Friday, 11 November 2016

500 - 1000 के पुराने नोट बन्द, कैशलैस इकनामी की तरफ कदम

500-1000₹ के पुराने नोट बन्द होते ही, एक बात जोर शोर से प्रचारित हुई। सरकार बड़े नोटों का अर्थव्यवस्था में प्रचलन बन्द कर छोटे नोटों को ही अब रखेगी। धीरे धीरे स्पष्ट हुआ कि सरकार पुराने 500-1000₹ के नोट तो रद्द कर रही है, पर साथ में 500-2000₹ के नोट अभी तथा 1000₹ का नोट बाद में ला रही है। इसके कारण अपने रोजमर्रा के खर्चों से जूझते लोगों के बीच भ्रम फैला, जब 500-1000₹ के नोट बन्द ही नहीं हो रहे हैं, फिर यह उपक्रम क्यों ? इससे नोट बन्दी के कारण कोमा में गये विपक्षी नेताओं को आक्सीजन मिली। उन्होने लोगों के भ्रम का फायदा उठाते हुये, जनता की परेशानियों का हवाला देते हुये, जनता के कन्धे पर बन्दूक रख मोदी पर गोले दागने शुरू कर दिये। भ्रम में होने के बावजूद जनता को समझ नहीं आ रहा था, पर अहसास हो रहा था कि उसके लिये कुछ अच्छा हुआ है। नेताओं के एक स्वर में विलाप से वह समझ गया कि गहरी चोट कहां लगी है। उसने कहना शुरू कर दिया कि तकलीफ हम झेल लेंगे, कदम अच्छा है।

अर्थव्यवस्था में सिर्फ छोटे नोट रखने की बात करने वाले, पहले यह समझ लें 13,069 बिलियन रूपयों वाली अर्थव्यवस्था का आकार बहुत बड़ा है, इसमें 86% मूल्य के 500-1000₹ के नोटों का चलन इस  बात का स्पष्ट संकेत है कि बड़े नोटों के बिना यह नहीं चलने वाली। उस पर भी इसमें प्रतिवर्ष 17% के नकली नोट बढ़ते जा रहे हैं। इसमें से बैंको के पास सिर्फ 620 बिलियन रूपयों की ही मुद्रा है। बाकी बची 12449 बिलियन रूपयों की मुद्रा कुछ चलन में है, बाकी लोगों की तिजोरी, गद्दों में दबी पड़ी है। जिसे बाहर निकालने का एक ही रास्ता था, उसका अन्तिम संस्कार कर दिया जाये, जो मोदी ने कर दिया। इतनी बड़ी नकद अर्थव्यवस्था का सुचारू संचालन बड़े नोटों के बिना सम्भव ही नहीं है। इसी कारण 500, 2000 और आगे 1000₹ का नोट सरकार को लाना पड़ रहा है। अब पुराने 500-1000₹ के नोट बन्द करने से इस विशालकाय नकद अर्थव्यवस्था के आकार में बड़ी कटौती करना सरकार के लिये सम्भव होगा। क्योंकि पुराने 500-1000₹ के नोटों को बैंकों के फिल्टर से निकालने की प्रक्रिया में इन नोटों का बहुत बड़ा हिस्सा बाहर होने वाला है। राजनेताओं की चिल्ल पों का यही मुख्य कारण है। एक अनुमान के अनुसार यदि सरकार नकद मुद्रा के संचार पर सही नियन्त्रण रखने में सक्षम रहती है तो देश की 13069 बिलियन रूपयों की नकद अर्थव्यवस्था, 9-10 हजार बिलियन रूपयों तक सिकुड़ सकती है। यदि देश में 500-1000 रुपये के नोटों के प्रचलन को समाप्त करना है तो इस नकद  के आकार को 4-5 हजार बिलियन रूपयों तक सीमित करना पड़ेगा। जिन देशों में 100-50 के नोट ही सबसे बड़े नोट के रूप में प्रचलित हैं। वहां की स्थितियां इसी प्रकार की हैं। इंग्लैण्ड की नकद अर्थव्यवस्था 60 बिलियन पौण्ड की है, जबकि अमेरिका की मात्र 1200 बिलियन डालर की ।

भारत में नकद नोटों के प्रचलन में कटौती करने का एक ही रास्ता है। कैश लैस इकनामी की तरफ बढ़ना, जिससे इतनी बड़ी नकद मुद्रा के रख रखाव खर्च में बड़ी कटौती के साथ ही भ्रष्टाचार और काले धन पर लगाम कसने में भी बहुत बड़ी मदद मिलेगी। इसी कैश लैस इकनामी का जिक्र मोदी दो माह पूर्व अपनी "मन की बात" में कर रहे थे, जिसमें आर्थिक लेन देन के व्यवहार में नकद मुद्रा की आवश्यकता ही न पड़े। यह काम क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चेक, ई ट्रान्सफर आदि विभिन्न तकनीकों द्वारा सम्भव है, उसे अपनाने की आवश्यकता है। हम अभी इससे बहुत दूर हैं, हमारा 90% लेन देन नकद मुद्रा से ही होता है। यही मुख्य वजह है कि सिर्फ 2 नोट वह भी 500-1000₹ के बन्द करने पर दो दिन में ही बड़ी संख्या में लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिये जूझते दिखाई पड़ने लगे । वरना हफ्ते दस दिनों तक इसका प्रभाव पता ही नहीं चलता।

पूरी दुनिया कैशलैस अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रही है। कुछ बहुत आगे निकल चुके हैं तो कुछ बहुत पीछे हैं, पर सभी प्रयास कर रहे हैं कि कैशलैस अर्थव्यवस्था को अधिकतम स्तर तक अपनाया जा सके।वर्तमान में विश्व के पांच देशों की अर्थव्यवस्था को कैशलैस अर्थव्यवस्था कहा जा सकता है। स्वीडन जहां नकद लेन देन का चलन मात्र 2%है, कनाडा जहां यह 10% तथा दक्षिण कोरिया में 20% है। अफ्रीका के सोमालीलैन्ड व केन्या की गिनती भी विश्व के कैशलैस अर्थव्यवस्था वाले देशों में है। आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, हांगकांग, इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा नाइजीरिया भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं।

500-1000₹ के पुराने नोट बन्द किये जाने के बाद हम भी इस दिशा में तेजी से बढ़ सकते हैं। परन्तु इसके लिये सरकार के उचित नियन्त्रण व प्रयास की जरूरत है। देश में कोई नई तकनीक आई नहीं कि व्यवसायिक संस्थान ग्राहकों को लूटना शुरू कर देते हैं। ग्राहकों को लूटने की दौड़ में सहकारी और सरकारी संस्थान भी बराबर के सहभागी रहते हैं। सभी जानते हैं कैशलैस अर्थव्यवहारों में व्यवसायिक संस्थानों के कैश के रख रखाव खर्च में बड़ी कमी आती है। अत: कैशलैस व्यवहार के माध्यमों का उपयोग करने वाले ग्राहकों को अतिरिक्त लाभ देकर प्रोत्साहित करना चाहिये, न कि रेल, पैट्रोल पम्प, ज्वैलरों व अन्य व्यवसायियों की तरह अतिरिक्त पैसा वसूल कर उसे हतोत्साहित करे।

Wednesday, 9 November 2016

500 व 1000₹ के नोट बन्द, काले धन व आतंकवाद पर जबरदस्त प्रहार

2 माह पूर्व जब प्रधानमन्त्री मोदी "मन की बात" में कैश लैस इकनामी का जिक्र कर रहे थे, डेबिट/क्रेडिट कार्ड प्रयोग को बढ़ावा देने के लिये, उन्हे कुछ छूट देने के विचार की बात कर रहे थे। दूर दूर तक भी कोई यह नहीं सोच रहा था कि मोदी मन ही मन में देश में काले धन की उत्पत्ति के श्रोत प्रचलित नकद मुद्रा के विशालकाय कोष को फिल्टर करने की ठान चुके हैं, योजना बना चुके हैं। वैसे भी पिछले 60 वर्षों में हम सरकारी योजनाओं को शोर मचाने वाले भोंपू मान, उन पर ध्यान न देने के अभ्यस्त हो चुके हैं। इसीलिये हम किसी भी सरकारी योजना की घोषणा को गम्भीरता से नहीं लेते और यदि हम कुछ गम्भीरता दिखाना भी चाहें, देश के विपक्षी दल उन योजनाओं की इतनी चीरफाड़ कर डालते हैं कि मामले टांय टांय फिस्स् वाले ही नजर आते हैं। देश के विपक्षी अब भी चेत जायें, कुछ रचनात्मक सोचना शुरू करें। वरना उनके कालबाह्य होने में अधिक समय नहीं है।

8 तारीख को शाम 8 बजे राष्ट्र के नाम सन्देश द्वारा मध्य रात्रि से 500 व 1000₹ के नोट रद्द करने का निर्णय प्रधानमन्त्री ने यक ब यक नहीं लिया। इससे पीछे विभिन्न योजनाओं की पूरी श्रंखला है, तैयारी है, जिसे देश की विपक्षी राजनीति ने कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया। इस विषय में मोदी सरकार गम्भीर है, सावधानी व दृढ़ निश्चय के साथ एक एक कदम लक्ष्य की तरफ बढ़ाती जा रही है। याद कीजिये 2015 में जब "जनधन योजना" में शून्य बैलेन्स से बैंकों में बचत खाते खुलवाये जा रहे थे। 10 करोड़ लोगों को बैंक से जोड़ने के इतने बड़े काम को अनदेखा कर दिया। आज कोई यह नहीं कह सकता कि उसका बैंक में खाता नहीं है, जिसमें वह अपने 500-1000 के पुराने नोट कोे बदलने के लिये. जमा करे। 1₹ प्रतिमाह अपने बैंक खाते से कटा कर, 12₹ प्रतिवर्ष दे 2 लाख के प्रधानमन्त्री सुरक्षा बीमा को भी हम भूल चुके हैं, यहां तक कि 291₹ प्रतिमाह उसी बैंक खा में कटवा कर 1000 व 5000₹ प्रतिमाह की अटल पेन्सन योजना भी हमें याद नहीं। विपक्षियों ने इन सभी कल्याणकारी योजनाओं को प्रयत्न कर कर भुलवाया, जबकि यह सभी योजनायें कालाधन व भ्रष्टाचार मुक्त अर्थव्यवस्था की स्थापना की प्रारम्भिक तैयारियां थी।

मोदी सरकार का सुधार कार्यक्रम यहीं नहीं रूका, विदेशी बैंकों में कालाधन जमा कराने वालों के लिये. सख्त नियम, अघोषित आय की घोषणा करने वाली योजना, बेनामी सम्पत्ति सम्बन्धित कानून और अब  500 व 1000₹ के नोट रद्द, सभी कुछ सुव्यवस्थित क्रमबद्ध तरीके से चल रहा है। यह निर्णय सतही तौर पर नहीं लिये जा रहे हैं। मोदी सरकार की देश में मुद्रा के चलन पर पैनी नजर है, नकद राशि का यह चलन ही भ्रष्टाचार और काले धन का जनक है। मोदी सरकार अब तक इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों की अनेको समितियां बना चुका है। उनके द्वारा दी गई रिपोर्टों का गम्भीर अध्ययन कर चुका है। अभी पिछले सप्ताह ही अवकाश प्राप्त न्यायधीशों की एक समिति की रिपोर्ट आई है। जिसमें नकद खरीद की अधिकतम सीमा 3 लाख रुपये करने तथा नकद राशि रखने की अधिकतम सीमा 15 लाख ₹ निर्धारित करने की संतुस्ति है। अतः 500 व 1000₹ के नोट बन्द होने के बाद मोदी सरकार कुछ और निर्णय भी ले तो आश्चर्य नहीं, तय है भ्रष्टाचार व कालेधन मुक्त अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ते जाना। 

देश में प्रचलित कुल मुद्रा का 86% 500 व 1000₹ के नोटों की शक्ल में है। कुल प्रचलित मुद्रा के 86% भाग को फिल्टर करना बहुत बड़ा काम है, जो सरकार की बड़ी पूर्व तैयारी के बिना सम्भव न हो पाता। विचार करें पुराने नोटों के बदले नये नोट बैंक से ही मिलेंगे अर्थात देश में प्रचलित सभी नोट मुद्रा का 86% बैंक में जमा होंगे, आप पुराने नोट बैंक में तय समय सीमा में जमा कराइये, वहां से नये नोट प्राप्त करिये। 2016 मार्च तक यह स्पष्ट हो जायेगा कि देश में प्रभावी मुद्रा कितनी है। कई लोग इस बात को लेकर भ्रमित हैं कि जब 500व 1000₹ के नोट रद्द ही करने थे, तो दोबारा 500 व 2000₹ के नये नोट जारी करने की क्या आवश्यकता थी। सीधी सी बात है, देश में सभी नोटों व सिक्कों को मिलाकर कुल 13069₹. की मुद्रा प्रचलन में है, जिसमें से 620 बिलियन मात्र ही बैंकों के पास है। मुद्रा के इतने बड़े बोझ को छोटे नोट नहीं उठा सकते, विशेषकर तब तक जब तक कि अधिकतर लेन देन कैश लैस न हों (क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चेक, ई ट्रान्सफर आदि) सरकार इसी तैयारी में है। सरकार का यह कदम बहुत बड़ा व निर्णायक है, आलोचक यह तैयारी भी रखें कि सरकार अन्य कदम भी उठा सकती है।

कैशलैस अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ते इस कदम का देश पर पड़ने वाला प्रभाव अभी देखना है। वैसे वर्तमान में विश्व की अनेको सरकारें विभिन्न कारणों से इस दिशा में बढ़ रही हैं। यहां तक कि छोटे छोटे देश जैस़े सोमालीलैन्ड, केन्या, दक्षिणी कोरिया, नाइजीरिया आदि भी इसमें अत्यधिक रूचि ले रहे हैं, स्वीडन, आस्ट्रेलिया व इंग्लैण्ड आदि भी प्रयास में हैं, Cashless Economy पर हम अगले. Blog में विस्तार से चर्चा करेंगे।

Monday, 24 October 2016

GST पर चर्चा में वही नदारद जिसे टैक्स देना है


देश में वस्तु एवं सेवा कर ( GST ) पर जबरदस्त चर्चा छिड़ी हुई है। कहा जा रहा है कि सभी प्रभावित पक्ष इस गहन मन्थन में लगे हुये हैं, सिर्फ उसको छोड़कर जिसे अपनी जेब से इस कर को चुकाना है। वह पक्ष जिससे यह टैक्स वसूला जायेगा। उसे चर्चा में सम्मिलित करना कोई महत्वपूर्ण भी नहीं समझता, यह भी जरूरत नहीं समझी जाती कि उससे पूछ तो लिया जाये कि भाई तुम कितना भार वहन कर पाने में सक्षम हो। जो भी पक्ष इ्स चर्चा में सम्मिलित हैं या इसे अन्तिम रूप देने की कोशिश कर रहे है परजीवी (Parasites) हैं। उनमे से कोई भी 1 नये पैसे के बराबर भी कर का भार वहन करने वाला नहीं है, न सरकारें, न उद्योगपति और न ही व्यापारी। हमारी सरकारों के न जाने कब अक्ल आयेगी या वह कब समझेंगे कि जिनके सहारे उनकी वित्तीय व्यवस्थायें चल रही हैं, जो इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं। उनकी भी राय ले ली जाये, उनसे भी पूछ लिया जाये। हम यहां ग्राहकों के प्रतिनिधि बनने की दुकान चला रहे, उन इक्के दुक्के स्वनामधन्य लोगों की बात नहीं कर रहे, जन संगठनों की बात कर रहे हैं। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत सरकार के इस रूख की घोर निन्दा करती है।

विद्वानों द्वारा कर निर्धारण करने की नीतियों से सम्बन्धित विचार आज ठीक उसी तरह अर्थशास्त्र की पुस्तकों मे दफन हो चुके हैं, जिस प्रकार अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को पढ़ाये जाने वाले, वस्तु का विक्रय मूल्य निर्धारित करने में उसके उत्पादन मूूल्य की भूमिका से सम्बन्धित विचार। समाज की आर्थिक विषमता दूर या कम करने की भूमिका से अब कर निर्धारणकर्ता बहुत दूर जा चुके हैं। कर सरलीकरण या कर सुधार के नाम पर आसान तरीकों से अधिक से अधिक धन उगाही ही उनका एकमेव उद्देश्य बन चुकी है। इस सम्बन्ध में विभिन्न स्तरों पर किये जाने वाले दुष्प्रचार का आलम यह है कि जो व्यक्ति सरकार को एक पैसा टैक्स नहीं देता, उसे कर द्वारा पैसा देकर सरकार चलाने वाला माना जा रहा है। जिसके पैसे से सरकार चल रही है, उसे अधिक निचोड़ा जा रहा है। मजे की बात यह कि अपने पैसे से सरकार चलाने वाले भी नहीं जानते कि सरकार उनके पैसे से चल रही हैं, वह भी यही समझते हैं कि सरकार उनके नहीं किसी दूसरे (धनाड्यों) के पैसे से चल रही है। यह हकीकत है कि सरकार देश की 85% गरीबी रेखा के नीचे, ऊपर रहने वालों, निम्न मध्यम वर्ग तथा मध्यम वर्गीय लोगों के पैसे से चल रही है। यह मै नहीं कह रहा आंकडे कह रहे हैं। आप किसी भी वर्ष के कर एकत्र करने से सम्बन्धित आंकडे देख लीजिये। स्मरण रहे कि व्यक्तिगत आय कर के अतिरिक्त वसूल किये जाने वाले सभी कर अन्तत: ग्राहक को ही अपनी जेब से चुकाने पड़ते हैं।

सरकारों का प्रयास हमेशा कर की आय बढ़ाने का रहता है। कभी किसी तो कभी किसी बहाने से, परन्तु चिन्ता की बात यह है कि कर का सबसे अधिक बोझ ग्राहकों के उसी वर्ग पर डाला जाता है, जिसे इस बोझ से सबसे अधिक संरक्षण देने की जरूरत होती है। ग्राहक, कर के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात जान लें कि जिन वस्तुओं का ऊला ढाल अधिक होता है। उन पर लगने वाले कम कर के कम प्रतिशत से भी राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा आता हैं। परन्तु यह गरीब वर्ग पर ही सर्वाधिक बोझ डालता है। सरकार कर ढ़ांचे में जब भी कोई बदलाव लाती है, उसका मूल लक्ष्य कर से आने वाले राजस्व को बढ़ाना होता है। यद्यपि यह बदलाव गरीब ग्राहकों को राहत देने के नाम पर लाये जाते हैं, परन्तु हर बार उन पर ही अतिरिक्त बोझ लाद दिया जाता है। इसी अनुभव के कारण जब पूरा देश GST पर कशीदे पढ़ने में व्यस्त था। ग्राहक पंचायत स्थिति का अवलोकन कर रही थी, उसे मालूम था जो कुछ भी कहा जा रहा है, वास्तविक स्थिति उससे बहुत अधिक भिन्न होगी। अब इसी बात को ले लीजिये, समान 18% कर की बात चल रही थी, पहली बैठक जो पूरी सफल भीा नहीं रही, उसमे कर के चार स्तरों 6%, 12%, 18% तथा 26% की बात की जाने लगी। सरकार के मुख्य दावे कि पूरे देश में किसी भी वस्तु के कर की एक दर होने के कारण, एक जैसी कीमत होगी, भी खटाई मे जाती नजर आ रही है। क्योंकि GST लागू होने पर बाकी सभी कर समाप्त  करने की बात कहने वालों के सुर अभी से बदलने लगे हैं। अभी भी सही वक्त नहीं आया है GST पर टिप्पणी करने का, स्थिति थोड़ी स्पष्ट होने दीजिये। फिर भी हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि GST लागू होने पर उसके वह प्रभाव आपको दूर दूर तक ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे, जिनके ढोल इसे प्रचारित करने के लिये पीटे गये जैसे GST लागू होने पर ग्राहकों को वस्तुयें सस्ती मिलने लगेंगी। समर्थन लेने के लिये जिन्हे लालच दिया गया, उन्हे तो चर्चा में दूर दूर तक भी जगह नहीं दी जा रही है। सरकार बिना विलम्ब ग्राहक क्षेत्र में कार्य करने वाले जन संगठनों को भी चर्चा के लिये आमन्त्रित करे।

वर्तमान सरकार दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों को लेकर चल रही है। दीनदयाल जी का यह शताब्दी वर्ष चल रहा है। अत: सरकार को पंक्ति के अन्तिम सिरे पर बैठे व्यक्ति का विचार करना चाहिये। यह विचार अनुदान के माध्यम से करना बेमानी है। यह सही स्वरूप में कर सुधार के माध्यम से ही लागू हो सकता है। अत: सरकारों को टैक्स सुधार के उन अध्यायों को फिर से खोलने की आवश्यकता है। जिनमें अमीरों पर अधिक कर तथा गरीबों पर कम कर लगाने की बात कही गई है। आज विश्व के अनेको अर्थशशास्त्री इस बात पर पुनः जोर देने लगे हैं। विश्व की बढ़ती आर्थिक असमानता की स्थिति. में सरकारों द्वारा यह मार्ग अपनाने की आवश्यकता है। यह मार्ग अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) की गली से होकर निश्चित रूप से नहीं गुजरता।

Thursday, 15 September 2016

कब तक दाना मांझी बहरीन के शाह या कैमरे के लैन्सों की बाट जोहेंगे

सामाजिकता कितनी उथली होती जा रही है। हमारा सामाजिक सरोकार कितना सीमित होता जा रहा है। यह असंवेदनशीलता की पराकाष्ठ नहीं तो क्या है। आज भी देश में कितने दाना मांझी व्यवस्था, गरीबी, तिरस्कार तथा असंवेदनशीलता की लाश अपने कन्धों पर उठाये घूम रहे होंगे, इस इन्तजार में कि कोई कैमरा उनके जीवन के इन मर्मस्पर्शी क्षणों को पकड़े और एक रोमांचक कहानी के रूप मे देश के सामने ले आये। बाजारवाद ने हमारे रहन सहन के साथ साथ हमारा नजरिया भी बदल दिया है। जीवन की संवेदनाओं, मार्मिकताओं, आर्थिक विषमताओं से भरी समसयाओं का निदान हमनें चयनित स्वरूप में कुछ रूपये फेंकने मे तलाश लिया है। किसी भी कोण द्रष्टिकोण से देखें, क्या यह इस समस्या का अंशमात्र भी निदान है।

Oxfem का सर्वेक्षण कहता है, दुनिया के आधे लोगों के बराबर सम्पत्ति विश्व के मात्र 66 लोगों के पास है। देश के 10% सबसे धनी लोग देश की 74% सम्पत्ति पर कब्जा जमाये बैठे हैं। सरकारें कभी यह टैक्स तो कभी वह टैक्स का खेल खेल कर, ग्राहकों के बहुमत को उम्मीदों का झुनझुना थमा रही हैं। बेचारा ग्राहक न्यूनतम जीवनावश्यक वस्तुओं तक अपने हाथों की पँहुच बनाने के लिये, अपने इतने से स्वप्न के साकार होने की उम्मीद मे, अन्तहीन प्रतीक्षा मे अटका हुआ है। विश्व मे समाज के बीच आर्थिक अन्तर की खाई, निरन्तर अपनी गहराई बढाने मे द्रुतगति से व्यस्त है। सन्तोष हो सकता था, यदि ग्राहकों के बहुमत की जद मे न्यूनतम जीवनावश्यक आवश्यकताओं की आपूर्ति होती, परन्तु वह तो कल भी उनकी पंहुच से बहुत दूर थी और आज भी उनके लिये मृग मारीचिका ही है।

हमारे पुरखे आर्थिक विषमता के इस विष से तबाह हो चुके हैं। हमारी स्थिति तो उनसे कहीं बदतर है और हमारी आने वाली नस्लें अपने माथे पर कुछ इसी तरह की इबारत लिखवाकर ही पैदा हो रही हैं। क्या हमारी पीढ़ियां यह आर्थिक अभावों से लबरेज जीवन जीने के लिये अभिशप्त हैं या फिर स्थितियों मे बदलाव सम्भव है। यह बदलाव क्या गाहे बगाहे दोचार प्रचारित लोगों को चन्द सिक्के फेंक कर प्राप्त करना संभव है। दाना मांझी की वास्तविक जख्म "आज मेरे पास पैसा आ रहा है, कल इसके अभाव में मेरी पत्नी मरते समय अपनी तीन बेटियों में से सिर्फ दो को ही देख पाई, क्योंकि मै उन्हे घर पर छोड़ बड़ी बेटी के साथ पत्नी का इलाज कराने शहर आया था, तेरह किलोमीटर तक उसके शव को उठाकर पैदल चला" पैसों की यह चादर ढ़क पायेगी।

क्या देश मे अब कोई दाना मांझी नहीं होगा या यह सब कुछ समय का मात्र भावनात्मक खेल है। इससे नहीं चलने वाला है। गरीब, इन्सान और लुप्त होती मानवता के लिये हमें इस जैसी समस्याओं की बुनियाद को टटोलना होगा, उसे बदलना होगा।

वह कौन सी व्यवस्थायें हैं, जिन्होने इस क्रम को इतना मंहगा बना दिया कि दाना मांझी अपनी पत्नी को ईलाज के लिये शहर के सरकारी अस्पताल अपनी तीनो बेटियों के साथ ले जा सके। उसकी मृत्यु होने पर उसका शव अपने गांव घर लाकर उसका संस्कार कर सके। यह सब दिनचर्यायें इतनी मंहगी बनाकर इन्हे दाना मांझियों की पंहुच से दूर करने का जिम्मेदार कौन है, यह समाज, सरकार या अर्थव्यवस्था। आखिरकार यह विलासिता की क्रियायें तो नहीं, जीवन की अनिवार्य क्रियायें हैं, जिन तक दाना मांझियों की पंहुच बननी चाहिये।

किसी की भी सहज प्रतिक्रिया होगी। दाना मांझियों को इन क्रियाओं को सहज रूप से पूरा करने के लिये, अपेक्षित धन कमाना चाहिये, कौन उसको यह धन कमाने के अवसर देगा और यदि उसे धन कमाने के अवसर न दिये गये तो फिर उसकी व्यवस्था क्या होगी, वर्तमान जैसी ? या वह और उसके जैसे लोग जीना ही छोड़ दें। असंख्य प्रश्न हैं जिनके उत्तर समाज, सरकार तथा अर्थव्यवस्था को देने हैं। पं दीनदयाल उपाध्याय भी इन्ही प्रश्नों के उत्तर ढूंढने की बात अपने एकात्म अर्थचिन्तन मे किया करते थे।

सामाजिक संवेदना आज कितनी भी क्षीण हो चुकी हो, पर मरी नहीं है। यह चेतना पूरे विश्व में कभी न कभी किसी न किसी रूप में प्रस्फुटित होती रही है, होती रहेगी। नहीं तो कई हजार मील दूर बैठे बहरीन के शाह को यह न करना पड़ता। परन्तु आज आवश्यकता इन आर्थिक प्रश्नों के स्थायी हल प्राप्त करने की है। कब तक दाना मांझी बहरीन के शाह या कैमरे के लैन्सों की बाट जोहेंगे, वह भी सब कुछ लुटने के बाद।

Friday, 9 September 2016

रेल किराये में दाम बढ़ाने वाली नीति का क्या औचित्य

शुक्रवार का दिन देश में फिल्म उद्योग के नाम है। लगभग सभी नई फिल्में इसी दिन सिनेमाघरों में दर्शकों के लिये लगाई जाती हैं। आप इतिहास जांच लीजिये, यह दिन इसी काम के नाम है। हमारे कर्मठ रेल मन्त्री सुरेश प्रभु जी शुक्रवार के दिन पर इस एकाधिकार से खुश नहीं हैं। अतः उन्होने 9 सितम्बर शुक्रवार को रेल किराये में एक नई तेजी से किराया बढ़ने वाली नीति का आगाज किया है। अब रेल यात्री भी शेयर बाजार में लगे सटोरियों की तरह पल क्षण किराये की तख्ती निहारता, यह चढ़ा - वह बढ़ा चिल्लाया करेगा। दोनों ही भाग्यवादी होंगे, परन्तु रेल यात्री और सटोरिये के भाग्य में इतना अन्तर अवश्य होगा कि सटोरिये को कभी कभी दाम लुढ़कने की उम्मीद तो रहेगी और दाम लुढ़केंगे भी, पर रेल यात्री बुखार नापने वाले थर्मामीटर की तरह सिर्फ पारे को चढ़ते हुये ही देखेगा। तापमान कितना भी कम हो जाये उसका उससे कोई सरोकार नहीं रहेगा। रेल मन्त्रालय द्वारा फिलहाल तीन ट्रेनों राजधानी, दूरन्तो व शताब्दी के यात्री किरायों को तय करने के लिये कुछ इसी तरह की दाम तेजी से बढ़ने वाली (Surge Pricing Policy) अपनाई जा रही है।

दाम तेजी से बढ़ने वाली इस Surge Pricing को Dynamic Pricing सक्रिय मूल्यनीति भी कहा जाता है। इसमें वस्तु की मांग बढ़ने के साथ उसके दाम भी बढ़ते जाते हैं। सरल उदाहरण से इस बात को समझते हैं। श्रीनगर में कर्फ्यू लगा है, इन स्थितियों में दूध की मांग तो है, परन्तु आपूर्ति नहीं है। अतः 40 रूपये लीटर बिकने वाला दूध, दूधवाला पहले 60 फिर 80 उसके बाद 100 और फिर अधिक और अधिक दामों पर बेच रहा है, जैसे जैसे कर्फ्यू की मियाद बढ़ती जायेगी, दूध के दाम भी बढ़ते जायेंगे। मै यह उदाहरण देना नहीं चाहता था, परन्तु ग्राहकों को समझाने के लिये इससे सरल कोई दूसरा उदाहरण मेरे पास नहीं था। रेल सरकार ने टिकट के दामों के बढ़ने के मामलेे में उच्चतम सीमा निर्धारित कर, मिर्च का धुआं उड़ाकर, आंसू पोछने के लिये रूमाल जरूर थमाया है कि किराया अधिकतम डेढ़ गुना ही होगा।


साधारणतया इस प्रकार की मूल्य नीति उपभोग को हतोत्साहित करने के लिये की जाती है। लन्दन शहर में सड़कों पर  बहुत अधिक यातायात की समस्या थी। जिसके कारण वहां के जनजीवन की गुणवत्ता प्रभावित हो रही थी। अतः लन्दन की सड़कों पर यातायात को हतोत्साहित करने के लिये London Congestion charges नाम का शुल्क वर्ष 2003 से लगाया जाने लगा। अब जो भी लन्दन में अपना वाहन लेकर जायेगा, उसे निर्धारित शुल्क देना पड़ेगा। इस कदम से लन्दन की सड़कों पर यातायात 10% कम हो गया। परन्तु वहां भी इस बात का ध्यान रखा गया कि साधारण लोग इस शुल्क से प्रभावित न हों, अतः शनिवार, रविवार तथा त्योहारों को इस शुल्क से मुक्त रखा गया। हम नहीं जानते रेल मन्त्री के मन में भी यदि इसी तरह का कोई विचार हो।

इस मूल्य पद्धति का व्यवसायिक स्वरूप में कोई विशेष लाभ नहीं होता, सिवाय इस बात के कि इसमें व्यर्थ जाने वाली क्षमता का भी उपयोग हो जाता है या व्यक्ति विशेष को कुछ अतिरिक्त इनसेन्टिव मिल जाती है। अब रेल मन्त्री को इन ट्रेनों का उपयोग करने से लोगों को हतोत्साहित करना है या किसी को इन्सेन्टिव देना है यह तो वह जानें। अपने देश में यह मूल्य प्रणाली कुछ एअर लाईनों तथा रेडिओ टैक्सी सेवा में लागू है, लेकिन ओपन एन्डेड है, जिसका अर्थ है कि ग्राहक को सामान्य किराये से कम पर भी यात्रा करने का अवसर उपलब्ध हो जाता है। आप सुनते होंगे कि किसी को हवाई यात्रा का टिकट 1.5 या 2 हजार में ही मिल गया। टैक्सी सेवा में भी व्यस्त समय में सर्ज प्राइसिंग के कारण मांग अधिक होने के कारण किराया बढ़ता है, परन्तु जैसे जैसे दूसरे ड्राइवर भी आन लाईन होते जाते हैं, किराये में कमी आने लगती है। यानी किराया अधिक होने पर यदि ग्राहक ने थोड़ी देर इन्तजार कर लिया तो किराया कम होने की पूरी सम्भावना रहती है। मतलब यह कि गाड़ी दोनो दिशाओं में दौड़ती है। पर हमारे रेलमन्त्री तो गाड़ी एक ही दिशा में दौड़ा रहे हैं।

रेल विभाग के कार्यकलाप सेवाक्षेत्र के अन्तर्गत आते हैं। सेवा उद्योग की मूल भावना ही इसके विपरीत है। पैसे वालों को मदद करना, उस गरीब व्यक्ति को इससे वंचित करना, जिसे इसकी जरूरत है। विशेष रूप से तब जब उसे चलाने वाली संस्था सरकारी हो, सरकार व्यक्ति विशेष या समूह विशेष में अन्तर नहीं कर सकती। आर्थिक आधार पर तो बिल्कुल नहीं। सभी नागरिकों को समान स्वरूप की सेवायें उपलब्ध करवाना उसका कर्तव्य है। उसके लिये आदर्श स्थित पहले आओ, पहले पाओ वाली ही है। हम मोदी सरकार से आदर्श स्थिति की अवहेलना की अपेक्षा नहीं कर सकते। अतएव तीन ट्रेनों में ही सही वर्तमान रेल यात्री किराया बढ़ने वाली प्रणाली को रद्द कर पूर्ववत व्यवस्था ही लागू की जाये।

Thursday, 8 September 2016

उत्पादन और खपत से परे भी बहुत कुछ है अर्थव्यवस्था में

प्रधानमंत्री मोदी का आई बी एन पत्रकार राहुल जोशी द्वारा देश की अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में साक्षात्कार तथा समाचार चैनलों पर जानकारों द्वारा उसकी चीरफाड़ मुख्य रूप से जो विषय खड़े करती है। उनमें देश की वर्तमान स्थिति पर विवाद हो सकता है, परन्तु अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पहले की तुलना में यह पटरी पर आ रही है। सरकार समर्थक उदाहरण के लिये 7% जीडीपी का सहारा लेते हैं तो आलोचक 2014 आधार वर्ष किये जाने की बात कर, पुराने आधार पर इसे 5% के आसपास ही बताते हैं। देश में औद्योगिक उत्पादन के आँकड़े भी विशेष उत्साहवर्धक नहीं हैं। औद्योगिक उत्पादन की 70% क्षमता का ही उपयोग हो रहा है। महँगाई के अतिरिक्त देश की दूसरी बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। जिसकी दर पिछले वर्ष 9 की तुलना में 10 पार कर गई है। यह स्थिति चिन्ताजनक है। यद्यपि चर्चा में मोदी सरकार द्वारा मुद्रा बैंक, स्किल इंडिया तथा स्टार्टअप योजनायें भी चर्चा में हैं, जिनके परिणाम अभी सामने आने हैं।


अर्थशशास्त्री जो अर्थव्यवस्था के विकास के लिये हर मर्ज की दवा जीडीपी मानते थे। अब कम से कम कहने लगे हैं कि जीडीपी बढ़ने से रोजगार नहीं बढ़ता, रोजगार में वृद्धि चाहिये तो खपत को बढ़ाना पड़ेगा, तभी औद्योगिक उत्पादन शतप्रतिशत होगा, एफडीआई निवेश के अवसर पैदा होंगे, नये उद्योग लगेंगे, जिससे रोजगार बढेगा। परन्तु यह सत्य. नहीं, यथार्थ से परे है। एड्म के अधिक से अधिक उत्पादन के सिद्धान्त को आर्थिक सम्पन्नता का आधार मानने वाले, अक्सर यह बात भूल जाते हैं कि इस सिद्धान्त में अन्य बहुत से अवयव तथा उनकी निर्धारित भूमिका अनिवार्य है, जिसके बिना यह समीकरण सही उत्तर खोजने में नाकाम ही सिद्ध होगी। लगभग पूरे विश्व में यही चल रहा है। अर्थशशास्त्री दबावों के चलते या फिर विशिष्ट प्रयोजन से पूरी बात नहीं बोलते, सही बात नहीं बोलते। अतएव विश्व में आर्थिक समीकरणें तो बहुत स्थापित की जाती हैं, परन्तु वह स्थितियों को सन्तुलित करने में नाकाम रहती है।

रोजगार वृद्धि के लिये अर्थशास्त्रियों के खपत बढ़ाने वाले सुझाव को ही ले लीजिये। खपत बढ़ने का सीधा सम्बन्ध ग्राहक की क्रय क्षमता पर निर्भर है। अतः पहले बात ग्राहक की क्रय क्षमता बढ़ाने की  जानी चाहिये, जिसके सम्बन्ध में कोई अर्थशशास्त्री बात नहीं करना चाहता। विश्व के अर्थशास्त्रियों में कभी ग्राहकों की स्थाई स्वरूप की क्रय क्षमता बढ़ाने के तरीकों पर विचार करते सुना है। जबकि अर्थव्यवस्था के स्वस्थ, विकसित होने का मजबूत, स्थाई आधार ही यह है। अस्थाई आधारों के बारे में जरूर सुना होगा, कि वस्तुयें किश्तों में उपलब्ध करा दो, बैंक से आसान शर्तों पर कर्ज दिलवा दो या फिर सातवां वेतन आयोग लागू कर कुछ लोगों के हाथों तक अतिरिक्त पैसा पंहुचा दो, ताकि यह अतिरिक्त पैसा बाजार में उत्पादनों की खपत बढ़ा सके, इस मांग के सहारे नये उद्योग लगा कर रोजगार पैदा किये जा सकें। सब तरफ इन्ही अस्थाई सममाधानों के सहारे गाड़ी खींचने का प्रयास हो रहा है, नतीजतन परिणाम वही ढाक के तीन पात? कल भी यही समस्या थी, आज भी है और कल भी रहने वाली है। यहां अधिक लिख पाना सम्भव नहीं, विषय पर विस्तारित चर्चा मैने अपनी पुस्तक "अर्थव्यवस्थाओं से बोझिल ग्राहक, ग्राहक अर्थनीति" नाम की अपनी पुस्तक में की है, जो प्रकाशन में है।

ग्राहक की क्रय क्षमता मुख्यरूप से तीन बातों से सर्वाधिक प्रभावित होती है -
1. रोजगार के सीमित व कम अवसर -
पहला व महत्वपूर्ण प्रश्न है, ग्राहक की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, उसकी जेब में पैसा कहां से आयेगा। 
अ. उत्पादन कर उसकी बिक्री से
ब. धन, सम्पत्ति से प्राप्त किराये से
स. श्रम को बेचने से
यदि सरकारें इन तीनों व्यवस्थाओं से ग्राहक की जेब में उसकी आवश्यकतायें पूरी करने के लिये. जरूरी धन की व्यवस्था कर सकती हैं, तो ठीक अन्यथा किसी पर्यायी व्यवस्था का विचार करना होगा।

2. मुद्रास्फीति
सरल शब्दों में मुद्रास्फीति मंहगाई है। आप को आज कोई वस्तु जिन दामों मे बाजार में मिल रही है, कल उसके दाम बढ़ जाते हैं। रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा प्रत्येक तिमाही कर इसे नियन्त्रित करने का प्रयास करता है। अनुभव यह आया है कि रिजर्व बैंक जो भी सहूलियतें देता है, उसे बैंक तथा उद्योगपति हजम कर जाते हैं। ग्राहक को मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। रिजर्व बैंक के नये गवर्नर उर्जित पटेल यह सुनिश्चित करें कि लाभ नीचे ग्राहक तक पंहुचे।

3. अवास्तविक मूल्य (Unrealistic Pricing)
यहां बहुत बड़ा गोलमाल है। इस पर ध्यान दिये बिना सर्वकल्याणकारी अर्थव्यवस्था की कल्पना ही बेमानी है।

इन तीनों ही क्षेत्रों में समुचित अवसर तलाश करने, उन्हें विकसित करने तथा गम्भीरता से लागू करने की आवश्यकता है। न तो यह आसान है, न ही दो चार वर्षों के अन्तराल मे पूरा होने वाला, परन्तु इस मार्ग का पर्याय नहीं।


उत्पादन और खपत से परे भी बहुत कुछ है अर्थव्यवस्था में

प्रधानमंत्री मोदी का आई बी एन पत्रकार राहुल जोशी द्वारा देश की अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध में साक्षात्कार तथा समाचार चैनलों पर जानकारों द्वारा उसकी चीरफाड़ मुख्य रूप से जो विषय खड़े करती है। उनमें देश की वर्तमान स्थिति पर विवाद हो सकता है, परन्तु अर्थशास्त्रियों का मानना है कि पहले की तुलना में यह पटरी पर आ रही है। सरकार समर्थक उदाहरण के लिये 7% जीडीपी का सहारा लेते हैं तो आलोचक 2014 आधार वर्ष किये जाने की बात कर, पुराने आधार पर इसे 5% के आसपास ही बताते हैं। देश में औद्योगिक उत्पादन के आँकड़े भी विशेष उत्साहवर्धक नहीं हैं। औद्योगिक उत्पादन की 70% क्षमता का ही उपयोग हो रहा है। महँगाई के अतिरिक्त देश की दूसरी बड़ी समस्या बेरोजगारी की है। जिसकी दर पिछले वर्ष 9 की तुलना में 10 पार कर गई है। यह स्थिति चिन्ताजनक है। यद्यपि चर्चा में मोदी सरकार द्वारा मुद्रा बैंक, स्किल इंडिया तथा स्टार्टअप योजनायें भी चर्चा में हैं, जिनके परिणाम अभी सामने आने हैं।


अर्थशशास्त्री जो अर्थव्यवस्था के विकास के लिये हर मर्ज की दवा जीडीपी मानते थे। अब कम से कम कहने लगे हैं कि जीडीपी बढ़ने से रोजगार नहीं बढ़ता, रोजगार में वृद्धि चाहिये तो खपत को बढ़ाना पड़ेगा, तभी औद्योगिक उत्पादन शतप्रतिशत होगा, एफडीआई निवेश के अवसर पैदा होंगे, नये उद्योग लगेंगे, जिससे रोजगार बढेगा। परन्तु यह सत्य. नहीं, यथार्थ से परे है। एड्म के अधिक से अधिक उत्पादन के सिद्धान्त को आर्थिक सम्पन्नता का आधार मानने वाले, अक्सर यह बात भूल जाते हैं कि इस सिद्धान्त में अन्य बहुत से अवयव तथा उनकी निर्धारित भूमिका अनिवार्य है, जिसके बिना यह समीकरण सही उत्तर खोजने में नाकाम ही सिद्ध होगी। लगभग पूरे विश्व में यही चल रहा है। अर्थशशास्त्री दबावों के चलते या फिर विशिष्ट प्रयोजन से पूरी बात नहीं बोलते, सही बात नहीं बोलते। अतएव विश्व में आर्थिक समीकरणें तो बहुत स्थापित की जाती हैं, परन्तु वह स्थितियों को सन्तुलित करने में नाकाम रहती है।

रोजगार वृद्धि के लिये अर्थशास्त्रियों के खपत बढ़ाने वाले सुझाव को ही ले लीजिये। खपत बढ़ने का सीधा सम्बन्ध ग्राहक की क्रय क्षमता पर निर्भर है। अतः पहले बात ग्राहक की क्रय क्षमता बढ़ाने की  जानी चाहिये, जिसके सम्बन्ध में कोई अर्थशशास्त्री बात नहीं करना चाहता। विश्व के अर्थशास्त्रियों में कभी ग्राहकों की स्थाई स्वरूप की क्रय क्षमता बढ़ाने के तरीकों पर विचार करते सुना है। जबकि अर्थव्यवस्था के स्वस्थ, विकसित होने का मजबूत, स्थाई आधार ही यह है। अस्थाई आधारों के बारे में जरूर सुना होगा, कि वस्तुयें किश्तों में उपलब्ध करा दो, बैंक से आसान शर्तों पर कर्ज दिलवा दो या फिर सातवां वेतन आयोग लागू कर कुछ लोगों के हाथों तक अतिरिक्त पैसा पंहुचा दो, ताकि यह अतिरिक्त पैसा बाजार में उत्पादनों की खपत बढ़ा सके, इस मांग के सहारे नये उद्योग लगा कर रोजगार पैदा किये जा सकें। सब तरफ इन्ही अस्थाई सममाधानों के सहारे गाड़ी खींचने का प्रयास हो रहा है, नतीजतन परिणाम वही ढाक के तीन पात? कल भी यही समस्या थी, आज भी है और कल भी रहने वाली है। यहां अधिक लिख पाना सम्भव नहीं, विषय पर विस्तारित चर्चा मैने अपनी पुस्तक "अर्थव्यवस्थाओं से बोझिल ग्राहक, ग्राहक अर्थनीति" नाम की अपनी पुस्तक में की है, जो प्रकाशन में है।

ग्राहक की क्रय क्षमता मुख्यरूप से तीन बातों से सर्वाधिक प्रभावित होती है -
1. रोजगार के सीमित व कम अवसर -
पहला व महत्वपूर्ण प्रश्न है, ग्राहक की आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये, उसकी जेब में पैसा कहां से आयेगा। 
अ. उत्पादन कर उसकी बिक्री से
ब. धन, सम्पत्ति से प्राप्त किराये से
स. श्रम को बेचने से
यदि सरकारें इन तीनों व्यवस्थाओं से ग्राहक की जेब में उसकी आवश्यकतायें पूरी करने के लिये. जरूरी धन की व्यवस्था कर सकती हैं, तो ठीक अन्यथा किसी पर्यायी व्यवस्था का विचार करना होगा।

2. मुद्रास्फीति
सरल शब्दों में मुद्रास्फीति मंहगाई है। आप को आज कोई वस्तु जिन दामों मे बाजार में मिल रही है, कल उसके दाम बढ़ जाते हैं। रिजर्व बैंक अपनी मौद्रिक नीति की समीक्षा प्रत्येक तिमाही कर इसे नियन्त्रित करने का प्रयास करता है। अनुभव यह आया है कि रिजर्व बैंक जो भी सहूलियतें देता है, उसे बैंक तथा उद्योगपति हजम कर जाते हैं। ग्राहक को मरने के लिये छोड़ दिया जाता है। रिजर्व बैंक के नये गवर्नर उर्जित पटेल यह सुनिश्चित करें कि लाभ नीचे ग्राहक तक पंहुचे।

3. अवास्तविक मूल्य (Unrealistic Pricing)
यहां बहुत बड़ा गोलमाल है। इस पर ध्यान दिये बिना सर्वकल्याणकारी अर्थव्यवस्था की कल्पना ही बेमानी है।

इन तीनों ही क्षेत्रों में समुचित अवसर तलाश करने, उन्हें विकसित करने तथा गम्भीरता से लागू करने की आवश्यकता है। न तो यह आसान है, न ही दो चार वर्षों के अन्तराल मे पूरा होने वाला, परन्तु इस मार्ग का पर्याय नहीं।