भी बहुत हो हल्ला मचाया कि भारतीय कम्पनियां वही दवाईयां जेनेरिक नाम से बहुत ही कम कीमतों पर बेचती हैं अतः उन पर प्रतिबन्ध लगाया जाय। नोवार्टिस नाम की कम्पनी तो इस लड़ाई को उच्चतम न्यायालय तक खींच ले गई। यह दूसरी बात है कि नोवार्टिस इस लड़ाई को उच्चतम न्यायालय में जीत नहीं सकी।बाजार में दवाएं तो दोनों तरह की मिलती हैं। परन्तु डाक्टर अपने मरीजों को कौन सी दवायें लिख कर देते हैं, यह बात महत्वपूर्ण है। इसके बारे में भी बहुत सी कहानियां प्रचलित हैं। आज की महंगाई में ग्राहकों की मुसीबत यह है की वह महंगी दवायें कैसे खरीद कर खाए। इस ऊहापोह की स्थिति में सिर्फ डाक्टर ही मरीजों की मदद कर सकते हैं। परन्तु विभिन्न कारणों से यह हो नहीं रहा है।  अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत इस बारे में विचार कर रही थी कि किस तरह से डाक्टरों में इस बात को फैलाया जाये कि वो मरीज़ों को जेनरिक दवाएं ही लिख कर दें। 

महंगाई के इस दौर में मरीजों की मदद के लिए भारतीय चिकत्सा परिषद (इंडियन मेडिकल काउन्सिल ) आगे आई है।  यह संस्था देश में डाक्टरों का रजिस्ट्रेशन करती है तथा उनके लिए आचार संहिता तय करती है। इस संस्था में पंजीयन कराये बिना कोई भी डाक्टर मरीजों का इलाज नहीं कर सकता है और यदि इस संस्था को लगे कि डाक्टर ने इलाज में आचार संहिता का पालन नहीं किया है तो डाक्टर का लाइसेंस रद्द किया जा सकता है। इस संस्था ने व्यावसायिक आचरण,शिष्टाचार तथा सहिंता नियमावली 2002 की धारा 1 - 5 में स्पष्ट उल्लेख किया है - "जहां तक सम्भव हो सभी फिजिशियन ,जेनेरिक नाम से दवाइओं को लिख कर दें।  वह सुनिश्चित करें कि उनके द्वारा लिखा दवाई का पर्चा दवाओं के प्रयोग के बारे में संतुलित है।"

इंडियन मेडिकल काउन्सिल ने तो नियम बना दिया परन्तु अभी देश में यह अच्छी तरह से लागू नहीं है। अतः अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत के कार्यकर्ताओं का यह कार्य है कि वो डाक्टरों से मिलकर प्रार्थना करें कि डाक्टर अधिक से अधिक जेनेरिक दवाइयाँ ही लिखें।  देश भर में फैले इंडियन मेडिकल एसोसिएशन के पदाधिकारियों से मिलकर अनुरोध करें कि वह अपने सदस्यों को जेनरिक दवाइओं के अधिक से अधिक उपयोग के लिए प्रेरित करें