Friday, 13 May 2022

मुद्रास्फीति शिखर पर, डीजल पेट्रोल जीएसटी दायरे में लायें

खुदरा क्षेत्र की मुद्रास्फीति पिछले 10 महीनों के उच्चतम स्तर पर 7.8% पंहुच गई है। मुद्रास्फीति दर में 7.8% की वृद्धि असाधारण है। देश के वित्तीय प्रबन्धक इसके विरोध और समर्थन में अनेकों तर्क देकर इसकी अच्छी या बुरी विवेचना कर सकते हैं। परन्तु इससे सर्वहारा वर्ग की आर्थिक स्थिति में तनिक भी अंतर पड़ने वाला नहीं है। इस भयंकर मुद्रास्फीति की मार उसे ही झेलनी है, इसकी कीमत उसे अपनी संपत्ति को खोकर चुकानी है। उसे अधिक साधनहीन होना है।



सरल शब्दों में मुद्रास्फीति का अर्थ होता है कि 10 माह पहले 100 रुपयों में आप जितनी वस्तुएं खरीद सकते थे। अब उन्हें खरीदने के लिए आपको 107.80 रुपये खर्च करने पड़ेंगे, यानि यह भी कहा जा सकता है कि आपकी संचित पूंजी 7.8% कम हो गई है। सरकारी बैंकों वह अन्य विभिन्न योजनाओं में जमाकर्ताओं को मिलने वाली ब्याज की दरें 5.5% से लेकर 6.5% तक हैं। जिसका अर्थ है आपकी जमा पर बैंक व वित्तीय संस्थान ब्याज तो दे रहे हैं। परन्तु आपके धन का मूल्य 2.3% से लेकर 1.3% तक कम हो रहा है।

देश की विकास दर बढ़े, इसके लिए आवश्यक होता है कि उत्पादन बढ़े। साधारणतया उत्पादन दर में वृद्धि के लिए उद्योग क्षेत्र ब्याज दरों को घटाने की मांग अक़्सर सरकार से करते रहते हैं। ब्याज दरों पर नियंत्रण रिजर्व बैंक समय समय पर रेपो दर में बदलाव लाकर करता रहता है। जो किसी भी देश की मौद्रिक नीतियों के अंतर्गत आने वाली व्यवस्था होती है। वर्तमान वित्तीय परिस्थितियों को देखते हुए कोई संभावना नहीं है कि रिजर्व बैंक ब्याज दरों में किसी प्रकार की कटौती कर सके।

मोदी सरकार के आलोचक मुद्रास्फीति दरों के 10 माह के उच्चतम पर पंहुचने की आलोचना कर सकते हैं, परन्तु हकीकत यह है कि यूपीए शासनकाल में वर्ष 2008 से लेकर वर्ष 2013 तक मुद्रास्फीति की दर 8.35 से लेकर 11.99% के बीच रही थी, जो वर्तमान मुद्रास्फीति की दर से कहीं अधिक थी। जबकि मोदी सरकार के काल में वर्ष 2014 से लेकर आज तक मुद्रास्फीति की दर 3.3 से लेकर वर्तमान 7.8% तक रही है। इस आधार पर मोदी सरकार का वित्तीय प्रबंधन मनमोहन सिंह सरकार से कहीं बेहतर है।

वित्तीय प्रबंधन में विभिन्न आर्थिक घटकों के व्यवहार के चलते अर्थव्यवस्था के मापदंडों में नरमी गर्मी का आना स्वाभाविक है। इसके प्रभाव से ग्राहकों को बचाना या इसकी आंच ग्राहकों तक कम से कम पंहुचने देना, सरकार के वित्तीय प्रबंधकों का कार्य है। इस बात में दो मत नहीं हो सकते कि वर्तमान में मुद्रास्फीति के उच्चतम स्तर पर पंहुचने के कारणों में एक प्रमुख कारण डीजल और पेट्रोल के भावों में होने वाली निरंतर वृद्धि है। देश के प्रमुख ग्राहक संगठन अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत को वर्तमान स्थिति का पूर्वानुमान था। इसीलिए पिछले माह उसने हरियाणा के फरीदाबाद में हुई अपनी वार्षिक बैठक में डीजल व पैट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाने की मांग केन्द्र सरकार से की थी। ताकि डीज़ल पैट्रोल के दामों में होने वाली अप्रत्याशित वृद्धि के कारण अर्थव्यवस्था पर पड़ने वाले दुष्परिणामों से देश को बचाया जा सके। इस संबंध में केंद्र सरकार को गंभीरता से विचार करने तथा यदि आवश्यक हो तो डीज़ल पैट्रोल को जीएसटी के दायरे में लाने पर श्वेत पत्र प्रकाशित करने की आवश्यकता है।

Wednesday, 11 May 2022

राष्ट्रद्रोह कानून की समीक्षा का अर्थ उसका निरस्त होना नहीं?

अंग्रेजों द्वारा 152 वर्ष पूर्व 1870 में बनाये राजद्रोह कानून के औचित्य पर आज प्रश्न उठने स्वाभाविक हैं, वह भी तब जब राज्य धड़ल्ले से अपने विरोधियों को सबक सिखाने के लिए इसके दुरुपयोग में लगे हुए हैं। परन्तु राजद्रोह कानून की आवश्यकता और उसका दुरुपयोग दो भिन्न भिन्न पहलू हैं। जिनके कारण न तो राजद्रोह कानून की आवश्यकता और महत्व कम होता है और न ही उसकी उपयोगिता पर प्रश्न उठता है।


अंग्रेजों के द्वारा अपने शासन के दौरान बनाये गये इस कानून के प्रावधानों और उद्देश्यों पर होने वाली बहस से इस कानून की आवश्यकता और उपयोगिता तनिक भी प्रभावित नहीं होती। हास्यास्पद बात यह है कि इस कानून को आजादी के बाद 70 वर्षों तक ढोने वाले, इसे अधिक सख्त बनाने वाले आज सबसे अधिक ढोल पीट रहे हैं। याद रहे उच्चतम न्यायालय ने राजद्रोह कानून की धारा 124A को रद्द नहीं किया है, अभी सिर्फ इसका उपयोग उस समय तक टालने की हिदायत दी है, जब तक केन्द्र सरकार इसकी समीक्षा न कर ले। केन्द्र सरकार इसके उपयोग के संबंध में कुछ संतुस्तियां जारी करने वाली है, इस कानून का उपयोग करते समय जिनका ध्यान सरकारें रखें।

लेकिन इस कानून को लेकर देश में विपक्षियों के द्वारा जो वातावरण बनाया जा रहा है। उसे देखकर तो यह लगता है कि इस देश में देशद्रोह जैसे कानून की आवश्यकता ही नहीं है। आतंकवादी चाहे जितने विस्फोट कर लें, अर्बन नक्सली चाहे जितनी देश को खंड खंड करने की बातें कर लें, चाहे कोई देश के किसी भाग में तिरंगे को उठाने वाला न मिलने की बात कर लें, लोकतंत्र में लोगों को यह सब करने की छूट होनी चाहिए। 

महत्वपूर्ण बात यह है कि केन्द्र सरकार ने इस कानून के प्रावधानों की समीक्षा करने की बात कही है, रद्द करने की नहीं। समीक्षा होनी भी चाहिए, इसके प्रावधानों को सुसंगत बनाया जाना चाहिए, जिनका उपयोग करने के लिए कठिन और जटिल प्रक्रिया अपनाई जा सकती है। यह प्रश्न भी इसलिए उठे, क्योंकि किसी ने कार्टून बनाया, सार्वजनिक स्थान पर हनुमान चालीसा पढ़ा और उसे देशद्रोही कहकर सलाखों के पीछे भेज दिया। इस कानून की सर्वाधिक आलोचना भी अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के अधिकार में इसके हस्तक्षेप के चलते उठी है। परन्तु देश में राष्ट्रद्रोह का अपराध होगा ही नहीं, राष्ट्रद्रोह के अपराध से निपटने के लिए कानून की आवश्यकता ही नहीं, इन बातों से कोई सहमत नहीं होगा। वह भी तब, जब कुछ लोग सरकार व प्रशासन के सामने सशस्त्र विद्रोह पर आमादा हो जाते हैं।

देश उम्मीद करता है कि शीघ्र ही एक सुसंगत, कठोर व संशोधित राष्ट्रद्रोह कानून आकार लेगा, जो देश के द्रोहियों से निपटने में सक्षम होगा।

Tuesday, 10 May 2022

राष्ट्रद्रोह कानून में भी सिब्बल नेहरू को घसीट लाये

देश में जब भी किसी बदलाव की बात शुरू होती है। कांग्रेस का कोई न कोई नेता उसमें कूद कर उस बदलाव को गांधी, नेहरू से जोड़ने में तनिक भी कोताही नहीं बरतता। उच्चतम न्यायालय में देशद्रोह कानून की धारा 124A पर बहस के दौरान भी यही हुआ? कांग्रेस के कपिल सिब्बल बहस में कूद पड़े और अदालत को यह समझाने लगे कि नेहरू और गांधी भी इस धारा के सख्त खिलाफ थे।



इस देश की विडंबना यही है कि नेहरू खानदान इस देश में करना सब चाहता था, लेकिन तीन पीढ़ियों के द्वारा 70 वर्षों तक शासन करने के बाद भी किया कुछ नहीं। कपिल सिब्बल को यह कहते शर्म नहीं आई कि नेहरू 1951 में राष्ट्रद्रोह के प्रावधानों में बदलाव चाहते थे, उन्होंने कहा था,"मैं राष्ट्रद्रोह के प्रावधानों के सख्त खिलाफ हूं। इन्हें किसी भी कानून में, किसी भी कारण कोई स्थान नहीं मिलना चाहिए।" वर्ष 2013 तक बाबासाहेब के संविधान में 98 संशोधन हो चुके थे। लेकिन नेहरू की तीन पीढ़ियों में से किसी ने इस कानून की गली में झांका तक नहीं। अब जब मोदी सरकार इस दिशा में सकारात्मक और गंभीर कदम उठाने के लिए आगे बढ़ी है, तब सिब्बल को नेहरू सपने में आकर याद दिला रहे हैं।

कांग्रेसियों की बेशर्मी की हद देखिए, देशद्रोह कानून में कितने जाने वाले बदलावों को नेहरू गांधी की इच्छा से जोड़ने वाले कपिल सिब्बल स्वयं मानव संसाधन और कानून मंत्री रह चुके हैं। उस दौर में कभी भी नेहरू गांधी ने उनके स्वप्न में आकर यह नहीं कहा कि देशद्रोह कानून की धारा 124A उनकी आत्मा को अत्यधिक कष्ट दे रही है। अतः वह इस संबंध में कुछ करें।

देश अब आगे बढ़ चला है, उसे अपना इतिहास जानने में रुचि अवश्य है, लेकिन उसे न तो आजादी की लड़ाई के दौरान नेहरू के जेल पर्यटन के विषय में जानने में कोई रुचि है और न ही नेहरू द्वारा नाभा की जेल में सिर्फ 12 दिनों में हलकान होने के बाद उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने वायसराय के दरबार में नाक रगड़कर नेहरू की दो साल की सजा माफ करने की गुहार लगाई। वायसराय अपने खिदमतगार की दुहाई पर पिघले और नेहरू ने माफीनामे के साथ बांड भर कर दिया कि वह कभी भी नाभा राज्य की सीमा में प्रवेश नहीं करेंगे। उसके बाद नेहरू कभी भी नाभा नहीं गये। देश आजाद होने के बाद भी नहीं।

देश बार बार न तो नेहरू गांधी की गलतियों को याद करना चाहता है, न उनका रोना रोना चाहता है। वह भूतकाल था, गुजर गया, अब आगे की सोचो, परंतु कांग्रेसी हर बात में नेहरू गांधी को घसीट लाते हैं, उन पर चर्चा शुरू कर देते हैं, जिसके कारण देश को नेहरू और उनके बाद के कालखंड की परतें उघाड़ती पड़ती हैं। कांग्रेस के नेता शायद नेहरू खानदान के शासनकाल से खफा हैं, वह चाहते हैं कि देश उनकी कारगुज़ारियों पर लानत मलानत भेजे, इसीलिए वह सभी विषयों में नेहरू को खींच लाकर, उनकी असफलताओं को उघाड़ते हैं। जब कपिल सिब्बल कहेंगे कि नेहरू राष्ट्रद्रोह की धारा के खिलाफ थे। वर्ष 1951 में उन्होंने इसका विरोध किया था, तो प्रश्न स्वाभाविक है कि अब तक नेहरू और उनके वंशज इस बारे में अकर्मण्य क्यों रहे।

Tuesday, 3 May 2022

देश में जहांगीरपुरी आरएसएस के पैदा होने के पहले से बन रहे हैं




देश में हिन्दू-मुसलमान नया नहीं है और न ही यह आरएसएस के जन्म के बाद से हो रहा है। मुसलमानों द्वारा हिन्दुओं का गला काटना तो उस समय शुरू हो गया था, जब गांधी जी की बात मानकर हिन्दू तुर्की के खलीफा के समर्थन में मुसलमान भाईयों  के साथ गले मिल रहे थे। हिन्दू मुसलमानों की खलीफा पद्धति को स्थापित करने में ताकत लगा रहे थे और मुसलमान खिलाफत आन्दोलन समाप्त होते होते, हिन्दुओं के खिलाफ जेहाद छेड़ने की योजनाएं बना रहे थे। इसकी शुरुआत 1921 में मोपला दंगों से हो चुकी थी, जो उस समय मुसलमानों को भड़काकर हिन्दू-मुसलमान के नाम पर षड़यंत्र रच रहे थे। वही लोग आज भी षड़यंत्र रच रहे हैं, लेकिन तथाकथित छद्म सेकुलर अपने एजेंडे के तहत निशाना कहीं और साध रहे हैं।  मई 1924 को "लाहौल" नाम के मुस्लिम समाचार पत्र में यह  कविता जिसने छपवाई थी, वहीं आज भी हिन्दू मुसलमान दंगों की स्क्रिप्ट लिख रहा है, उस समय छपी कविता में लिखा गया था, "हमें किरार की गीता को जलाना होगा। हम कृष्ण की बांसुरी तोड़ेंगे। ऐ मुसलमानों तलवार उठाओ, किरारों को मारो, उनकी देवियों को नष्ट करो।"

उस समय तक आरएसएस की स्थापना नहीं हुई थी। लेकिन हिन्दू मुसलमान के बीच नफरत के बीज बोए जा रहे थे, उन्हें सहेजा जा रहा था। परंतु यह सेकुलर उस वक्त भी हिन्दू -मुसलमानों के बीच पैदा हुई नफरत की नींव डालने वालों की सच्चाई से आंखें चुरा रहे थे, यह सिलसिला आज तक बदस्तूर जारी हैं। यदि हिन्दू और मुसलमानों के बीच नफरत फ़ैलाने वाले श्रोतों पर तभी समुचित ध्यान दें दिया होता, तो शायद न तो पाकिस्तान बनता, न ही तथाकथित सेकुलरों की रोजी रोटी आज तक चलती। सेकुलर गैंग इसी कारण फलफूल रहा है, वह सच्चाई से नजरें चुरा एकतरफा उस दिशा में वार करता है, जहां इस रोग की जड़ ही नहीं है। 

आरएसएस को यह सेकुलर गैंग एक निर्धारित योजना के तहत अपने स्वार्थ पूर्ति के लिए निशाना बनाता है। इस गैंग ने देश के उन सभी महान नेताओं की बातों को हमेशा पूरी तरह अनदेखा किया, जिन के आदर्श वाक्यों को इस गैंग के लोग जब तब उद्धृत कर कर के आरएसएस पर हमला बोलते हैं। कांग्रेस के पट्टाभि सीतारमैया ने 9 व 10 सितंबर 1924 की घटनाओं के बारे में "दि हिस्ट्री ऑफ इंडियन नेशनल कांग्रेस के पृष्ठ 465, पर लिखा है, कोहाट दंगों के बारे में भारतीय विद्यालय कोहाट के प्रधानाचार्य लाला नंदलाल ने दंगों के तुरंत बाद कोहाट शरणार्थी कार्य समिति के लिए एक प्रतिवेदन का प्रकाशन किया था, जिसे पढ़कर पाठक आज भी कांप उठता है।" अन्य कई नेताओं ने भी इसी प्रकार के विचार भिन्न भिन्न स्थानों पर व्यक्त किए हैं, जिनमें एनी बेसेंट, लाला लाजपत राय, अच्युत पटवर्धन, सरदार वल्लभभाई पटेल, डा अम्बेडकर और गांधी जी स्वयं भी है। लेकिन सेकुलर तो बगीचे में गिरे रुपये को बरामदे में उस समय भी ढूंढ रहे थे और आज भी ढूंढ रहे हैं।

डा अम्बेडकर को हिंदू समर्थक नहीं माना जाता था। उनके और गांधी जी के उदाहरण आज भी प्रत्येक सेकुलर की जुबान पर आ जाते हैं। आरएसएस के जन्म पूर्व हुये हिन्दू मुसलमान दंगों पर अम्बेडकर ने अपनी पुस्तक "दि पार्टीशन आफ इंडिया" में लिखा है, 1921 के मोपला दंगे दो मुसलमान संगठनों, खुद्दमे काबा और सेन्ट्रल खिलाफत कमेटी द्वारा कराए गए थे। वह आगे लिखते हैं, "मोपला के मुसलमानों ने मालाबार के हिन्दुओं के साथ जो किया, वह चौंकाने वाला है। मोपलाओं के हाथों मालाबार के हिन्दुओं पर भयानक अत्याचार हुए। नरसंहार, जबरन धर्मांतरण, मंदिरों को तोड़ना, महिलाओं के साथ अपराध, गर्भवती महिलाओं के पेट फाड़े जाने की घटना, यह सब हुआ। हिन्दुओं के साथ सभी प्रकार की क्रूरतायें हुई, असंयमित बर्बरता हुई। मोपला के मुसलमानों ने हिन्दुओं के साथ यह सब तब तक किया, जब तक वहां सेना नहीं पंहुच गई।" यह सब सिर्फ मालाबार या कोहाट तक सीमित नहीं रहा। वर्ष 1923 तक अमृतसर, लाहौर, पानीपत, मुल्तान, मुरादाबाद, मेरठ, इलाहाबाद, सहारनपुर, भागलपुर, गुलबर्गा और दिल्ली तक पंहुच गये थे। देश में हिन्दू -मुसलमान की आंधी उस समय चल रही थी, जब आरएसएस का अस्तित्व भी नहीं था।

देश में आरएसएस को सांप्रदायिकता पर उपदेश गांधी जी का नाम लेकर सौहार्दपूर्ण वातावरण की दुहाइयां देता हुआ, कोई भी सेकुलर देने लगता है। आरएसएस के जन्म से पहले ही हिन्दू -मुसलमान पर गांधी जी क्या कह रहे थे, यह तथाकथित सेकुलर जानते तो हैं, लेकिन कहते नहीं, क्योंकि यह उनके एजेंडे के खिलाफ है। गांधी जी ने वर्ष 1924 में यंग इंडिया में लिखा,"हिन्दुओं ने मुझसे लिखित शिकायत की है कि मै मुसलमानों को संगठित करने और जागरूक बनाने का जिम्मेदार हूं। मैंने मौलवियों को बहुत प्रतिष्ठा दिलाई है। अब जब खिलाफत आन्दोलन ठंडा हो चुका है, मुसलमानों ने हिन्दुओं के खिलाफ जेहाद की घोषणा कर दी है। ...... हिन्दू महिलाओं के बारे में बंगाल से मिले समाचार ग्लानि पैदा करने वाले हैं। यदि उनमें आधी सच्चाई हो तब भी।...... मेरा निजी अनुभव इस विचार की पुष्टि करता है कि मुसलमान स्वभाव से आक्रामक होता है और हिन्दू कायर। क्या हिन्दुओं को अपनी कायरता के लिए मुसलमानों को दोषी ठहराना चाहिए । कायर तो हमेशा पिटेगा। सहारनपुर के मुसलमान अपने जघन्य कार्यों के लिए कोई सफाई नहीं दे सकते। लेकिन हिन्दू होने के कारण मैं हिन्दुओं की कायरता के कारण अधिक लज्जित हूं। मुसलमानों पर मुझे उतना गुस्सा नहीं। जो घर लुटे, उनके मालिकों ने अपनी संपत्ति को बचाने के लिए, अपनी जान पर क्यों नहीं खेल गये। जिन बहनों के बलात्कार हुते, बलात्कार के समय उनके रिश्तेदार कहां थे। मेरी अहिंसा यह नहीं कहती कि संकट के समय अपने प्रियजनों को असहाय छोड़कर भाग खड़े हों।"

मजे की बात है, कि मुसलमानों को विवाद पैदा करने वाला सिर्फ हिन्दू या हिन्दू संगठन ही नहीं कहते। अन्य धर्मों व मतों के लोग भी कहते हैं, फिर भी इन सेकुलरों की आंखें सही विवेचन करने के लिए नहीं खुलती, खुलें भी क्यों, इससे उनका एजेंडा फेल होता है। अब सात बार केरल में विधायक रह चुके ईसाई नेता पी सी जार्ज को, मुसलमानों के विरोध में विवादित सच बोलने की जरूरत क्यों पड़ी, किसी भी निष्पक्ष व्यक्ति या पत्रकार को इसकी तह में जाकर समझना लिखना चाहिए?



सेकुलर न तब हिन्दू-मुसलमान मर्ज की दवा चाहते थे, न आज चाहते हैं। उन्हें इसमें पूरे विश्व में हिन्दू विरोधी ढोल पीटने के अवसर और चंद सिक्कों की खैरात नजर आती है। कल भी यही एजेंडा चल रहा था, आज भी पूरे देश में चलाया जा रहा है। मोपला से जहांगीरपुरी तक की 100 वर्षों की यात्रा में कुछ नहीं बदला है।

Thursday, 16 September 2021

कांग्रेस,आर एस एस और स्वतंत्रता आंदोलन

 भारतीय राजनीति के क्षितिज पर अपनी रेखा दूसरे की रेखा से लम्बी दिखाने की निपुणता कांग्रेस ने दूसरे की रेखा मिटाकर हासिल की है। स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान अपनी असफलताओं को छिपाने के लिए कांग्रेस ने इसे डटकर अपनाया। यही वजह थी कि उसने स्वतंत्रता संग्राम में अपने प्राण न्यौछावर करने वाले क्रांतिकारियों को देश के स्वतन्त्रता आन्दोलन की सफलता का जरा भी श्रेय नहीं दिया। अनेकों क्रांतिकारियों पर अंग्रेजों से माफी मांगने के आरोप लगाये, जबकि कांग्रेस नेता खुद अंग्रेजों की गोद में बैठे और उन्होंने उस प्रत्येक मौके पर अंग्रेजों का साथ दिया, जब क्रांतिकारी आसानी से देश को आजाद करा सकते थे। कांग्रेस द्वारा पिछले 70 वर्षों में देश के इतिहास की तोड़ मरोड़ कर की गई प्रस्तुति के बावजूद, यह तथ्य खुद ब खुद उभर कर सामने आ रहे हैं।

विडंबना यह है कि एक अंग्रेज द्वारा 1985 में यह संगठन अंग्रेजों के प्रति सहानुभूति पैदा करने के लिए स्थापित किया गया था। देश के 1947 में आजाद होने तक कांग्रेस ने ईमानदारी से इस भूमिका का निर्वहन किया। उस पर तुर्रा यह देश की आजादी के लिए तीन असफल आंदोलन करने वाली कांग्रेस राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ जैसे संगठनों पर देश के स्वतंत्रता संग्राम में भाग न लेने के आरोप लगाकर, देश की आजादी का संपूर्ण श्रेय अपने ही खाते में डालती रही है। जबकि 1925 में जन्मा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ अपने शैशव काल में भी देश में क्रांतिकारियों और कांग्रेस द्वारा किए गए आन्दोलनों में अपनी शक्ति के अनुसार योगदान करता रहा है। जबकि राजनीति कारणों से कांग्रेस हमेशा यह झूठ प्रचारित करती रही कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आजादी के आंदोलनों से दूर रहा।

हकीकत यह है कि देश की स्वतंत्रता के लिए कांग्रेस के द्वारा किया प्रत्येक आंदोलन में देश के संपूर्ण जनमानस द्वारा पूरा साथ देने के बावजूद, यह आंदोलन कांग्रेस की अकर्मण्यता, दूरदर्शी नीति , सही कार्यक्रम एवं नेतृत्व के अभाव में बुरी तरह असफल हुये। इस विषय में थोड़ी बहुत चर्चा हुई, परंतु आजादी के बाद लम्बे समय तक सत्ता पर काबिज कांग्रेस इस विषय को दबाने में कामयाब रही?



असहयोग आन्दोलन

कांग्रेस ने 4 सितंबर 1920 में अपने कलकत्ता अधिवेशन में प्रस्ताव पास कर असहयोग आन्दोलन शुरू किया, परंतु इस आंदोलन के साथ अंग्रेजों के द्वारा तुर्की के खलीफा को अपदस्थ करने के विरोध में भारत के मुसलमानों द्वारा किए जाने वाले आंदोलन को जोड़ दिया। जिसके कारण पूरे देश का जनमानस भ्रमित हो गया कि वह देश की स्वतंत्रता के लिए आंदोलन कर रहा है या तुर्की के खलीफा को दोबारा स्थापित करने के लिए अंग्रेजों से लड़ रहा है। कांग्रेस नेतृत्व जनमानस को दिशा वह नेतृत्व दे पाने में पूरी तरह विफल था। इसी कारण उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा की घटना घटित हो गई, जिसके कारण कांग्रेस ने अपना आंदोलन वापस ले लिया। नतीजा ढाक के तीन पात रहा, न देश को आजादी मिली और न ही तुर्की के खलीफा को अंग्रेजों ने कोई रियायत दी।

देश में सिर्फ कुछ स्थानों पर यह आंदोलन अपना प्रभाव छोड़ पाया। क्योंकि वहां के नेताओं ने रणनीति भी बनाई थी, कार्यक्रम भी तय किये थे और आगे आकर जनमानस को नेतृत्व भी दिया था। इन स्थानों में मध्य प्रांत भी था, जहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के जन्मदाता डा हेडगेवार के नेतृत्व में "असहयोग आंदोलन समिति" बनाई गई। 18 अगस्त 1920 को बनाई गई इस समिति में डा घोलकर, मनोहर पंत बोबडे, आर एन पाध्ये एवं विश्वनाथ केलकर थे। असहयोग आंदोलन के लिए कार्यकर्ता तैयार करने के लिए आंदोलन समिति बाकायदा बौद्धिक एवं शारीरिक प्रशिक्षण वर्गों का आयोजन कर रही थी। डा हेडगेवार ने प्रयास कर सैकड़ों युवाओं को आंदोलन से जोड़ लिया था। 11 नवंबर 1920 को नागपुर असहयोग समिति ने एक सप्ताह असहयोग सप्ताह के रूप में मनाया, अनेकों सभायें आयोजित की गई।(महाराष्ट्र, 19मई 1921, पृष्ठ 5) वर्ष 1921 के प्रारंभ तक मध्यप्रान्त में आंदोलन की लपटें तेज हो गई थी।

22 फरवरी 1921 को डा हेडगेवार ने एक सभा में घोषणा की कि नागपुर में न तो शराब की कोई दुकान चलने दी जाएगी, न ही किसी को शराब पीने दिया जायेगा। इस सभा के बाद नागपुर के जिला अधीक्षक सुरीली जेम्स इरविन ने डा हेडगेवार को लिखित नोटिस भेजा - "मैं आप पर सभा करने, सभा में भाग लेने और किसी भी तरह से आम सभा से जुड़ने पर प्रतिबंध लगाता हूं।" डा हेडगेवार ने इस आदेश को मानने से मना कर दिया।(महाराष्ट्र, 20 अप्रैल 1921, पृष्ठ 3)

नागपुर में असहयोग आंदोलन से उच्च जातियों और पढ़े लिखे लोगों के साथ कमजोर और गरीब लोग बड़ी संख्या में जुड़ रहे थे, जिसे देखकर कर नागपुर से प्रकाशित होने वाले अंग्रेजों के समर्थक अखबार ने टिप्पणी की - जिस प्रकार के लोगों को स्वयंसेवक बनाया जा रहा है, उसे देखकर यह कहना अतिश्योक्ति होगा कि आंदोलन का शांतिपूर्ण चरित्र बना रहेगा।(महाराष्ट्र, 26 अप्रैल 1921, पृष्ठ 4)

मई 1921 में डा हेडगेवार पर राजद्रोही भाषण देने के लिए मुकदमा चलाया गया। इस मुकदमे का आधार डा हेडगेवार द्वारा अक्टूबर 1920 में काटोल और भरतवाडा की सभाओं में दिये भाषण थे।(फाइल नं 28/1921, राजनीतिक भाग 1, पैरा 17 राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली)

अदालत ने डा हेडगेवार को राजद्रोह का दोषी मानते हुए, 1 वर्ष तक इस प्रकार के भाषण न देने का आश्वासन देने के साथ ही 1 - 1 हजार रुपए की दो जमानतें और 1 हजार रुपए का मुचलका देने के लिए कहा। डा हेडगेवार ने स्वयं को निर्दोष बताते हुए जमानत और मुचलका देने से मना कर दिया। जिसके कारण न्यायाधीश ने उनको 1 वर्ष सश्रम कारावास की सजा सुनाई। मध्य भारत प्रांत से प्रकाशित केसरी, महाराष्ट्र,यंग पैट्रियट और उदया आदि अखबारों ने अदालत में डा हेडगेवार द्वारा दिये तर्कों की सराहना की, उदया ने अपने संपादकीय में लिखा - न्यायालय में डा हेडगेवार का वक्तव्य स्पष्ट एवं सरल था। यद्यपि डा चोलकर की तरह उन्होंने भी स्वतंत्रता के लक्ष्य का प्रतिपादन किया, परंतु उन्हें 1 वर्ष सश्रम कारावास की सजा दी गई। इस तरह की सजा नौकरशाही पर आधारित व्यवस्था के विरुद्ध जनसामान्य के आक्रोश एवं घृणा को नहीं रोक सकती है। (उदया, संपादक भी जी खापर्डे, भारतीय समाचार पत्रों पर रिपोर्ट, मध्य प्रांत एवं बरार, संख्या 35/1921, राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली)

डा हेडगेवार को नागपुर की अजनी जेल में रखा गया। 11 जुलाई 1922 को सजा पूरी कर डा हेडगेवार बाहर आये। अगले ही दिन चिटणीस पार्क में उनके स्वागत के लिए सभा रखी थी, जिसमें प्रांत के कांग्रेसी नेताओं के साथ कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व की तरफ से हकीम अजमल खां, मोतीलाल नेहरू, राजगोपालाचारी, डा अंसारी और विट्ठल भाई पटेल मौजूद थे। (महाराष्ट्र, 12 जुलाई 1922, पृष्ठ 5)

फ़रवरी 1922 में ही कांग्रेस उत्तर प्रदेश के चौरी चौरा की घटना के कारण आंदोलन वापस ले चुकी थी।



सविनय अवज्ञा आंदोलन

कांग्रेस का दूसरा आंदोलन सविनय अवज्ञा आंदोलन था। कांग्रेस ने फरवरी 1930 में लाहौर अधिवेशन के बाद साबरमती की सभा में सविनय अवज्ञा आंदोलन करने का निर्णय लिया। यह आंदोलन अंग्रेजों द्वारा बनाए नमक कानून के विरोध में था। आंदोलन का प्रारंभ गांधी जी ने 6 अप्रैल 1930 को गुजरात के दांडी नामक स्थान में नमक कानून तोड़कर किया।

मध्यप्रान्त के अकोला में यह आंदोलन गुरुवार 9 अप्रैल 1930 को नमक कानून तोड़कर शुरू किया गया। परंतु आंदोलन अन्य स्थानों की तरह प्रभावहीन था। कांग्रेस की प्रांतीय समिति ने आंदोलन में जान फूंकने के लिए केन्द्रीय नेतृत्व को इसमें जंगल सत्याग्रह शामिल करने की सलाह दी, जिसे कांग्रेस के केंद्रीय नेतृत्व ने स्वीकृति दे दी। इसी से स्पष्ट है कि आंदोलन शुरू करने के पूर्व आंदोलन के स्वरूप के विषय में सही जानकारी का अभाव रहा। जिसका प्रभाव आंदोलन पर पड़ा।

इस समय तक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना हो चुकी थी। नागपुर में संघ की 37 शाखाएं खुल चुकी थी। संघ का दूसरा सबसे बड़ा केन्द्र वर्धा था, जहां 12 शाखाएं थीं। इस समय देश राजनीतिक उथल-पुथल से गुजर रहा था। राष्ट्रीय आंदोलनों में संघ की भूमिका निर्धारित करने के लिए संघ ने नवंबर 1929 में संघ की एक बैठक नागपुर में की थी। तीन दिन तक चली इस बैठक में तय किया गया कि संघ कांग्रेस द्वारा घोषित आंदोलनों का पूरी तरह बिना शर्त समर्थन करेगा। 1930 के मध्य तक संघ की 52 शाखाएं बन चुकी थी। संघ के स्वयंसेवक भी सविनय अवज्ञा आंदोलन में सक्रिय हो गए।

14 जुलाई 1930 को आंदोलन में भाग लेने के लिए नागपुर से डा हेडगेवार के नेतृत्व में  एक जत्था पुसद रवाना किया गया। डा हेडगेवार के साथ अप्पा जी जोशी, बाला साहेब ढवले, दादा राव परमार्थ, विट्ठल राव देव, भैय्या जी कुंबलवार, आर्वी के अंबाडे, चांदा के पालेवार आदि प्रमुख थे। सत्याग्रह के पहले चरण की शुरुआत पुसद में एम एस अणे ने की, परंतु इसे अपेक्षित सफलता नहीं मिली। यह देखकर आंदोलन के लिए बनाई गई वार काउंसिल ने 21, जुलाई को यवतमाल में डा हेडगेवार के नेतृत्व में सत्याग्रह करने की घोषणा की, वार काउंसिल ने संघ के नेताओं से अलग अलग टुकड़ियों का नेतृत्व करने के लिए कहा।

21 जुलाई को सुबह 6 बजे स्वयंसेवकों ने नागपुर के मैदान से ध्वज वंदन कर सत्याग्रह प्रारंभ किया, सत्याग्रहियों को काटन मार्केट जाना था। वहां सत्याग्रह करना था। सत्याग्रह स्थल पर पुलिस के साथ वन विभाग के अधिकारी भी उपस्थित थे। डा हेडगेवार ने जैसे ही जंगल कानून तोड़ा, उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।

21, जुलाई की शाम डा हेडगेवार पर मुकदमा चला, न्यायाधीश भरूचे ने उनको 9 माह सश्रम कारावास तथा 379 के अंतर्गत तीन माह सश्रम कारावास की सजा सुनाई। दोनों सजायें एक साथ चलनी थी। डा हेडगेवार को ट्रेन से अकोला ले जाया गया, मार्ग में हर जगह उनका स्वागत किया गया। दारव्हा में तो कांग्रेस के नेताओं ने दाऊ के नेतृत्व में प्लेटफार्म पर सभा कर डाली, पुलिस ने भीड़ देखते हुए डा हेडगेवार को मंच पर जाने की अनुमति दे दी। डा हेडगेवार 14 फरवरी 1931 को अकोला जेल से छूटे।

उधर कांग्रेस ने आंदोलन के चलते नवंबर 1930 में लंदन में हुए गोलमेज सम्मेलन में भाग नहीं लिया। परंतु कांग्रेस सितंबर 1931 में होने वाले गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए तैयार हो गई। जिसके लिए वायसराय लॉर्ड इरविन उन सभी राजनीतिक कैदियों को छोड़ने के लिए तैयार हो गए जिन पर हिंसा के आरोप नहीं थे। बदले में कांग्रेस भी सविनय अवज्ञा आन्दोलन स्थगित करने के लिए तैयार हो गई। आंदोलन स्थगित कर दिया गया।

मार्च 1931 में कराची सम्मेलन में कांग्रेस ने गांधी जी को द्वितीय गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने के लिए अधिकृत किया। गांधी जी ने सितंबर 1931 में हुए सम्मेलन में भाग लिया परंतु कोई नतीजा नहीं निकला, सम्मेलन असफल हो गया। भारत लौट कर गांधी जी ने सविनय अवज्ञा आंदोलन पुनः शुरू किया। अंग्रेजों ने गांधी जी और कांग्रेस के अन्य नेताओं को गिरफ्तार कर लिया।

आंदोलन चलता रहा और 1934 में वापस ले लिया गया।



अंग्रेजों भारत छोड़ो आन्दोलन

सबसे पहले उस समय की देश और वैश्विक परिस्थितियों को समझ लेते हैं। क्योंकि इस आंदोलन की घोषणा में इन परिस्थितियों के प्रभाव से उपजा घटनाक्रम अत्यधिक महत्वपूर्ण है।

1 सितंबर 1939 को द्वितीय विश्व युद्ध प्रारंभ हुआ। ब्रिटेन युद्ध में भारत से सहयोग चाहता था, परन्तु कांग्रेस ब्रिटिशों से सहयोग के बदले आजादी देने की मांग कर रही थी। इसी बात को लेकर वायसराय लिनलिथगो ने 52 प्रतिनिधियों को बैठक करके लिए बुलाया। इस बैठक में गांधी जी, नेहरू और जिन्ना आदि नेता भी सम्मिलित थे। वायसराय ने कांग्रेस की किसी बात को नहीं माना और बैठक बेनतीजा रही।

सन् 1940 के मध्य तक ब्रिटेन बुरी तरह युद्ध हार रहा था। जर्मनी की सेनायें हारेंगे, बेल्जियम, डेनमार्क, नार्वे और फ्रांस को जीत चुकी थी। उधर जापान भी जर्मनी की सेनाओं की मदद के लिए आगे आ रहा था।

अंग्रेजों की इस संकट की घड़ी में देश के क्रांतिकारी योजनाएं बनाकर । उन्हें मदद करने के लिए कांग्रेस आगे आईं। 7 जुलाई 1940 को कांग्रेस कार्यसमिति ने पूना बैठक में प्रस्ताव पारित कर अंग्रेजों को सहयोग देना शुरू कर दिया। स्मरण रहे इस सहयोग के बदले कांग्रेस ने अंग्रेजों से जो रियायतें मांगी, उन्हें देने से अंग्रेजों ने मना कर दिया। इस सहयोग के विषय में गांधी जी ने कहा - "हम ब्रिटेन के विनाश की कीमत पर देश की स्वतंत्रता नहीं चाहते। " नेहरू बोले - "ब्रिटेन की कठिनाईयों में भारत का सौभाग्य नहीं है।"

7 सितंबर 1941 को जापान के युद्ध में सम्मिलित होने से अंग्रेजों की परिस्थिति और विकट हो चुकी थी। जर्मनी रूस की तरफ बढ़ रहा था। अंग्रेजों को मुसीबत में देख कांग्रेस ने दिसंबर के अंत में बारडोली में कार्यसमिति की बैठक बुलाकर, अंग्रेजों के विरुद्ध सभी आंदोलनों को स्थगित कर, अंग्रेजों का साथ देने का निर्णय लिया। यह झूठ की पराकाष्ठा है कि वही कांग्रेसी निर्लज्जता से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पर अंग्रेजों से मिले होने के आरोप लगाते हैं।

इसी बीच वैश्विक परिस्थितियों और अंग्रेजों की स्थिति देख, उस समय जापान में रह रहे प्रसिद्ध क्रांतिकारी रासबिहारी बोस ने 18 मार्च 1942 को भारतीय नेताओं  का सम्मेलन बुलाकर भारतीय स्वतंत्रता लीग और आजाद हिन्द फौज बनाने की घोषणा कर दी। इसके बाद रासबिहारी बोस की ही अध्यक्षता में 14 से 23 जून तक बैंकाक में जापान से बर्मा तक के देशों में बसे भारतीयों का एक सम्मेलन बुलाया गया। जिसमें भारतीय बड़ी संख्या में शामिल हुए और आजाद हिन्द फौज में 50,000 सैनिक भर्ती हो गए। जापान से आजाद हिन्द फौज को भारत की सेना के रूप में मान्यता देने को कहा गया।

इन वैश्विक परिस्थितियों के बीच 27 अप्रैल 1942 को कांग्रेस की इलाहाबाद में हुई कार्यसमिति की बैठक में विचार किया गया कि अंग्रेजों को अब भारत से चले जाना चाहिए। इसी के बाद 14 जुलाई को वर्धा में हुई कांग्रेस कार्यसमिति में अंग्रेजों भारत छोड़ो प्रस्ताव पास कर लिया गया। कांग्रेस नेताओं ने आंदोलन का निर्णय तो ले लिया परंतु न जाने क्यों पूर्व के आंदोलनों की विफलता से सबक लेते हुए उसकी कोई तैयारी नहीं की, न ही देश भर के नेताओं को आंदोलन के कार्यक्रमों और रुपरेखा की कोई जानकारी दी गई।

इसका पूरा खामियाजा कांग्रेस के द्वारा आयोजित इस तीसरे आंदोलन को भुगतना पड़ा। 8 अगस्त 1942 को बम्बई के गोवालिया टैंक में हो रहे कांग्रेस के वार्षिक सम्मेलन में इस प्रस्ताव को पारित कर दिया।

अंग्रेजों ने पहले दिन ही कांग्रेस के पूरे नेतृत्व को गिरफ्तार कर लिया। पूर्व तैयारी, रूपरेखा और कार्यक्रम के अभाव में पहले दिन से ही आंदोलन नेतृत्व विहीन हो गया। जहां पर जिसको जो ठीक लगा, उसी रूप में उसने आंदोलन को आगे बढ़ाया। समुचित दिशा निर्देश, कार्यक्रम और संपर्क के अभाव में देशी रियासतों के राजाओं, सरकारी कर्मचारियों, सेना, पुलिस के उच्च अधिकारियों तक आंदोलन से संबंधित जानकारी ही नहीं पंहुची।

देश के अन्य राजनीतिक संगठनों को जानकारी न दिये जाने के कारण भारतीय साम्यवादी दल व मुस्लिम लीग ने आंदोलन का खुलकर विरोध किया। इसके साथ ही अकाली दल, हिन्दू महासभा, समाज का उच्च वर्ग, दलित वर्ग कांग्रेस के पूर्व आंदोलनों से सबक लेते हुए आगे नहीं आये।

प्रारंभ से ही नेतृत्व विहीन हो जाने के कारण आंदोलन गांधी जी के अहिंसा के सिध्दांतों से हटकर हिंसात्मक हो गया।

(संवैधानिक विकास एवं स्वाधीनता संघर्ष, सुभाष कश्यप, पृष्ठ 185)
(Nehru speech in Lahore on 25 July 1945)
(पट्टाभि सीतारमैया, कांग्रेस का संक्षिप्त इतिहास, पृष्ठ 531 से 533 तक)

Monday, 8 February 2021

शहीद की परिभाषा बदलने पर तुली प्रियंका गांधी वाड्रा

 मेरे विचार में बेअंत सिंह और सतवंत सिंह शहीद नहीं थे, जिन्होंने 31 अक्टूबर 1984 को तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी पर गोलियां चलाई थी, हालांकि एक वर्ग उसी दिन से उन्हें शहीद का दर्जा दे रहा है। मेरी दृष्टि में तेन्मोझी राजरत्नम उर्फ धनु भी शहीद नहीं थी, जो पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के समीप मानव बम बनकर फटी थी। जबकि उसको भी एक वर्ग शहीद मानता है। यह दोनों ही अपराधी थे, पूरा देश इनको अपराधी के रूप में ही पहचानता है, शहीद के रूप में देश में इंदिरा गांधी और राजीव गांधी की पहचान है। लेकिन मोदी विरोध, इनकी पोती और पुत्री प्रियंका गांधी वाड्रा पर इस कदर हावी है कि वह देश में शहीद की परिभाषा को ही बदलने में जुट गई हैं। प्रियंका की शहीद की परिभाषा में बेअंत सिंह और धनु एकदम फिट बैठते हैं।

  




देश शहीद का दर्जा उस व्यक्ति को देता है, जो देश की संवैधानिक व्यवस्थाओं को बचाने में अपने प्राणों का उत्सर्जन कर देता है, उसे नहीं जो संवैधानिक व्यवस्थाओं को नष्ट-भ्रष्ट करने के लिए आक्रमण करता है और जान गंवा बैठता है। लेकिन प्रियंका गांधी आजकल शहीद की इस परिभाषा को बदलने में जी जान से जुट गई हैं। परंतु यह बात न प्रियंका को समझ आयेगी और न ही उनके पिछलग्गुओं को, जो सत्ता छिनने से इस कदर बौखलाये हुये हैं कि किसी भी कीमत पर मोदी विरोध ही उनका एकमात्र लक्ष्य है।


दिल्ली के आईटीओ पर 26 जनवरी के दिन, अंधाधुंध ट्रैक्टर भगाकर पुलिस बैरीकेड को तोड़ने और फिर ट्रैक्टर पलट जाने के कारण जान से हाथ धो बैठने वाले रामपुर के नवरीत सिंह की अंतिम अरदास में अपने कारवें के साथ शामिल ही नहीं हुई, बल्कि उसे शहीद भी घोषित कर आई। जबकि नवरीत प्रतिबंधित क्षेत्र में ट्रैक्टर घुसाने, खतरनाक तरीके से उसे चलाने, जबरदस्ती बैरिकेड तोड़ने और वहां पर ड्यूटी दे रहे पुलिस कर्मियों को जान से मारने का प्रयास करने जैसे अपराधों का दोषी है। 


दुश्मन से देश को आजाद कराने की लड़ाई में जान गंवाने वालों को शहीद का सम्मान देने की प्रथा इस देश में अवश्य रही है, अंग्रेजों की गुलामी से देश स्वतंत्र कराने की लड़ाई में जान गंवाने वालों को देश शहीद का दर्जा देता रहा है। प्रियंका गांधी वाड्रा को देश को बताना चाहिए कि उनके और कांग्रेस के अनुसार किसे शहीद का दर्ज़ा दिया जाना चाहिए। जो देश के संविधान कानून को धता बताने के कार्य करता हुआ जान दे या फिर वह जो देश के संविधान की रक्षा करते हुए अपने प्राणों को न्योछावर कर दे। नवरीत को शहीद बताने की कहीं यह तो वजह नहीं है कि प्रियंका मोदी सरकार को दुश्मन देश की सरकार मानती हैं और नवरीत ने उसके खिलाफ लड़ते हुए जान दी है।


Wednesday, 27 January 2021

विपक्ष और किसान नेताओं का प्लान फेल, लम्बे नपने की बारी

 26 जनवरी गणतंत्र दिवस पर विपक्षी राजनीतिक दलों से सांठगांठ कर, ट्रेक्टर परेड निकाल सरकार को घेरने का, किसान नेताओं का प्लान फेल हो गया है। अब यह किसान नेता लम्बे नपेंगे? राजधानी दिल्ली की सीमाओं पर पिछले 60 दिन से चल रहे किसानों का प्रदर्शन और विज्ञान भवन में सरकार के साथ की जाने वाली वार्ता की आड़ में तथाकथित किसान नेताओं द्वारा गणतंत्र दिवस पर दिल्ली को बंधक बनाने की योजना, मोदी विरोधी राजनीतिक दलों के साथ सांठगांठ कर बनाई गई थी। उनका सोचना था कि इस तरह की अव्यवस्था फैलाने पर पुलिस के साथ मुठभेड़ में कम से कम 1000 किसान मरेंगे, उसके बाद वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हाय तौबा मचाकर, हत्याओं का ठीकरा सरकार के सिर फोड़, अपने राजनीतिक स्वार्थों को साधेंगे। जाने अनजाने राकेश टिकैत के मुंह से एक पत्रकार से बात करते हुए, यह बात निकल भी गई थी कि सरकार की योजना किसानों पर लाठी गोली चलाने की है, जिसमें 1000 तक किसान मर सकते हैं।



इस देश के बेचारे किसान का दुर्भाग्य यही है कि कभी भी उसकी न्यायोचित मांगें सही तरीके से उठाई ही नहीं जाती, उसकी बदहाली का उपयोग विपक्षी राजनीतिक दल तथा उनके पिट्ठू किसान नेता अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए उसे आंदोलन करने के लिए भड़काने में करते हैं। इस बार भी यही हो रहा था, किसान को उसकी फसल का लाभकारी मूल्य मिले, इसके लिए आवश्यक कृषि सुधारों को चिन्हित कर लागू किए जाने के स्थान पर किसान नेता कानून - कानून की शतरंजी चालें खेल रहे थे, किसान और सरकार को अपनी चालों में उलझाकर, गणतंत्र दिवस के दिन देश में अनहोनी घटित करने की तैयारी में लगे थे।


किसान नेता जानते थे कि गणतंत्र दिवस पर दिल्ली में ट्रैक्टर परेड निकाल कर उन्हें क्या करना है। जाने अनजाने उनके मुंह से सच्ची बात निकल भी जाती थी। राकेश टिकैत ने पत्रकारों से कहा भी था, हम ट्रैक्टर परेड लालकिले से निकालकर इंडिया गेट तक ले जायेंगे। लालकिले और इंडिया गेट पर पंहुचना उनकी ट्रैक्टर परेड का लक्ष्य था। दिल्ली के गाजीपुर बार्डर से चल कुछे किसान लालकिले पर पहुंचे और कुछ किसान आईटीओ पर इंडिया गेट जाने के लिए अंत तक जोर लगाते रहे।


किसान नेता ऊपरी दिखावा करते हुए, गणतंत्र दिवस की पूर्व संध्या तक दिल्ली पुलिस की सभी शर्तों को मानने और कानून व्यवस्था बनाए रखने का ऊपर से नाटक करते रहे। परन्तु उनके मन में जो कपट था, वह गणतंत्र दिवस की सुबह से ही बाहर आने लगा, ट्रैक्टर परेड निकालने का तय समय दिन में 12 बजे का था, लेकिन ट्रैक्टर सुबह 9 बजे के लगभग ही कूच करने लगे और वह भी तयशुदा मार्ग से अलग दिशा में ? किसान नेताओं को मालूम था कि दिन में क्या होने वाला है, इसीलिए वह पुलिस के साथ तय शर्तों में से एक, ट्रैक्टर परेड में सबसे आगे रहकर परेड का मार्गदर्शन करने के स्थान पर वहां से नदारद हो गये और दिनभर नजर नहीं आये।


ट्रैक्टर परेड को दिल्ली में जहां जाना था, वहां गयी, उसे जो करना था, उसने किया, इसको पूरी दुनिया ने देखा। किसान नेताओं का सोचना था,  ट्रैक्टर परेड को दिल्ली में जो काम करने के लिए भेजा गया है, उसके बाद दिन में दिल्ली की सड़कों पर जो मार-काट मचने वाली है, उससे, उन्हें और विपक्षी राजनीतिक दलों को पूरी दुनिया में सरकार पर जबरदस्त कीचड़ उछालने का मौका मिल जायेगा और इस हाहाकार में उनकी कुटिल चालों की तरफ किसी का भी ध्यान नहीं जायेगा।


सरकार और दिल्ली पुलिस किसान नेताओं की इन चालों से अनजान नहीं थी, वह पूरे घटनाक्रम को अच्छी तरह समझ रही थी। सरकार और दिल्ली पुलिस बार बार ट्रैक्टर परेड में अनहोनी घटने व हिंसा होने की बात कह रही थी, जिसे किसान नेता लगातार कुटिलता से मना कर रहे थे। सरकार और दिल्ली पुलिस यदि चाहती तो ट्रैक्टर परेड को निकालने की इजाजत देने से मना कर सकती थी। परंतु इससे किसान नेताओं को सहानुभूति मिलती और किसान नेताओं की कुटिलता देश के सामने नहीं आती। 


अतएव सरकार और दिल्ली पुलिस ने इस बात को अच्छी तरह समझते हुए भी कि दिल्ली की सड़कों पर किसान नेताओं की क्या करने की  योजना है, उन्हें ट्रैक्टर परेड निकालने की इजाजत थमा दी। वह भी लिखित में शर्तों के साथ, उनसे शर्तों का पालन करने के आश्वासन भी ले लिये, अब यही लिखित प्रमाण इन किसान नेताओं की मुश्कें कसने के काम आयेंगे। लिखित में ट्रैक्टर परेड निकालने की इजाजत का कागज पाकर किसान नेता खुश थे कि उनके हाथ ट्रैक्टर परेड निकालने की इजाजत का सबूत आ गया है। अब सरकार और दिल्ली पुलिस उन पर लांछन नहीं लगा सकेगी। योगेन्द्र यादव ने मीडिया से कहा भी था, पहली बार पुलिस ने ट्रैक्टर परेड निकालने की इजाजत लिखित में दी है, इसके पूर्व तो वह मौखिक ही कह दिया करते थे। अब सुरक्षा की जिम्मेदारी दिल्ली पुलिस की है।


विपक्षी राजनीतिक दल और किसान नेता खुश थे कि सरकार को घुटनों पर लाने की उनकी योजना सफल हो गई है। इधर सरकार और दिल्ली पुलिस ने अपनी पूरी रणनीति बदल ली, अब वह किसान नेताओं के दिल में छिपी गंदगी को देश के सामने बेनकाब करने की योजना बनाने में जुट गई। 

उनकी योजना के चार मुख्य भाग थे -

1. किसान नेताओं द्वारा अपनी स्वार्थ सिद्धि के लिए देश के गौरव और अस्मिता को तार तार करने से भी नहीं चूकना।

2. किसान आन्दोलन के खालिस्तान और अर्बन नक्सलियों से संबंध होना।

3. किसानों की आक्रामकता और हिंसा चार की भावना देश के सामने लाना।

4. किसानों की आक्रामक शक्ति को सड़क पर खड़े अवरोधों में ही बर्बाद करवाना।

5. किसानों से सीधे भिड़ने से बचना, कम से कम बल प्रयोग करना।


सरकार अपनी नीति में पूरी तरह सफल रही, इसका पूरा श्रेय दिल्ली पुलिस और अन्य सुरक्षा बलों को है। देश ने पूरी दिल्ली में किसानों के द्वारा किया जाने वाला उग्र प्रदर्शन, पुलिस पर जानलेवा हमला करना देखा। इन किसानों का नेतृत्व करने वाले किसान नेताओं का बिल में छिपना भी देखा। वहीं सरकार और पुलिस का कठिन समय में भी, धैर्य और सहिष्णुता बनाते रखना देखा। सरकार और दिल्ली पुलिस उन सभी घटनाओं को टालने में सफल रही, जिनकी योजना विपक्षी राजनीतिक दलों और किसान नेताओं ने बनाई थी।


यदि सरकार और दिल्ली पुलिस मजबूत व प्रोफेशनल न होती, तो कल की घटनाओं के बाद दिल्ली में लाशों के ढेर लगे होते। आज जो देश किसान नेताओं और विपक्षी दलों को पानी पी पीकर कोस रहा है, वह किसानों के प्रति सहानुभूति और संवेदनाएं दिखा रहा होता। सरकार और दिल्ली पुलिस यह सफाई दे रहे होते कि किसानों ने ट्रैक्टर परेड की तय शर्तों को नहीं माना, दिल्ली की सड़कों पर हिंसा करने लगे। लेकिन सरकार और दिल्ली पुलिस की यह बातें नक्कारखाने में तूती की आवाज बनकर रह जाती, उनको कोई नहीं सुनता।