Saturday, 30 April 2016

'कोलस्ट्राल' सदी का सबसे बड़ा घोटाला ?

अमेरिका का कृषि विभाग प्रत्येक 5 वर्षो मे खाद्य पदार्थों के सम्बंध मे दी गई अपनी सूचनाओं का पुर्नमूल्यांकन करता है। अपनी वर्ष 2015 की सूचना मे इसने कहा है कि DGAC अपनी उस सूचना को वापस ले लेगी जिसमें उसने अमरीकियों को प्रतिदिन 300 mg से अधिक कोलस्ट्राल का सेवन न करने की सलाह दी थी। विस्तृत जांच के बाद अब जो प्रमाण सामने हैं उनके अनुसार अधिक कोलस्ट्राल युक्त खाद्य पदार्थों तथा सीरम(रक्त) कोलस्ट्राल मे कोई सम्बंध नही है। अमेरिकन हैल्थ असोसिएसन व अमेरिकन कालेज आफ कार्डियोलोजी की यह अनुशंसा है। इससे स्पष्ट हो गया है कि 1970 से  हृदय रोगों से बचने के लिए अधिक कोलस्ट्राल वाले खाद्य पदार्थों के बारे मे यह मानना गलत था कि इनसे रक्त प्रवाह बाधित होता है। अब अंडे, मक्खन, वसायुक्त डेयरी उत्पाद, मूंगफली, नारियल तेल व मांस आदि को सुरक्षित मान लिया गया है। लोगों को खाद्य पदार्थों के बारे मे सलाह देने वाली समिति अब कोलस्ट्राल छोड़ चीनी (sugar) को चिन्तित करने वाला मानकर, इस पर ध्यान केन्द्रित करेगी।

हृदय रोग विशेषज्ञ डा स्टीवन निसेन का कहना है - "यह सही निर्णय है। दशकों तक हमें खाद्य पदार्थों के बारे मे भ्रामक जानकारी दी गई। जब हम अधिक कोलस्ट्राल वाला भोजन करते हैं, तो हमारे शरीर को कोलस्ट्राल कम मात्रा मे बनाना पडता है। इसके विपरीत कम कोलस्ट्राल युक्त भोजन करने पर हमारे लीवर व शरीर को अधिक कार्य करना पडता है।"

प्रतिदिन के आवश्यक मेटाबोलिज्म के लिये हमारे शरीर को 950 mg कोलस्ट्राल की जरुरत पडती है, जिसे हमारा लीवर बनाता है। हम जो भोजन करते हैं उससे मात्र 15% कोलस्ट्राल ही मिलता है। यदि हम कम वसा वाला भोजन करेंगे तो हमारे लीवर को 950 mg कोलस्ट्राल प्राप्ति के लिये अधिक कार्य कर क्षतिपूर्ति करनी पडती है।


हमारे शरीर मे कोलस्ट्राल लीवर द्वारा ही बनाया जाता है। हमारा मस्तिष्क मूल पदार्थ कोलस्ट्रोल से ही बना है। धमनियों के सैलों को क्रियाशील रखने के लिये यह जरुरी है। कोलस्ट्राल स्टीरयाड, हार्मोन्स, एस्टोजन सहित, टेस्टोस्टीरिआन तथा कोर्टीस्टीरियाड की उत्पत्ति का आधार है। शरीर मे कोलस्ट्राल का अधिक मात्रा मे पाया जाना, इस बात का संकेत है कि व्यक्ति के लीवर का स्वास्थ्य उत्तम है।

डा जार्ज वी मान M.D. associate director of the Framingham study for the  incidence and prevalence of cardiovascular disease (CVD) and its risk factors कहते हैं - भोजन मे सेचुरेटेड फैट तथा कोलस्ट्राल कोरनरी तथा हृदय रोग का कारण नहीं। इस बात को मानना इस सदी की सबसे बडी भूल है। विशेषज्ञ कहते हैं कि LDL या HDL कुछ भी नहीं, कोलस्ट्राल शरीर मे ब्लाकेड के लिए जिम्मेदार नहीं।

यह पहली बार नहीं हुआ है। विशेष रुप से भारतीय खानपान को गलत ठहरा कर बाजार मे बहुत से उत्पाद उतार कर अरबों रूपयों की चोट ग्राहकों को दी गई। एक बार लोगों को उन उत्पादनों को बाजार मे प्रचलित होने दिया, ग्राहकों को उनकी आदत लग गई कि फिर विशेषज्ञों की राय के द्वारा उस निष्कर्ष को पलट दिया गया। यहाँ भी यही हुआ है, भारत मे जिन खाद्य पदार्थों को स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था। सभी को कोलस्ट्राल के नाम पर किनारे कर, नवीन नवीन कम कैलोरी वाले पदार्थों को सामने लाया गया। कोलस्ट्राल देश के स्वास्थ्य क्षेत्र मे खलनायक बनकर उभरा और उसने डाक्टरों, दवा उत्पादकों, शरीर मे लगाये जाने वाले कृत्रिम यन्त्रों आदि सभी की व्यापारिक परिभाषायें बदली। इतने दिन दुनिया को बेवकूफ बनाकर खरबों रुपये इधर उधर करने के बाद अन्ततः मुहर भारतीय मनीषियों द्वारा बताये खान पान के उसी व्यवहार पर ही लगी, जो हमारे देश मे सदियों से प्रचलित था। यह उन लोगों के लिये सोचने का विषय है जो अपने देश समाज से जुडी हर वस्तु रीति रिवाज को पिछडा मानते हैं, परन्तु अन्ततः उसी को मानने  को बाध्य होते हैं।

Thursday, 21 April 2016

क्यों नहीं थम रहे किसानों के आँसू ?

एड्मस्मिथ को भी अधिक से अधिक धन उत्पन्न करने की संकल्पना देते समय शायद यह बात मालूम नहीं होगी कि आने वाले समय मे उत्पादर्नो का  भी वर्गीकरण किया जायेगा, यह वर्गीकरण उत्पादन के माध्यम से धन कमाने की सूची से कुछ उत्पादनों को बाहर का रास्ता दिखाकर उनकेे सिद्धान्त को चुनौती देगा। उत्पादनों का यह वर्गीकरण एक को मालामाल तथा दूसरे को कंगाल बनायेगा। औद्योगिक क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र के उत्पादनों का यही हाल है। कृषि क्षेत्र पर देश की 62 करोड़ जनसंख्य़ा की निर्भरता अर्थशास्त्र की इस समस्या के लिये गम्भीर स्थिति पैदा कर रही है। यही वजह है कि किसानों की आर्थिक स्थिति चरमराती जा रही है। हमारे देश की बहुसंख्य आबादी का यह आर्थिक आधार होने के कारण विस्फोटक स्थिति आती जा रही है।

कृषि क्षेत्र को स्वावलम्बी बनाने तथा उसकी प्रगति का नारा देकर हम उसकी औद्योगिक उत्पादनों पर निर्भरता लगातार बढाते चले गये। यद्यपि यह सच है कि कृषि क्षेत्र मे होने वाले अनुसन्धानों और तकनीक विकास|  के कारण हम इस क्षेत्र| की उत्पादन क्षमता बढाने मे सफल हुये। परन्तु इससे कृषि की उत्पादन लागत बहुत अधिक बढाने के साथ साथ हमने अपनी भूमि की उर्वरकता से भी अनेको स्थानों पर समझौता करना पड़ा है। इसके बावजूद हम आज तक न तो उत्पादनों की विशिष्टता के अनुसार भूमि चिन्हित कर पाये हैं, न ही किसान को समुचित आर्थिक आधार दे पाये। कृषि विकास की योजनाओं मे निवेश करते समय ध्यान इस बात पर दिया जाना था कि कृषि कार्य मे प्रयोग किये जाने वाले संसाधनों की कीमतें बढने के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति भी इतनी मजबूत हो कि वह इन संसाधनों की बढती कीमतों का बोझ उठाने मे सक्षम हो। हमने कृषि मे प्रयोग किये जाने वाले  संसाधनों की कीमतें तो बेइन्तिहा बढा दी, परन्तु किसानों को बीच मझधार मे छोड़ दिया, जिसका नतीजा सामने है।

आज २१वीं सदी मे भी देश की कुल आबादी का ५२ प्रतिशत हिस्सा आय के लिये कृषि पर आश्रित है। यदि हम आजादी के बाद के ६७ वर्षों के कालखंड में बनाई विभिन्न योजनाओं मे कृषि को दिये प्रश्रय पर द्रष्टि डालें तो निराशा ही हाथ लगती है। अब यह योजनाकारों का कौन सा गणित था कि देश मे प्रतिवर्ष १ लाख ८० हजार बच्चों के जन्म लेने की परिस्थितियां सामने होने के बावजूद, न तो हमने कृषि के लिये अधिक भूमि संरक्षित की, न ही कृषि योग्य भूमि के लिये आवश्यक संसाधन जुटाने के पर्याप्त प्रयास किये। उल्टे हमने वर्ष २००७ मे खेती के लिये उपलब्ध १७ करोड़ हैक्टेयर भूमि मे से ५करोड़ हैक्टेयर भूमि उद्योगपतियों को SEZ बनाने के लिये देकर, खेती योग्य भूमि घटाकर १२ करोड़ हैक्टेयर कर ली। विडम्बना देखिये,इसमे भी मात्र ५ करोड़ हैक्टेयर भूमि पर ही सिंचन सुविधायें उपलब्ध हैं, शेष ७ करोड़ हैक्टेयर भूमि पर तो आज भी खेती भगवान भरोसे हो रही है। इन स्थितियों मे किसान और गांवों को जहां जि हालत मे होना था वहीं पर हैं।

देश मे किसान आत्महत्या छूत की बीमारी की तरह फैलती जा रही हैं। पहले विदर्भ तक सीमित यह| बीमारी आज मराठवाड़ा, बुन्देलखंड, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना तक पांव पसार चुकी है। इन आत्महत्याओं के कारणों का विश्लेषण करने पर जो बात सामने आती है। वह किसी भी लोकतान्त्रिक देश का सिर शर्म से झुकाने के लिये पर्याप्त है। आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय मे इससे सम्बन्धित जो तथ्य सामने आये हैं, उनके अनुसार आन्ध्र मे ही अगस्त २०१५ से फरवरी २०१६ के बीच कम से कम ३४१ किसानों ने आत्महत्यायें  की हैं। रितु स्वराज वेदिका (RSV) नामक संस्था द्वारा किये गये सर्वेक्षण मे यह बात साामने आई है। संस्था के कार्यकर्ताओं द्वारा उन परिवारों से मिलने के बाद, जिनममे आत्महत्यायें हुई हैं, जो तथ्य सामने आये हैं, वह किसी भी लोकतान्त्रिक देश व समाज को शर्मशार करने के लिये पर्याप्त है। यह कैसी अर्थव्यवस्था है जो धनी उद्योगपतियों को ४ लाख करोड़ रुपये हजम करने केे लिये दे देती है, परन्तु गरीब किसान को अपनने पास तक फटकने नहीं देती। सर्वे मे ४० किसान परिवारों से सम्पर्क करने पर मालूम हुआ कि सिर्फ ५ परिवारों को ही बैंकों ने कर्ज दिया था, और यह कि उन पर ४.२७ लाख रुपये  का औसत कर्ज था। ३५ किसान साहूकारों से कर्ज लेने और २४ से ६० प्रतिशत तक ब्याज चुकाने को मजबूर थे। ४० मे से ३९ लोगों द्वारा आत्महत्या करने का कारण सूखे आदि के कारण फसल नष्ट होना और समय पर सरकारी सहायता न मिलना है। 

वर्तमान सरकार के बजट को किसानों का बजट बताकर इसकी बहुत सराहना हुई। यह बात ही इस बात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि पिछले दशकों मे किसान और कृषि की कितनी बुरी तरह उपेक्षा की गई। जबकि इस बजट मे किसानों के लिये योजनाओं पर धन उड़ेलने जैसी कोई बात नहीं है। कृषि क्षेत्र को इस बजट मे मात्र १२,४२९ करोड़ की रकम आवंटित की गई है, जिसमे ११,६५७ रु कृषि और ७७२ करोड़ रुपये सिंचन के लिये हैं। अन्दाज इसी से लग जायेगा कि देश की ६२ प्रतिशत जनसंख्या के हिस्से मे आई इस रकम की ३२ गुना  रकम तो उद्योग सिर्फ बैंकों से लेकर डकार चुके हैं, इसमें यदि उन्हे उपलब्ध कराये गये अन्य संसाधनों को भी जोड़ दिया जाये तो यह रकम १०० गुना से भी ऊपर पँहुच जायेगी। इस बात मे सन्देह नहीं कि इन ६७ वर्षों मे सरकारों ने यदि इस क्षेत्र मे उचित निवेश किया होता तो हम इजरायल, आस्ट्रेलिया व कनाडा जैसे देशों के समकक्ष होते। देश मे रोजगार, शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन, ग्रामीण जीवन स्तर, किसान आत्महत्या जैसी अनेको समस्याओं के मकड़जाल मे न उलझे होते।

विडम्बना ही है कि देश मे एक लीटर पानी एक किलो गेँहू से अधिक दाम पर बिक रहा है। वह एक किलो गेँहू जिसे पैदा करने के लिये किसान न जाने कितना खून पसीना बनाकर बहा देता है और यह सरकार, समाजसेवियों, अर्थशशास्त्रियों, योजनाकारों मे किसी को दिखाई नहीं दे रहा है। देश के अच्छे दिनों की चाबी इसी पहेली के हल मे है। परन्तु इसका हल वर्तमान अर्थनीति के पास नहीं है, क्योंकि उसे तोड़ मरोड़ कर इतना विकृत किया जा चुका है कि सुधार सम्भव नहीं । इसके लिये हमे वैकल्पिक मार्ग तलाशनाा होगा। वर्तमान मे समूचा विश्व इस असमानता की अर्थनीति की जकड़न मे छटपटा रहा है।

Sunday, 10 January 2016

GST - बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना (ग्राहक)

GST अर्थात गुड्स व सर्विस टैक्स आजकल सुर्खियों मे है । संसद इसे पारित कर दे, यह लागू हो जाये तो देश को अलादीन का चिराग मिल जाये। तिलमिलायी कांग्रेस इस अलादीन के चिराग को सरकार के हाथ से दूर रखना चाहती है। इसलिये जब तब बनती दिखती बात अन्त मे बिगड ही जाती है।


GST मे अनेको हिस्सेदार हैं केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, उद्योग, वर्तमान मे टैक्स वसूलने वाले विभिन्न विभाग और जिससे GST मे ली जाने वाली रकम की एक एक पाई वसूली जानी है वह ग्राहक। सभी हिस्सेदारों ने अपना अपना नफा नुकसान अच्छी तरह देख समझ लिया है। यही नहीं अपने हित साधने वाली बातें मनवा भी ली हैं।  सिर्फ ग्राहक को छोडकर, उसे नहीं मालूम क्या होने वाला है, कैसे उसके दिन बहुरेंगे। बस उसे तो सब बेगानी शादी का दीवाना अ्ब्दुल्ला बनाने पर तुले हैं।

ग्राहक आन्दोलन का कार्यकर्ता होने के कारण यह बात तो समझ आती है कि GST लागू होते ही अनेको वस्तुओं सेवाओं पर लगने वाले टैक्स की रकम जो अभी 8 से 12% है 18% हो जायेगी, परन्तु इसके लागू होने से ग्राहक को मिलने वाला कोई एक लाभ भी मुझे दूर दूर तक नजर नहीं आता। देश के 125 करोड ग्राहक फिर भी GST का स्वागत करने को तैयार हैं। बशर्ते सरकार घोषणा करे कि वह उत्पादनों और सेवाओं की उन कीमतों को सार्वजनिक करेगी जिन पर GST वसूला जायेगा।

Friday, 16 October 2015

दालें दुर्लभ वस्तुओं मे शामिल

भारतीय दलहन शोध संस्थान के अनुसार वर्ष 2030 तक देश की जनसंख्या 1.6 बिलियन पँहुच जायेगी और उसे 32 मिलियन टन दालों की आवश्यकता पडेगी। इस लक्ष्य के अनुसार देश को प्रतिवर्ष दलहन के उत्पादन मे 4.2% बढोत्तरी करने की जरूरत है। देश मे दलहन उत्पादन का अब तक का इतिहास बहुत निराशाजनक रहा है। पिछले 40 वर्षों मे दलहन का उत्पादन देश मे 1% वार्षिक से भी कम गति से बढा है। जबकि देश की जनसंख्या इससे दुगनी गति से बढी है।

दशकों से हमारे नेताओं द्वारा इस क्षेत्र की उपेक्षा ही वर्तमान हालातों की जिम्मेदार हैं। बलराम जाखड और शरद पवार जैसे कृषि मन्त्री यह योजनायें तो बनाते रहे कि हम अफ्रीका, बर्मा और उरूग्वे जैसे देशों मे दाल की खेती करवाकर वहां से दाल आयात करें। परन्तु उन्होने यह कभी नहीं सोचा कि देश का किसान दाल की खेती से क्यों भाग रहा है। उसे कैसे प्रोत्साहित किया जाये। दालों का जोत क्षेत्र कैसे बढाया जाये। दालों की प्रति हेक्टयर उपज बढे, इसके लिये क्या किया जाये। अतः हम आज जिस स्थिति मे हैं, उसके बीज हमने वर्षों पूर्व बोये थे। मजे की बात यह कि दालों का उपभोग करने वाला बडा देश होने के बावजूद हम इसके महत्व को नहीं समझे, आस्ट्रेलिया समझ गया, 1970 मे हमसे 400 ग्राम दाल के बीज लेकर गया। 10 वर्ष बाद उसका दलहन का जोत क्षेत्र था 90 लाख हेक्टयर, आज वह हमारे देश को दाल निर्यात कर रहा है। मालाबी जैसे छोटे देश भी हमे 5000 टन दाल आयात करने की स्थिति मे हैं। ।

यद्यपि दालों के लिये हमारा देश विश्व का सबसे बडा उत्पादक, उपभोक्ता व आयातक है। दुनिया की कुल दाल की खेती के एक तिहाई भाग मे हम दाल की खेती करते हैं। दुनिया के दाल उत्पादन का 20 प्रतिशत उत्पादन हमारे यहां होता है। परन्तु हम अपनी जरूरत से काफी पीछे हैं और हमने इसपर उचित ध्यान भी नहीं दिया, क्योंकि आजादी के बाद भी हमारे शासक नेता अंग्रेजों की मानसिकता मे जी रहे थे। अंग्रेज दाल का उपयोग करते नहीं हैं, इसे दूसरे दर्जे का अनाज मानते हैं। हमारे नेताओं ने भी यही किया दाल को दूसरे दर्जे का अनाज मानकर इसके विकास पर समुचित ध्यान ही नहीं दिया। गेंहू - चावल मे ही लगे रहे, देश मे दाल की कमी को आयात के सहारे पूरा करते रहे।

देश मे दाल उत्पादन की तरफ उचित ध्यान न देने के कारण किसान इस फसल की ओर आकर्षित नहीं हुये क्योंकि लम्बी अवधि की फसल होने साथ इसमे कीटों व बीमारियों का खतरा अधिक था, अच्छे बीजों की कमी भी थी, दूसरे किसान को बाजार मे दलहन की फसल के खरीदार भी नहीं मिलते थे। 2008 से सरकार ने दालों के समर्थन मूल्य की घोषणा जरूर शुरू कर दी, परन्तु सरकार द्वारा खरीद न करने के कारण किसान को व्यापारियों पर ही आश्रित रहना पडता है। इन कठिनाईयों की तरफ सरकार ने ध्यान नहीं दिया, किसान दलहन की फसलों से किनारा करते रहे। नतीजतन 1980 - 81 मे 22.46 मिलियन हेक्टयर मे 10.63 मिलियन टन के उत्पादन को 35 वर्ष बाद 2013 - 14 मे हम 19.7 मिलियन टन तक ही पँहुचा पाये। सरकार द्वारा इस ओर देर से ध्यान देने के कारण हम काफी पिछड चुके हैं। कुछ दिन पहले ही चने और तुवर की 100 दिनों मे तैयार होने वाली फसल खोजने मे हमे सफलता मिली, दक्षिण भारत के लिये JG-11 नाम की किस्म भी तैयार की गई है। परन्तु 760 किलो प्रति हेक्टयर की  पैदावार को अन्य देशों की तरह 1200 किलो प्रति हेक्टयर तक ले जाना शेष है। संक्षेप मे कहें तो दलहन उत्पादन के लिये देश मे अनुसन्धान, किसानों को प्रोत्साहन, बुआई के क्षेत्र को बढाना, पैदावार को बढाना आदि महत्वपूर्ण चुनौतियां देश की सरकार के सामने हैं।

वर्तमान बाजार को देखें तो अनियमित वर्षा ने  30% फसल बरबाद कर दी। 2013-14 मे 19.25 मिलियन टन की तुलना मे 17.3 टन दलहन का ही उत्पादन हुआ। दूसरे देशों मे भी फसल खराब हुई है, जिससे कीमतों मे 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। डालर की तुलना मे रूपये की गिरावट ने स्थिति को और बिगाडा है। यद्यपि सरकार द्वारा आयात की गई 10,000 टन तुवर, उडद दाल प्रक्रिया मे है। 5000 टन दाल और आयात की जा रही है। कठिन हालातों के बावजूद इस तरह की परिस्थितियों का अनैतिक लाभ उठाने वालों की भी कमी नहीं है। जमाखोरों द्वारा मुनाफाखोरी के लिये माल बाजार से गायब करने के चलते हालात अधिक खराब हुये हैं। सरकार को जमाखोरों पर कठोर कार्यवाही करने की जरूरत है, तभी ग्राहक को थोडी बहुत राहत मिलनी सम्भव है। वरना ग्राहक की दाल गलनी कठिन है।

Thursday, 15 October 2015

सावधान रहकर ऑनलाईन मार्केटिंग का लाभ उठायें

अॉन लाईन शापिंग कम्पनियों  की आजकल बाढ आई हुई है। घर पर बैठकर फुर्सत से खरीदारी वह भी दुनिया भर के ब्रान्डों की, बाजार से सस्ते दामों पर, घर पँहुच सेवा और न जाने क्या क्या। आज के  समय मे यदि आप अॉनलाईन शॉपिंग से परिचित नहीं, अॉनलाईन शॉपिंग नहीं करते तो आप पिछडते जा रहे हैं। इस आधुनिक मार्केटिंग तकनीक का लाभ उठाने से वंचित हैं।

समय परिवर्तनशील है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे नये नये प्रयोग हो रहे हैं। एल्विन टॉफलर की 3rd वेव थ्योरी रंग ला रही है। अब तक के निर्धारित नियम व व्यवस्थायें ध्वस्त हो रही हैं, उनके स्थान पर नवीन व्यवस्थायें जन्म ले रही हैं। नये सिद्धान्त बन रहे हैं। जिनके चिन्ह हमे अपने आसपास प्रचुरता मे दिखाई देते हैं। हम किसी भी नयी  व्यवस्था को अपनाने से सिर्फ इसलिये मना नहीं कर सकते, क्योंकि अबसे पहले की व्यवस्था अलग तरह की थी। समाज, उत्पादन तथा बाजार मे जो paradigm shift हो रहा है, हमे उससे ताल जरूर मिलानी है। यह दीगर बात है कि हम उस नवीन व्यवस्था का कितना और कैसे उपयोग करते हैं। अतः ऑनलाईन मार्केटिंग का जड़ से विरोध करना बेमानी है।

बाजार मेे ग्राहक को उत्पादन मंहगे मिलने के सम्बन्ध मे अधिकतर अर्थशास्त्रियों का अभिमत बाजार मे बडी संख्या मे बिचौलियों का होना बताया जाता था। कहा जाता था इसीकारण बाजार मे उत्पादन अपनी उत्पादन लागत से बहुत अधिक दामों पर बिकता था।अॉन लाईन कम्पनियों ने एक बात तो स्पष्ट कर दी कि इसने व्यापारी या बिचौलियों को जो ग्राहकों को 9 रु की वस्तु 90रु मे बेचकर बेहिसाब लूट रहे थे, किनारे बैठाकर, ग्राहकों को अतिरिक्त लाभ का हिस्सेदार बना  दिया। बाजार मे सम्पत्तियां अत्यधिक मंहगी होने का लाभ भी ऑनलाईन कम्पनियों को मिला। जब तक यह लाभ ग्राहक को मिलता है, इसे लेेने मे कोई हर्ज नहीं। वैसे ऑनलाईन कम्पनियों मे भी यह विचार तेजी से पनप रहा है कि जो दिखता है वह बिकता है। इसलिये ऑनलाईन कम्पनियां बडे बडे शहरों मे अपने शो रूम खोलने परभी विचार करने लगी हैं। उनका यह भी मानना है कि इस प्रकार वह अपने ग्राहकों को और बेहतर सेवायें दे सकेंगी।

अॉन लाईन कम्पनियों ने उत्पादन मूल्य और विक्रय मूल्य के विशालकाय अन्तर को देश के सामने स्पष्ट कर दिया है। वस्तुओं की कीमतों मे बाजार और अॉन लाईन कम्पनियों मे विशालकाय अन्तर इसीलिये दिखाई देता है, क्योंकि उत्पादक उत्पादन लागत से बहुत अधिक कीमत एम आर पी मे लिखते हैं। टैक्स चोरी जैसी बातें अॉन लाईन व्यवसाय मे तथ्यहीन हैं। इतनी जगह लिखापढी होती है कि टैक्स  वसूलने वाले विभागों की ये आसान पकड मे हैं। ग्राहक कानून भी इन कम्पनियों पर पूरी तरह लागू है। ग्राहक उपभोक्ता फोरम मे जा सकता है।

परन्तु प्रत्येक चमकने वाली वस्तु जिस तरह सोना नहीं होती, उसी तरह थोडी सी असावधानी ग्राहक के लिये समस्या भी खडी कर सकती है। अत: ग्राहकों को इन कम्पनियों से खरीदारी करते समय अलग तरह की सावधानियां अपनाने व सतर्क रहने की आवश्यकता है।

१. बाजार की खरीदारी की तरह इसमे भी समय लगायें। सिर्फ उत्पादन की फोटो देखकर वस्तु न खरीदें।
२. कई बार देखा गया है कि वस्तु का चित्र ब्रान्डेड कम्पनी का होता हैै, परन्तु विवरण दूसरा लिखा होता है। अत: पूरा विवरण पढने के बाद, चित्र से उसे मिलाकर सुनिश्चित होनेो के बाद ही आर्डर दें।
३. वस्तु के साथ दी जानकारी को पूरा पढें, समझें। यदि फिर भी वस्तु के विषय मे कोई शंका है तो आर्डर देने से पूर्व कम्पनी से लिखकर पूछ लें।
४. किसी ब्रान्ड की वस्तु और उसके जैसी वस्तु मे बहुत अन्तर होता है। अत: like, type या as जैसे शब्दों के चक्र मे न उलझें।
५. वस्तु के मूल्य को आर्डर देने से पूर्व स्थानीय बाजार मे सुनिश्चित कर लें। अनेको बार वस्तु उसी दाम पर या सस्ती स्थानीय बाजार मे मिल जाती है।
६. जहां तक सम्भव हो payment on delivery option का उपयोग करें।
७. वस्तु सन्तोषप्रद न होने पर शिकायत तुरन्त करें।
८. आप जिस कम्पनी को आर्डर कर रहे हैं, उसके बारे मे अच्छी तरह समझ लें। आजकल बहुत सी नकली कम्पनियां भी धोखाधडी करने के लिये सक्रिय हैं।

Wednesday, 12 August 2015

सम्पूर्ण विश्व की अर्थनीति पर पुनर्विचार आवश्यक

50 वर्ष पूर्व दीनदयाल उपध्याय जी को यह अहसास हो चला था कि विश्व जिस अर्थनीति मे मानव जीवन के विकास की अपार सम्भावनायें मानकर आगे बढ़ रहा है, वह एकांगी है। उसमे सहअस्तित्व के विचार का कोई स्थान नहीं है। वह जानते थे कि यदि हमें स्थाई विकास प्राप्त करना है तो इस सहअस्तित्व को स्वीकार ही नहीं, इसका संरक्षण भी करना पडेगा। उन्हे मालूम था कि जिन भौतिक संसाधनों के भरोसे हम स्वयं को विकास की दौड़ मे शामिल रखते हैं, वह प्रकृति से प्रदत्त हैं, अतः प्रकृति व सृष्टि के अन्य तत्वों से समरूप या एकरूप हुये बिना विश्व के लिये स्थाई कल्याणकारी अर्थनीति ढूंढ पाना संभव नहीं, एकात्म मानव दर्शन का उदय इसी तत्कालीन वैश्विक परिवेष की उत्पत्ति है। परन्तु उस कालखंड मे हम अपने देश की भौगोलिक, सामाजिक व प्राकृतिक विविधताओं को दरकिनार पश्चिमी विकास चक्र के रंग मे इस कदर सराबोर थे कि हम अपने खरे सोने को मिट्टी समझने की भूल कर रहे थे। मुझे याद है एक बार मै अपने कुछ समाजवादी, साम्यवादी मित्रों के साथ चर्चा कर रहा था, वह समझने को तैयार ही नहीं थे कि यह सूत्र दर्शन अपने मे विश्व कल्याण का मन्त्र संजोये है। ठीक उनकी तरह तब देश ने भी नहीं समझा। आज जब विश्व मे जीव विज्ञान, राजनीति, भौतिक विज्ञान, अर्थ विज्ञान को देखने परखने का नजरिया बदलने लगा है, इन सभी शास्त्रों को खंड खंड न देखकर, आसपास मौजूद अन्य अवयवों के कारण पड़ने वाले प्रभावों को भी संज्ञान मे लेने की, wholestic systematic approach की बात होने लगी है, जिसके कारण आज एकात्म मानव दर्शन की सार्थकता दुनिया के सामने स्पष्ट हो रही है।

दीनदयाल जी को समय मिलता तो निश्चित रूप से वह अपनी सिध्दान्त रूप मे कही बात की व्याख्या करते। परन्तु अर्थनीति की दिशा और उसके विश्व समुदाय पर पड़ने वाले प्रभाव दीनदयाल जी समझ चुके थे।  उन्होने कहा था - "साध्य और साधन का विवेक समाप्त हो रहा है। अर्थोत्पादन जीवन का आवश्यक आधार ही नहीं सम्पूर्ण जीवन बन गया है।" पंडित जी अपनाई जाने वाली पश्चिमी नीतियों और उसके समाज पर पड़ने वाले प्रभाव को लेकर चिन्तित थे। आगे उनका कहना था -  "साध्य का पता लगे बिना साधन का निश्चय कैसे हो सकता है। हमारी परम्परा और संस्कृति हमे यह बताती है कि मनुष्य केवल भौतिक आवश्यकताओं और इच्छाओं का पिण्ड नहीं, अपितु वह एक आध्यात्मिक तत्व है।" उस समय की भौतिक नीतियों मे अध्यात्मिक तत्व की अनुपस्थिति का मर्म और कालान्तर मे विश्व पर उसके सामाजिक प्रभावों को दीनदयाल जी जैसा व्यक्तित्व ही समझ सकता था। वह परिणामों से आशंकित थे। आज विश्व प्रगति के किसी भी शिखर को रौंदने मे सक्षम क्यों न हो, सामाजिकता के स्तर पर तो वह धूलधूसरित फर्श पर उखडी सांसें लेता नजर आता है। आज भी 5300 मिलियन जनसंख्या वाले विश्व मे 1000 मिलियन लोग हैं जिन्हे भरपेट भोजन नहीं मिल पाता (Lean,Hinrichsen& Markham 1990). आर्थिक विषमताओं से भरे वर्तमान प्रगतिशील विश्व मे - सर्वे भवन्तु सुखिनः कैसे कह सकेंगे, जब अपनाई जाने वाली अर्थनीति दुनिया की आधी से अधिक सम्पत्ति पर मात्र 2 प्रतिशत लोगों को काबिज करा दे और आधी दुनिया मात्र 1 प्रतिशत सम्पत्ति बांट कर उस पर गुजारा करे।

भारत की रग रग से वाकिफ गांधी जी को दरकिनार कर जब देश ने पश्चिमी अर्थनीति की तरफ कदम बढ़ाये थे, तभी स्पष्ट हो गया था कि देश प्रगति तो करेगा, परन्तु इसका दायरा सीमित होगा, देश का बहुत बड़ा वर्ग इससे वंचित रहेगा। 2012 की जनगणना के आंकड़े इस स्थिति को स्पष्ट कर रहे हैं। दीनदयाल जी जानते थे कि देश का एक प्रभावशाली वर्ग पश्चिमी व्यवस्था की तरफदारी इसलिये कर रहा है क्योंकि यह उसके हितों के अनुरूप है। पंडित जी कहते थे -  "भारत मे ऐसे लोग भी बहुत बड़ी संख्या मे हैं जिनके हित पाश्चात्य अर्थव्यवस्था और उत्पादन प्रणाली से जुड़े हैं। जिस अर्थव्यवस्था का भारत मे विकास हुआ उसने भारत और पश्चिम के औद्योगिक देशों की व्यवस्थाओं को एक दूसरे का पूरक बनाया। जिसमे भारत के हितों का संरक्षण नहीं हुआ, बल्कि उसका शोषण होता रहा है"। दीनदयाल जी जानते थे कि विश्व विकास का नाम लेकर, जिस अर्थनीति का पीछा कर रहा है, अन्ततोगत्वा वह विश्व के लिये कल्याणकारी नहीं होगी। वह अर्थनीति के साध्य और साधन दोनो की स्पष्टता को लेकर चिन्तित थे।  अर्थनीति मे नैतिक मूल्यों के अभाव व उसके कारण पड़ने वाले प्रभाव से वह चिन्तित थे , उनका कहना था - "जिस पश्चिम का अनुकरण कर हम अपने अर्थनैतिक मूल्यों की प्रतिस्थापना कर रहे हैं, वहां जीवन के इस सर्वग्राही भाव के लिये कोई स्थान नहीं है।  फलतः आज हमारे मन, वचन और कर्म मे अर्न्तविरोध उत्पन्न हो गया है"। भारतीय चिन्तन से विमुखता हमें सही मार्ग पर ले जाने की जगह भटकाव की स्थिति मे पँहुचा देगी, वह महसूस कर रहे थे - "अर्न्तचेतना और बाह्यकर्म दो विरोधी दिशाओं में खींच रहे हैं। जो कुछ भी हम करते हैं, अन्यमनस्क भाव से और जब हमे अपने प्रयास सफल होते हुये ही नहीं दिखते तो मन में विफलता, आत्मज्ञान और आत्मविश्वासहीनता का भाव उत्पन्न होता है"। अन्यमनस्क स्थिति से उबरने और उभरने के लिये विश्व को सर्वहितकारी कल्याणकारी मार्ग की आवश्यकता थी, दीनदयाल जी का एकात्म मानव दर्शन का सूत्र इसी परिप्रेक्ष्य मे है।

बिलासपुर मे प्रवास के समय एक बुजुर्ग से भेंट हुई, वह संशय  व्यक्त कर रहे थे कि दीनदयाल जी की नीतियां पुरानी पड़ चुकी हैं। वर्तमान मे कैसे लागू हो सकती हैं। वैसे वह दीनदयाल जी के भक्त थे या तो उनकी आयु अभ्यास मे बाधक थी या फिर वह हमारी परीक्षा ले रहे थे। लेकिन यह चिन्ता बहुत लोगों की हो सकती है, उन्हे जान लेना चाहिये, कोई भी सिध्दान्त सूत्र रूप मे होता है। उसे देश, काल, परिस्थिति के अनुरूप अपनाना पड़ता है और फिर पंड़ित जी के एकात्म मानव दर्शन का आधार तो हजारों वर्षों की तपस्या से विकसित जीवन के मूलभूत, चिरन्तन सत्य पर आधारित भारतीय दर्शन है, जो चिरस्थाई है, कभी पुराना न पड़ने वाला, सभी के कल्याण के विचार वाला है। दीनदयाल जी ने उस समय अधिक से अधिक लोगों को रोजगार मिले, अतः साठवें दशक की परिस्थितियों के अनुरूप, गांवों मे रहने वाली देश की बहुसंख्य आबादी के विकास हेतु कृषि क्षेत्र पर अधिक ध्यान देने पर जोर दिया था। कुल मिलाकर लब्बोलुआब यह था कि दुनिया मे धन का बँटवारा इस तरह हो कि अन्तिम छोर पर बैठा व्यक्ति भी विकास के फलों का स्वाद चख सके। परन्तु उस समय पश्चिमी विश्व स्वयं को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ मे था और हम पश्चिम को श्रेष्ठ मानने की दौड़ मे। नतीजतन आज पूरी दुनिया उस स्थिति मे पँहुच चुकी है जिसमे दुनिया की 1 प्रतिशत आबादी एवरेस्ट की चोटी पर है और आधी से अधिक आबादी गहरी खाई मे। इन दोनों को समीप लाने का असम्भव कार्य करना है। यदि दोनो छोरों पर बैठने वालों का विश्लेषण करें तो यह तथ्य सामने आता है कि शीर्ष पर बैठा 1 प्रतिशत वर्ग उद्योग या व्यवसाय से जुड़ा है, जबकि नीचे वाली आधी आबादी खाद्यान्न पैदा करने वाली व्यवस्था अर्थात कृषि या उससे सम्बन्धित व्यवसाय से जुड़ी है। जिसका सीधा अर्थ है कि विश्व मे धन का बहाव गरीब व्यक्ति से या कृषि से उद्योग की तरफ है। जिसके कारण अधिकांश आबादी के द्वारा अर्जित किया जाने वाला धन, उनके हाथों से फिसलकर उद्योजकों के पास चला जाता है। सभी के कल्याण की बात सोचने का अर्थ है, धन के इस स्थानान्तरण को रोकना। पश्चिमी अर्थनीति के पास इसका कोई निराकरण नहीं है, परन्तु दीनदयाल जी के एकात्म मानव दर्शन की सर्व कल्याणकारी व्यवस्था मे इसकी उपाय योजना है।

उद्योजकों के पास इतना अधिक धन इसलिये जमा हो गया है, क्योंकि वर्तमान आर्थिक व्यवस्था मे अन्य लोगों के पास धन रूकने नहीं दिया गया। दुनिया के उद्योजकों ने अपने उत्पादनों को बेचने मे मुनाफा कमाने के स्थान पर मुनाफाखोरी का रास्ता अपनाया। औद्योगिक उत्पादनों के विक्रय मूल्य उत्पादन लागत के 100 से 2000 गुना तक रख कर दुनिया की अधिकतर दौलत पर अधिकार जमाने के बारे मे सोचा। विश्व के राजनीतिक नेतृत्व ने इस कार्य मे उनका साथ दिया। जिसके कारण अधिकांश आबादी को अपनी कमाई का अधिकांश भाग उनको देना पड़ा, वह अपने कमाये धन से ही वंचित होते गये। विश्व मे सर्वकल्याणकारी अर्थव्यवस्था लागू करने के लिये इसको रोकने के लिये आवश्यक कदम उठाने होंगे।सभी के कल्याण के लिये विश्व नेतृत्व को औद्योगिक उत्पादनों का विक्रय मूल्य उत्पादन लागत पर उचित मुनाफे के आधार पर तय करने के विषय मे विचार करना चाहिये। इससे अधिकांश आबादी के पास धन की उपलब्धता बढ़ेगी और वह अपना जीवन बेहतर बनाने की स्थिति मे होंगी। 

Wednesday, 5 August 2015

उत्पादन मूल्य बताओ, अच्छे दिन आ जायेंगे

वस्तुओं की बढती कीमतें हमेशा राजनेताओं, अर्थशास्त्रियों और ग्राहकों के निशाने पर रहती हैं। कभी भी किसी ने भी इन बढती कीमतों के भंवरजाल को सुलझाने की कोशिश नहीं की।यह जिम्मेदारी उन्ही को दे दी, जिनसे ग्राहकों को बचाना था। नतीजा वही हुआ जो बिल्ली को दूध की पहरेदारी पर लगाने का होता है। यह विश्व मे होने वाला सबसे बड़ा आर्थिक भ्रष्टाचार है, जो सामान्य वर्ग से उसकी खून पसीने की कमाई छीने जा रहा है। 5 रूपये की वस्तु 50 रूपये मे बेचकर सरेआम आर्थिक भ्रष्टाचार कर उसे गरीबी, भुखमरी और लाचारी के दलदल मे धकेले जा रहा है ।


औद्योगिक क्रान्ति के उदय के साथ ही इससे सम्बन्धित तथाकथित प्रतिष्ठित वर्ग ने व्यूहरचना शुरू कर दी थी। दुनिया के कुल धन के अधिकांश भाग पर शीघ्र से शीघ्र आधिपत्य जमाने की, ताकि यह वर्ग धन बल के सहारे पूरी दुनिया को अपने अधिपत्य मे ले सके। यह तभी सम्भव था जब यह वर्ग शासकों, नेताओं और ग्राहकों को यह समझा सके कि दुनिया की तरक्की के लिये आर्थिक प्रगति आवश्यक है, आर्थिक प्रगति के लिये उद्योगीकरण तथा उद्योगीकरण के लिये उद्योजकों को अधिक से अधिक वित्तीय व अन्य सुविधायें। वैसे उनती बात पूरी तरह गलत भी नहीं थी। उसमे सच्चाई भी थी। किसी भी देश की उन्नति मे उसकी आर्थिक प्रगति का बहुत बड़ा योगदान होता है परन्तु आर्थिक प्रगति के लिये उद्योग के साथ साथ कृषि क्षेत्र का भी विकास आवश्यक है। दोनो में सन्तुलन होना चाहिये, तभी देश के विकास का लाभ बहुतांश लोगों को मिल पाता है। लेकिन यह बात उद्योजक वर्ग की हित साधना मे बाधक थी। क्योंकिब धन वितरण उद्योग के साथ कृषि क्षेत्र मे भी होता। अतः एक नवीन शब्द मंहगाई की कल्पना विकसित कर यह बात फैलाई गई कि यदि कृषि उत्पादों के दामों पर नियन्त्रण नहीं रखा गया तो देश मे मंहगाई बढ़ेगी, सामान्य वर्ग का जीवन दूभर होगा। अतः कृषि उत्पादों की कीमतों को सरकारी नियन्त्रण मे लाया गया। इस बात का विरोध न हो इसलिये इस नियन्त्रण को सरकारी संरक्षण का नाम देकर कृषि क्षेत्र/किसानों के हित से जोड़ दिया गया। कृषि मे पैदा होने वाली वस्तुयें उद्योगों मे कच्चे माल के रूप मे काम आती हैं। अतः उद्योजकों ने कारटेल बनाकर कृषि मे पैदा होने वाली वस्तुओं के दाम नहीं बढने दिये, कृषि उत्पादों को सस्ते दामों पर खरीदा, बाद मे किसानों के हितों की रक्षा के नाम पर कृषि उत्पादों के विक्रय मूल्य पर सरकारी नियन्त्रण लाद दिया गया। दूसरी तरफ औद्योगिक उत्पादनों के विक्रय मूल्य पर उद्योजकों का एकाधिकार कायम रहा, ताकि वह ग्राहकों से अधिक से अधिक धन वसूल सकें, जिसके कारण वर्तमान बाजार मे औद्योगिक उत्पादनों का विक्रय मूल्य उत्पादन मूल्य के 100 से लेकर 1000 गुना तक अधिक है तथा कृषि उत्पादों को बमुश्किल उनकी उत्पादन लागत मिल पाती है।

देश मे भी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग है। यह आयोग कृषि उत्पादों के लागत मूल्य का अध्यन कर, उनके समर्थन मूल्य या विक्रय मूल्यों की आयोग की मूल्यनीति के अनुसार प्रतिवर्ष घोषणा करता है। कृषि उत्पादों के विक्रय मूल्य इन्ही घोषित मूल्यों के आसपास रहते हैं, परन्तु औद्योगिक उत्पादनों के सम्बन्ध मे यह नीति नहीं अपनाई गई, उनके विक्रय मूल्यों का निर्धारण उद्योजकों  पर छोड़ कर उन्हे वस्तुओं पर मनमानी MRP लिखने की छूट दे दी गई। इसी छूट का फायदा उठाकर उद्योजक विज्ञापन, फैशन शो आदि विभिन्न हथकंडे अपनाकर अपने उत्पादनों के बदले ग्राहकों से कई गुना अधिक कीमत वसूल कर ग्राहकों को लूट रहे हैं।


अप्रैल 1999 तक देश मे औद्योगिक उत्पादनों के उत्पादन मूल्य का अध्यन करने के लिये ब्यूरो आफ इन्डस्ट्रियल कास्ट एण्ड प्राइसेज (BICP) था। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत द्वारा लगातार उत्पादन मूल्य घोषित करने का दबाव बनाने के कारण इसका टैरिफ कमीशन (TARIFF COMMISSION) मे विलय कर दिया गया तथा इसका कार्य टैक्स निर्धारित करने के उपयोग तक मर्यादित कर दिया गया। यह जानते समझते हुये भी कि उद्योजक ग्राहकों को बुरी तरह लूट रहे हैं, इस तरफ से आँख बन्द कर ली गई। पिछली दो लोकसभाओं मे चन्द्रपुर (महाराष्ट्र) से सांसद व वर्तमान मे रसायन व उर्वरक राज्य मन्त्री हंसराज अहीर ने उत्पादन मूल्य बताने से सम्बन्धित बिल निजी बिल के रूप मे रखा था। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की मांग है कि हंसराज अहीर जी के उस बिल को वर्तमान सरकार, सरकारी बिल के रूप मे अपनाकर आवश्यक कानून बनाये।

ग्राफ के माध्यम से विषय अधिक स्पष्ट होगा। रेखा OB मूल्य निर्देशित करती है तथा रेखा OA वर्ष। CD वस्तुओं के उत्पादन मूल्य बताने वाली रेखा है। बिन्दु वाली रेखा EF कृषि वस्तुओं के विक्रय मूल्य को निर्देशित करती है, जो कभी उत्पादन मूल्य रेखा के ऊपर तो कभी उत्पादन मूल्य रेखा के नीचे, कुल मिलाकर उत्पादन मूल्य रेखा के इर्द गिर्द ही दिखाई देती है, जिसका अर्थ है कृषि उत्पादों की कीमत बाजार मे उनकी मांग व पूर्ति के आधार पर कभी उत्पादन मूल्य से कम व कभी अधिक रहती है, परन्तु यह कीमत उत्पादन मूल्य के आस पास ही रहती है । औद्योगिक उत्पादनों के विक्रय मूल्य की रेखा GH हमेशा उत्पादन मूल्य की रेखा से बहुत ऊपर लगभग लम्बवत रहती है। इसे बाजार मे MRP का सहारा भी प्राप्त है, जिसे बाजार मे इस तरह प्रचारित कर ग्राहकों को लूटा जाता है, मानो वह सरकार द्वारा निर्धारित वैधानिक मूल्य हो।


उत्पादन मूल्य घोषित करना अच्छे दिनों की आहट है। जिसका अर्थ है औद्योगिक उत्पादनों के विक्रय मूल्य को उत्पादन मूल्य आधारित बनाना। आज ग्राहकों से MRP के नाम पर अनाप शनाप कीमतें वसूल कर उन्हे लूटा जा रहा है। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत की मांग है कि MRP को रद्द कर उसके स्थान पर उत्पादन मूल्य लिखना अनिवार्य किया जाये, ताकि औद्योगिक उत्पादनों के दाम भी कृषि उत्पादों की तरह उत्पादन मूल्य के आसपास रहें। लाभ अर्जित करना उत्पादकों का अधिकार है, परन्तु लाभ उचित होना चाहिये, न कि ग्राहकों को लूटने वाला। वर्तमान बाजार मे MRP के नाम पर जबरदस्त आर्थिक भ्रष्टाचार चल रहा है। ग्राहकों को इससे राहत मिलेगी तो उसकी क्रय शक्ति बढेगी, वह अपने परिवार के लिये अधिक वस्तुयें खरीद पाने की स्थिति मे होगा। यदि ग्राहक बचत करता है तो भी यह पैसा सरकार द्वारा खुलवाये करोड़ों बैंक खातों मे जमा होकर देश के विकास मे योगदान देगा। अतः वर्तमान सरकार को चाहिये कि उत्पादन मूल्य बतायें, अच्छे दिन लायें।