Monday, 25 July 2016

सिद्धू प्रकरण की जड़ों मे अकाली राजनीति

नवजोत सिंह सिद्धू का राज्यसभा की सदस्यता से जिस दिन स्तीफा आया था, उसी दिन से इसके बारे मे तरह तरह के कयास लगाये जा रहे थे। उनके भाजपा से अलग होने के सम्बन्ध मे कुछ इशारा उनकी विधायक पत्नी ने दिया तो था, परन्तु वह लोगों को स्पष्ट कयास लगाने के लिये पर्याप्त नहीं था। आज सिद्धू ने इस सम्बन्ध मे पत्रकार वार्ता मे कुछ बताया, कुछ नहीं बताया। भाजपा मे अपने को दरकिनार करने और पंजाब से अलग रहने की शर्त पर राज्य सभा की सदस्यता दिये जाने के मामले का उल्लेेख  सतही तौर पर शायद सही घटनाक्रम को उघेडने मे सफल न रहा हो, परन्तु यह उन लोगों को इशारा दे गया जो पंजाब की राजनीतिक गतिविधियों पर लम्बे समय से पैनी नजर रख रहे हैं। पंजाब मे भाजपा के प्रभावी चेहरों पर नजर डालें तो किसी को भी अटपटा लगेगा कि अपने जबरदस्त प्रभावी चेहरे को कोई राजनीतिक दल कैसे किनारे लगा सकता है। परन्तु राजनीति मे हाजमा बहुत दुरूस्त रखना पड़ता है। कभी दो कदम आगे तो कभी चार कदम पीछे हटना पड़ता है। सिद्धू प्रकरण भी भाजपा की चार कदम पीछे हटने की मजबूरी है, जिसके लि्ये शायद सिद्धू को मानसिक रूप से तैयार नहीं किया जा सका या फिर सिद्धू ने उस स्थिति को अपनाने से इन्कार कर दिया जो संगठन के हितचिन्तक कार्यकर्ता अपनाकर खुद को गुमनामी के अन्धेरे मे धकेलने के लिये तैयार हो जाते हैं।

वस्तुस्थिति जानने के लिये पंजाब, वहां की राजनीति, विभिन्न राजनीतिक दलों की स्थितियों का विश्लेषण जरूरी है। पंजाब मे मुख्य राजनीतिक पैठ दो दलों की है, कांग्रेस और अकाली। दोनो की पकड़ इतनी मजबूत है कि बसपा के जनक कांशीराम पंजाब के होने के बावजूद वहां पैर तक न जमा सके। राष्ट्रीय दल के रूप मे आगे बढ़ती भाजपा के लिये जरूरी था कि वह उन तमाम प्रदेशों मे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से अपने पैर जमाये। देश के अनेको प्रान्तों मे भाजपा की यह यात्रायें और उसके परिणाम सामने हैं। पंजाब मे भाजपा ने अपने पैर जमाने के लिये अकाली दल का हाथ थामा। अकाली भी कांग्रेस को टक्कर देने के लिये सहारे की तलाश मे थे, अत: उन्होने भाजपा का हाथ पकड़ लिया। परन्तु अकाली भाजपा के साथ चलते हुये इस बारे मे अत्यधिक सचेत हैं कि भाजपा की पंजाब मे तााकत निर्धारित सीमा से आगे न बढ़े। वह बराबर आशंकित था कि भाजपा पंजाब मे कहीं इतनी ताकतवर न हो जाये कि उसे ढकेलकर आगे बढ़ जाये। अतः अकाली भाजपा की आन्तरिक गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखते हैं और उन्हे अपने अनुरूप ढालने के लिये भाजपा की आन्तरिक गतिविधियों मे भी हस्तक्षेप करते रहते हैं। अकाली इस विषय मे कितने सेंसिटिव हैं, इस बात का अन्दाज इसी से लग जाता है कि आर एस एस का सिखों के बीच कार्य करने वाला एक संगठन सिख संगत है। सिख संगत ने पंजाब मे भी और बाहर भी सिखों के बीच बहुत काम किया है। पंजाब मे सिख संगत का काम जैसे ही बढ़ा, सिख संगत के कार्यकर्ता गांव तक पंहुचने लगे, अकालियों ने विवाद खड़े करने शुरू कर दिये। अकालियों के लिये तब तक तो ठीक है, जब तक भाजपा को पंजाब मे दमदार नेता न मिले। भाजपा को दमदार नेता मिलते ही उसका हाजमा हिलने लगता है। सिद्धू के रूप मे भाजपा को पंजाब  मे दमदार लीडर मिला, जिसके सहारे पंजाब मे भाजपा अपने दम पर गाड़ी खींचने की हिम्मत दिखा सकती थी। यही स्थिति अकालियों को मंजूर नहीं थी।

भाजपा मे सिद्धू प्रकरण की मुख्य शुरूवात 2014 लोकसभा चुनाव से हुई। पूरे देश मे मोदी लहर चल रही थी, एनडीए के बहुमत मे आने के पूरे आसार थे। भाजपा अपने सहयोगियों के साथ फूंक फूंक कर कदम रख रही थी। किसी भी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं थी। यहां तक कि उसने उ.प्र. और बिहार मे कई ऐसे दलों के साथ भी उन शर्तों पर समझौते किये, जिन पर सामान्य परिस्थितियों मे शायद वह कभी तैयार न होती। यही अवसर अकालियों को आपरेशन सिद्धू के लिये सबसे उपयुक्त लगा। समझौते के दबाव मे आपरेशन हो गया, सिद्धू जो पंजाब मे भाजपा के प्रचार की मुख्य धुरी होता, प्रचार से ही बाहर था। पार्टी और सिद्धू के बीच खटास पड़ चुकी थी, यही अकाली चाहते थे। केन्द्र मे सरकार बनने के बाद भाजपा डेमेज कन्ट्रोल मे लगी, सिद्धू को मनाने के प्रयास हुये और समझौता हो भी गया, सिद्धू को राज्यसभा मे भेजकर सांसद की कमी पूरी की गई। परन्तु अकालियों को सिद्धू मंजूर नहीं था जो आगे चलकर उनके लिये चुनौती बन सके। राज्यसभा मे सिद्धू को पंजाब से भेजने के लिये अकालियों के समर्थन की भी जरूरत रही और फिर बने खेल को बिगाड़ने का काम शुरू हो गया, नतीजा सामने है।

सिद्धू प्रकरण की जड़ों मे अकाली राजनीति

नवजोत सिंह सिद्धू का राज्यसभा की सदस्यता से जिस दिन स्तीफा आया था, उसी दिन से इसके बारे मे तरह तरह के कयास लगाये जा रहे थे। उनके भाजपा से अलग होने के सम्बन्ध मे कुछ इशारा उनकी विधायक पत्नी ने दिया तो था, परन्तु वह लोगों को स्पष्ट कयास लगाने के लिये पर्याप्त नहीं था। आज सिद्धू ने इस सम्बन्ध मे पत्रकार वार्ता मे कुछ बताया, कुछ नहीं बताया। भाजपा मे अपने को दरकिनार करने और पंजाब से अलग रहने की शर्त पर राज्य सभा की सदस्यता दिये जाने के मामले का उल्लेेख  सतही तौर पर शायद सही घटनाक्रम को उघेडने मे सफल न रहा हो, परन्तु यह उन लोगों को इशारा दे गया जो पंजाब की राजनीतिक गतिविधियों पर लम्बे समय से पैनी नजर रख रहे हैं। पंजाब मे भाजपा के प्रभावी चेहरों पर नजर डालें तो किसी को भी अटपटा लगेगा कि अपने जबरदस्त प्रभावी चेहरे को कोई राजनीतिक दल कैसे किनारे लगा सकता है। परन्तु राजनीति मे हाजमा बहुत दुरूस्त रखना पड़ता है। कभी दो कदम आगे तो कभी चार कदम पीछे हटना पड़ता है। सिद्धू प्रकरण भी भाजपा की चार कदम पीछे हटने की मजबूरी है, जिसके लि्ये शायद सिद्धू को मानसिक रूप से तैयार नहीं किया जा सका या फिर सिद्धू ने उस स्थिति को अपनाने से इन्कार कर दिया जो संगठन के हितचिन्तक कार्यकर्ता अपनाकर खुद को गुमनामी के अन्धेरे मे धकेलने के लिये तैयार हो जाते हैं।

वस्तुस्थिति जानने के लिये पंजाब, वहां की राजनीति, विभिन्न राजनीतिक दलों की स्थितियों का विश्लेषण जरूरी है। पंजाब मे मुख्य राजनीतिक पैठ दो दलों की है, कांग्रेस और अकाली। दोनो की पकड़ इतनी मजबूत है कि बसपा के जनक कांशीराम पंजाब के होने के बावजूद वहां पैर तक न जमा सके। राष्ट्रीय दल के रूप मे आगे बढ़ती भाजपा के लिये जरूरी था कि वह उन तमाम प्रदेशों मे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से अपने पैर जमाये। देश के अनेको प्रान्तों मे भाजपा की यह यात्रायें और उसके परिणाम सामने हैं। पंजाब मे भाजपा ने अपने पैर जमाने के लिये अकाली दल का हाथ थामा। अकाली भी कांग्रेस को टक्कर देने के लिये सहारे की तलाश मे थे, अत: उन्होने भाजपा का हाथ पकड़ लिया। परन्तु अकाली भाजपा के साथ चलते हुये इस बारे मे अत्यधिक सचेत हैं कि भाजपा की पंजाब मे तााकत निर्धारित सीमा से आगे न बढ़े। वह बराबर आशंकित था कि भाजपा पंजाब मे कहीं इतनी ताकतवर न हो जाये कि उसे ढकेलकर आगे बढ़ जाये। अतः अकाली भाजपा की आन्तरिक गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखते हैं और उन्हे अपने अनुरूप ढालने के लिये भाजपा की आन्तरिक गतिविधियों मे भी हस्तक्षेप करते रहते हैं। अकाली इस विषय मे कितने सेंसिटिव हैं, इस बात का अन्दाज इसी से लग जाता है कि आर एस एस का सिखों के बीच कार्य करने वाला एक संगठन सिख संगत है। सिख संगत ने पंजाब मे भी और बाहर भी सिखों के बीच बहुत काम किया है। पंजाब मे सिख संगत का काम जैसे ही बढ़ा, सिख संगत के कार्यकर्ता गांव तक पंहुचने लगे, अकालियों ने विवाद खड़े करने शुरू कर दिये। अकालियों के लिये तब तक तो ठीक है, जब तक भाजपा को पंजाब मे दमदार नेता न मिले। भाजपा को दमदार नेता मिलते ही उसका हाजमा हिलने लगता है। सिद्धू के रूप मे भाजपा को पंजाब  मे दमदार लीडर मिला, जिसके सहारे पंजाब मे भाजपा अपने दम पर गाड़ी खींचने की हिम्मत दिखा सकती थी। यही स्थिति अकालियों को मंजूर नहीं थी।

भाजपा मे सिद्धू प्रकरण की मुख्य शुरूवात 2014 लोकसभा चुनाव से हुई। पूरे देश मे मोदी लहर चल रही थी, एनडीए के बहुमत मे आने के पूरे आसार थे। भाजपा अपने सहयोगियों के साथ फूंक फूंक कर कदम रख रही थी। किसी भी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं थी। यहां तक कि उसने उ.प्र. और बिहार मे कई ऐसे दलों के साथ भी उन शर्तों पर समझौते किये, जिन पर सामान्य परिस्थितियों मे शायद वह कभी तैयार न होती। यही अवसर अकालियों को आपरेशन सिद्धू के लिये सबसे उपयुक्त लगा। समझौते के दबाव मे आपरेशन हो गया, सिद्धू जो पंजाब मे भाजपा के प्रचार की मुख्य धुरी होता, प्रचार से ही बाहर था। पार्टी और सिद्धू के बीच खटास पड़ चुकी थी, यही अकाली चाहते थे। केन्द्र मे सरकार बनने के बाद भाजपा डेमेज कन्ट्रोल मे लगी, सिद्धू को मनाने के प्रयास हुये और समझौता हो भी गया, सिद्धू को राज्यसभा मे भेजकर सांसद की कमी पूरी की गई। परन्तु अकालियों को सिद्धू मंजूर नहीं था जो आगे चलकर उनके लिये चुनौती बन सके। राज्यसभा मे सिद्धू को पंजाब से भेजने के लिये अकालियों के समर्थन की भी जरूरत रही और फिर बने खेल को बिगाड़ने का काम शुरू हो गया, नतीजा सामने है।

सिद्धू प्रकरण की जड़ों मे अकाली राजनीति

नवजोत सिंह सिद्धू का राज्यसभा की सदस्यता से जिस दिन स्तीफा आया था, उसी दिन से इसके बारे मे तरह तरह के कयास लगाये जा रहे थे। उनके भाजपा से अलग होने के सम्बन्ध मे कुछ इशारा उनकी विधायक पत्नी ने दिया तो था, परन्तु वह लोगों को स्पष्ट कयास लगाने के लिये पर्याप्त नहीं था। आज सिद्धू ने इस सम्बन्ध मे पत्रकार वार्ता मे कुछ बताया, कुछ नहीं बताया। भाजपा मे अपने को दरकिनार करने और पंजाब से अलग रहने की शर्त पर राज्य सभा की सदस्यता दिये जाने के मामले का उल्लेेख  सतही तौर पर शायद सही घटनाक्रम को उघेडने मे सफल न रहा हो, परन्तु यह उन लोगों को इशारा दे गया जो पंजाब की राजनीतिक गतिविधियों पर लम्बे समय से पैनी नजर रख रहे हैं। पंजाब मे भाजपा के प्रभावी चेहरों पर नजर डालें तो किसी को भी अटपटा लगेगा कि अपने जबरदस्त प्रभावी चेहरे को कोई राजनीतिक दल कैसे किनारे लगा सकता है। परन्तु राजनीति मे हाजमा बहुत दुरूस्त रखना पड़ता है। कभी दो कदम आगे तो कभी चार कदम पीछे हटना पड़ता है। सिद्धू प्रकरण भी भाजपा की चार कदम पीछे हटने की मजबूरी है, जिसके लि्ये शायद सिद्धू को मानसिक रूप से तैयार नहीं किया जा सका या फिर सिद्धू ने उस स्थिति को अपनाने से इन्कार कर दिया जो संगठन के हितचिन्तक कार्यकर्ता अपनाकर खुद को गुमनामी के अन्धेरे मे धकेलने के लिये तैयार हो जाते हैं।

वस्तुस्थिति जानने के लिये पंजाब, वहां की राजनीति, विभिन्न राजनीतिक दलों की स्थितियों का विश्लेषण जरूरी है। पंजाब मे मुख्य राजनीतिक पैठ दो दलों की है, कांग्रेस और अकाली। दोनो की पकड़ इतनी मजबूत है कि बसपा के जनक कांशीराम पंजाब के होने के बावजूद वहां पैर तक न जमा सके। राष्ट्रीय दल के रूप मे आगे बढ़ती भाजपा के लिये जरूरी था कि वह उन तमाम प्रदेशों मे क्षेत्रीय दलों के सहयोग से अपने पैर जमाये। देश के अनेको प्रान्तों मे भाजपा की यह यात्रायें और उसके परिणाम सामने हैं। पंजाब मे भाजपा ने अपने पैर जमाने के लिये अकाली दल का हाथ थामा। अकाली भी कांग्रेस को टक्कर देने के लिये सहारे की तलाश मे थे, अत: उन्होने भाजपा का हाथ पकड़ लिया। परन्तु अकाली भाजपा के साथ चलते हुये इस बारे मे अत्यधिक सचेत हैं कि भाजपा की पंजाब मे तााकत निर्धारित सीमा से आगे न बढ़े। वह बराबर आशंकित था कि भाजपा पंजाब मे कहीं इतनी ताकतवर न हो जाये कि उसे ढकेलकर आगे बढ़ जाये। अतः अकाली भाजपा की आन्तरिक गतिविधियों पर भी पूरी नजर रखते हैं और उन्हे अपने अनुरूप ढालने के लिये भाजपा की आन्तरिक गतिविधियों मे भी हस्तक्षेप करते रहते हैं। अकाली इस विषय मे कितने सेंसिटिव हैं, इस बात का अन्दाज इसी से लग जाता है कि आर एस एस का सिखों के बीच कार्य करने वाला एक संगठन सिख संगत है। सिख संगत ने पंजाब मे भी और बाहर भी सिखों के बीच बहुत काम किया है। पंजाब मे सिख संगत का काम जैसे ही बढ़ा, सिख संगत के कार्यकर्ता गांव तक पंहुचने लगे, अकालियों ने विवाद खड़े करने शुरू कर दिये। अकालियों के लिये तब तक तो ठीक है, जब तक भाजपा को पंजाब मे दमदार नेता न मिले। भाजपा को दमदार नेता मिलते ही उसका हाजमा हिलने लगता है। सिद्धू के रूप मे भाजपा को पंजाब  मे दमदार लीडर मिला, जिसके सहारे पंजाब मे भाजपा अपने दम पर गाड़ी खींचने की हिम्मत दिखा सकती थी। यही स्थिति अकालियों को मंजूर नहीं थी।

भाजपा मे सिद्धू प्रकरण की मुख्य शुरूवात 2014 लोकसभा चुनाव से हुई। पूरे देश मे मोदी लहर चल रही थी, एनडीए के बहुमत मे आने के पूरे आसार थे। भाजपा अपने सहयोगियों के साथ फूंक फूंक कर कदम रख रही थी। किसी भी तरह का जोखिम लेने को तैयार नहीं थी। यहां तक कि उसने उ.प्र. और बिहार मे कई ऐसे दलों के साथ भी उन शर्तों पर समझौते किये, जिन पर सामान्य परिस्थितियों मे शायद वह कभी तैयार न होती। यही अवसर अकालियों को आपरेशन सिद्धू के लिये सबसे उपयुक्त लगा। समझौते के दबाव मे आपरेशन हो गया, सिद्धू जो पंजाब मे भाजपा के प्रचार की मुख्य धुरी होता, प्रचार से ही बाहर था। पार्टी और सिद्धू के बीच खटास पड़ चुकी थी, यही अकाली चाहते थे। केन्द्र मे सरकार बनने के बाद भाजपा डेमेज कन्ट्रोल मे लगी, सिद्धू को मनाने के प्रयास हुये और समझौता हो भी गया, सिद्धू को राज्यसभा मे भेजकर सांसद की कमी पूरी की गई। परन्तु अकालियों को सिद्धू मंजूर नहीं था जो आगे चलकर उनके लिये चुनौती बन सके। राज्यसभा मे सिद्धू को पंजाब से भेजने के लिये अकालियों के समर्थन की भी जरूरत रही और फिर बने खेल को बिगाड़ने का काम शुरू हो गया, नतीजा सामने है।

Wednesday, 20 July 2016

राज्य सभा मे कश्मीर पर गुलाम नबी आजाद

सुन रहे हैं कश्मीर पर राज्य सभा मे गुलाम नबी के वक्तव्य का वीडियो वायरल हो रहा है। उन्होने यह कहा, वह कहा, पता नहीं क्या कहा। मैने भी कई बार गुलाम नबी का वीडियो सुना, मेरा बेबाक विश्लेषण ।

वाह खूब कहा गुलाम नबी ने, क्या खूब समझा आपने। बड़ी चालाकी से आग को सुलगता छोड़ने का काम किया है। कितने बेहतरीन हालात थे कश्मीर मे गुलाम नबी के जमाने मे, पूरी दुनिया जानती है। जब कश्ममीरी पंडित अपना घरबार छोड़ कर भागे तब हालात बेहतर थे। आपने इतने बेहतरीन हालात बनाये कि पंडित घर वापसी सोच भी नहीं सके। आपने बिल्कुल सही कहा जो आपने कश्मीर मे किया बी जे पी 50 सालों मे भी नहीं कर सकती। कैसे कर सकती है, आपने ही समस्या खडी की, आपने ही उसे खाद पानी दिया। आप सोते रहे कश्मीर मे विदेशों से आतंकवाद की जड़ें जमाने के लिये पैसा आता रहा। आपने कश्मीर मे वह करिश्मा किया कि पहले आतंकवादी बाहररी मुल्कों से आते थे। अब वहीं पैदा होने लगे हैं। गुलाम नबी ने फिर यह सिद्ध कर दिया कि कश्मीर की समस्या उनकी तुष्टीकरण की नीति और समुदाय विशेष के वोट बैंक को साधने की कोशिशों का परिणाम है। आज भी वह इसी काम मे लगे हैं। कश्मीर के ताजा महौल मे सेना ने कारगिल युद्ध के. समय से अधिक जवान खोेये हैं। गुलाम नबी के मुंह से उनके लिये एक शब्द भी नहीं फूटा।

 आपका दर्द समझ भी आता है और आपके शब्दों मे भी छलका है। कश्मीर मे इतना बेहतरीन माहौल बनाने, वहां के मुख्यमन्त्री रहने के बावजूद भी आप दशकों से लोकसभा चुनाव लड़ने के लिये, देश के दूसरे सूबों की तरफ ही भागते हैं। यहां तक कि 2014 का लोकसभा चुनाव भी आप कश्मीर से लड़ने की हिम्मत नहीं दिखा पाये। दूसरी तरफ बीजेपी कश्मीर मे सरकार बनाने की स्थिति मे आ गई। कहीं यह न हो कि आने वाले समय मे आपकी पार्टी वहां नेस्तनाबूद हो जाये और बीजेपी जम जाये।इसी झल्लाहट मे आपने यह तक कह डाला कि आने वाले 200 वर्षों तक वहां बीजेपी स्वीकार्य नहीं होगी। यह कहने के पीछे आपके जेहन मे यही चल रहा था न कि वहां एक सम्प्रदाय विशेष ने छल, बल और पाकिस्तानी मदद से आतंकवाद के सहारे जब आपको भगा दिया तो किसी दूसरे को वह भी बीजेपी जैसी पार्टी को कैसे आने देगा।

गुलाम नबी जी आप वरिष्ठ राजनीतिज्ञ हैं। आपकी जद कश्मीर ही नहीं पूरा हिन्दुस्तान है। जिसने आपको उन दिनों सर माथे पर बैठाया, जब चुनाव लड़ना तो दूर, आप मे कश्मीर मे घुसने की हिम्मत भी नहीं थी। आपके ऊपर पूरे हिन्दुस्तान का कर्ज है और वैसे भी अब आपका राजनीतिक सफर मंजिल पर पंहुच रहा है। कम से कम अब तो सच बोलने की हिम्मत दिखाइये। अब तो देश, सेना और कश्मीर घाटी छोड़ जम्मू कश्मीर के शेष भाग के लोगों की भावनाओं के अनुरूप आचरण करने की हिम्मत दिखाइये। यह न करके आप बहुत बड़ी गलती कर रहे हैं। आप सक्रिय राजनीति के हाशिये की तरफ तेजी से बढ़ रहे हैं। आपका वर्तमान आचरण आपको गुमनामी के अन्धेरे की तरफ धकेल रहा है। याद कीजिये शेरे कश्मीर, फारूक अब्दुल्ला और अभी मरहूम हुये मुफ्ती साहब को, कुछ पर खाक चढ़ चुकी है, कुछ पर चढ़ती जा रही है। वैसे भी इनमे से किसी को वह राष्ट्रीय पहचान नहीं मिली, जो आपको हासिल है। अत: अब तो सच बोलने की हिम्मत दिखाइये, यह हमारी सलाह है, आगे आपकी मर्जी।

Thursday, 30 June 2016

सरकारी कर्मचारियों की वेतनवृद्धि सर्वहारा के लिये घातक

अर्थव्यवस्था मे अतिरिक्त पैसा उसके विकास को गति देने मे सहायक होता है। आंकडे यही बताते हैं कि यदि यह अतिरिक्त पैसा ग्राहकों  के हाथों मे दिया जाये। ग्राहक इस पैसे को बाजार मे खर्च करता है जिससे बाजार मे मांग बढती है, यह मांग अतिरिक्त उत्पादन के संसाधन विकसित करने और उद्योग लगाने, उद्योग नवीन रोजगार पैदा करने मे सहायक होते हैं। यह आधुनिक अर्थशास्त्र का नियम है। जीडीपी वृद्धि के लिये छटपटाती मोदी सरकार के लिये ऐसे किसी अवसर को न चूकना  उसकी मजबूरी है। हम केन्द्र सरकार के कर्मचारियों को सातवें वेतन आयोग लागू करना इसी द्रष्टि से देखते हैं। टैक्स वृद्धि और मंहगाई से हलाकान ग्राहकों पर इस 1 करोड 2 लाख करोड़ के अतिरिक्त बोझ का घातक असर निश्चित है। केन्द्र सरकार के लगभग 1 करोड़ कर्मचारी हैं, इनमे यदि राज्य सरकारों के कर्मचारियों की संख्या भी मिला ली जाये, क्योंकि उन्हे भी इसीप्रकार की वेतन वृद्धि देनी पडेगी तो संख्या लगभग 5 करोड हो जाती है। सरकारों द्वारा की गई वेतन वृद्धि के कारण बाजार मे मुद्रा का प्रचलन बढेगा, जिसके कारण जन्म लेने वाली मुद्रास्फीर्ति पूरी आबादी पर अपना प्रभाव छोडेगी। पहले से मंहगाई से जूझने वाले ग्राहक को निश्चित रूप से इससे धक्का लगेगा।

सरकारी कर्मचारी के हाथ मे आने वाला पैसा बाजार मे आये, इसी उम्मीद मे लगे हाथ शॉप एण्ड इस्टेब्लिस्मेन्ट कानून बदलकर बाजारों को 24 x 7 घन्टे खोलने की अनुमति दे दी गई है। ग्राहकों के प्रतिनिधि के नाते हम इस कदम का स्वागत करते हैं। परन्तु इससे सम्बन्धित दुनिया के आंकडे देखने पर नहीं लगता कि इससे वह कुछ हासिल हो पायेगा जो प्रचारित कर यह कदम उठाया जा रहा है। बमुश्किल दुनिया के उंगली पर गिने जा सकने वाले शहरों मे ही यह व्यवस्था लागू हो पाई है। रोजगार मे मामूली वृद्धि ही होगी, जबकि व्यापार को इसका लाभ मिलेगा। पहले ही निजी कारखानों मे काम के 8 घन्टे कबके 12 घन्टे बन चुके हैं।

सरकार के इस कदम के साथ ही ग्राहकों को अतिरिक्त टैक्स का भार झेलने के लिये तैयार रहना चाहिये। वर्ष 2016 के 18 लाख करोड़ रूपयों के बजट को देखने से ही यह स्पष्ट हो जाता है। इस बजट मे सरकार की सभी श्रोतों से आय 12 लाख 21. हजार 818 करोड़ रुपये थी, जबकि गैर योजना खर्च 13 लाख 12 हजार 200 करोड़ रुपये यानी आमदनी से 90,372 करोड़ रुपये अधिक, अब इस अतिरिक्त 1 लाख 2 हजार करोड़ रुपये की व्यवस्था का रास्ता ग्राहकों की जेब से ही होकर गुजरने वाला है। वैसे जेटली जी को GST पास होने की उम्मीद से सर्विस टैक्स 15.5 से 18%. हो जाने की भी उम्मीद भी होगी।

मोदी को पंक्ति के अन्तिम छोर पर बैठे जिस व्यक्ति की सर्वाधिक चिन्ता है, उसी के लिये यह कदम सर्वाधिक कष्टदायी हैं। सरकार अार्थिक मामलों में कमोबेश वही कदम उठा रही है, जिनके फलों के स्वाद विश्व के कई देश चख चुके हैं। जो असफल सिद्ध हो चुके हैं। सर्वहारा को आर्थिक सक्षम बनाने तथा आर्थिक असमानता को दूर करने के मार्ग अलग और लीक से हटकर हैं। शायद उनमे भी जोखिम हो, जिसे उठाने को सरकार अभी तैयार न हो, हम उस समय का इन्तजार करेंगे।

Thursday, 16 June 2016

कैराना : Ground Zero

आज उत्तर प्रदेश के शामली जिले की कैराना तहसील पूरे देश मे चर्चा मे है। कहा यह गया कि कैराना मे मुस्लिम बहुल आबादी मे गुण्डागर्दी से परेशान क्षेत्र के हिन्दू अ्ल्पसंख्यक अपना घर, व्यापार, खेती बेचकर पलायन करने लगे। देश मे जब तब सेकुलर, असहिष्णुता की बयार जब तब बहती है। अत: यह लॉबी भी ताल ठोक कर मैदान मे उतर पड़ी। यह लोग भी मानते हैं कि कुछ लोगों ने कैराना छोड़ा, पर अपने बेहतर भविष्य के लिये। वर्तमान मे दोनो आमने सामने हैं। अपने अपने तर्कों को लेकर। हम सभी बातों का सिलसिलेवार बेबाकी से विश्लेषण करेंगे। परन्तु पहले कैराना और उसके आसपास के क्षेत्र की भौगोलिक, सामाजिक, राजनीतिक तथा आर्थिक परिस्थितियों को समझ लेते हैं।

कैराना उत्तर प्रदेश की उत्तर पश्चिमी सीमा पर यमुना नदी के किनारे हरियाणा के पानीपत की सीमा से लगा है। पहले कैराना मुजफ्फरनगर जिले की तहसील हुआ करता था। वर्ष 2011 मे मायावती द्वारा शामली को जिला बनाने के बाद कैराना शामली की तहसील बन गया। सिर्फ 1998 और 2013 मे ही यहां से बीजेपी सांसद ने जीत हासिल की। 2011 जनगणना के मुताबिक़ कैराना तहसील की की जनसंख्या एक लाख 77 हजार 121 है. कैराना नगर पालिका की आबादी करीब 89 हजार है. कैराना नगर पालिका परिषद के इलाक़े में 81% मुस्लिम, 18% हिंदू और अन्य धर्मों को मानने वाले लोग 1% हैं. यूपी में साक्षरता दर 68% है लेकिन कैराना में 47% लोग ही साक्षर हैं। कैराना पश्चिमी उत्तर प्रदेश के सहारनपुर से 80 किमि, मेरठ से 72 किमि, मुजफ्फरनगर से 53 किमि, बिजनौर से किमि की दूरी पर है। यह सभी जिले अत्यधिक संवेदनशील जिले हैं। इन सभी जिलों मे वह खाद पानी पर्याप्त मात्रा मे उपलब्ध है, जो दो समुदायों के बीच सौहार्द बिगाड़ने की भूमिका निभाता है। इसपर यदि प्रशासन और कानून व्यवस्था ढीली ढाली हो तो सोने मे सोहागा। अखिलेश राज मे शासन प्रशासन की चुस्ती का अंदाज कुछ दिन पहले मथुरा मे घटित जवाहरबाग कांड से मालुम पड़ जाता है। पिछले दो-तीन वर्षों मे इन सभी स्थानों पर दंगे हो चुके हैं। यह सब हम राज्य सरकार तथा उन सेकुलर लोगों की याददाश्त ताजा करने के लिये बता रहे हैं, जिन्हे हिन्दुओं पर हुये किसी भी अत्याचार को नकारने तथा उसे जल्दी से भूलने की बीमारी है। यह भी विचित्र संयोग है कि हम जिन जिन घटनाक्रमों का जिक्र कर रहे हैं। सभी के तमगे उत्तर प्रदेश की समाजवादी अखिलेश सरकार के नाम हैं। 

सेकुलर दोस्तों और राजनीतिक दलों को सहारनपुर के कांग्रेस नेता इमरान मसूद का 2014 चुनावों मे दिया भाषण भी सुनने और गौर करने योग्य है। जिसमे वह हिन्दुओं और मोदी की स्तुति कर रहा है। सितम्बर 2013 मे मुजफ्फरनगर के कावल से हिन्दू -मुस्लिम दंगे की शुरूवात हुई, जिसने मुजफ्फरनगर और शामली जिले को अपनी चपेट मे ले लिया था, मई 2014 मे मेरठ दंगे की आग मे झुलसा, मुरादाबाद की कांठ तहसील मे जुलाई 2014 मे दंगे की चिंगारी फूटी, जुलाई 2014 मे ही सहारनपुर ने भी दंगे की आंच झेली। यह सब घटनाक्रम यह समझने के लिये पर्याप्त हैं कि कैराना से 50 से 80 कि मी की दूरी पर उस क्षेत्र का साम्प्रदायिक माहौल क्या और कैसा है। वहां पिछले 2-3 वर्षों से चल क्या रहा था। इस माहौल मे कभी भी पलायन शुरू होने की सम्भावना से इन्कार स्वार्थी तत्व ही करेंगे, आज भी कर रहे हैं। 

अब कैराना की वर्तमान घटनाओं पर आते हैं। इस क्षेत्र के स्थानीय अखबारों मे कैराना मे हिन्दुओं के डर और पलायन की छुटपुट खबरें कुछ समय से छप रही थी। एक समाचार चैनल का ध्यान इन खबरों पर गया और उसने स्टोरी करने का विचार किया। जब चैनल का संवाददाता स्टोरी कवर करने के लिये ग्राउन्ड जीरो पर पँहुचा, वहां का जो माहौल उसने देखा, उसके हाथों के तोते उड़ गये। इस तरह कैराना का जिन्न बन्द बोतल के बाहर आया। इस जिन्न ने देश की सेकुलर जमात और राज्य सरकार को बेचैन कर दिया। पलायन का सच नंगी आँखों से चुपचाप देखा महसूस किया जाता है। वह जो इसे टीवी इन्टरव्यू या गवाह की शक्ल मे देखना चाहते हैं, सिर्फ एक वर्ग को वोट के लालच मे सन्तुष्ट करने के लिये नौटंकी कर रहे हैं। आज वहां जो हालात हैं, उनको कैमरे या किसी प्रशासनिक अधिकारी को बताने मे अच्छे अच्छों की पैन्ट गीली हो जाती है। वह भी उन अधिकारियों को जिनके पक्षपाती रवैये के कारण यह स्थितियां बनी हैं। कैराना के सांसद द्वारा कैराना से पलायन करने वाले 346 तथा कांधला से पलायन करने वाले 63 लोगों की सूची पर उंगली उठाना बुनियादी रूप से गलत है। इस लिस्ट के 100-150 नाम गलत होने का सवाल उठाने वाले शेष 196 सही नामों पर खामोश रहकर, जवाबदेही से बचने का षडयन्त्र रचने मे लगे हैं। 

देश और समाज के सामने झूठी छाती पीट पीट कर शोर मचाने वाले इस वर्ग विशेष के रूदाली रूदन को देश ने हैदराबाद मे रोहित वैमूला की आत्महत्या के समय सुना, देखा और समझा। जहां रोहित का करीबी दोस्त इनसे छिटककर हकीकत बयान करता दिखा। दादरी मे अखलाक की मौत के समय देखा, जहां बाद मे मथुरा लैब की रिपोर्ट आने पर इन्हे अपने शब्दों को वापस निगलना पड़ा। जेएनयू मे देशद्रोही नारे लगाने वालों का पक्ष लेकर बंगाल चुनाव मे उतर अपनी ऐसी तैसी कराने तथा वीडियो क्लिपें सही साबित होने पर बेशर्मों की खिलखिलाते देखा और अब एक बार यह वर्ग फिर कैराना की घटनाओं को झुठलाने की कोशिश मे है। इस वर्ग के साथ किस प्रकार का व्यवहार करना है, यह निर्णय देश और समाज को करना है।

Wednesday, 15 June 2016

वैश्विक शोषण से मुक्ति का एकमेव उपाय हिन्दू अर्थचिन्तन - पं दीनदयाल उपाध्याय

जब हम ब्रिटिश उपनिवेश थे, तभी देश मे इस बात का जोर शोर से प्रचार किया गया कि ज्ञान के मामले मे हमारा देश अत्यधिक पिछड़ा हुआ है। अंग्रेजों के साथ इस बात को खाद पानी देने मे उन लोगों का भी कम हाथ नहीं था, जिन्होने विदेशों मे शिक्षाा प्राप्त की थी। यह भारतीय अंग्रेजों की जीवन शैली से इतना अधिक प्रभावित थे कि इन्होने न तो भारतीय संस्कृति को जानने समझने की चेष्टा की, न ही इनमे कभी भारतीय   ग्रन्थो के विश्लेषण की क्षमता आई। दुर्भाग्य यह रहा कि १९४७ के बाद देश का नेतृत्व इसी वर्ग के हाथों मे चला गया। पाश्चात्य की अंधभक्ति से ओतप्रोत यह वर्ग देश को उसी राह पर ले गया जिस पर पश्चिमी देश कदम बढ़ा रहे थे। आज इन लोगों तथा इनके आदर्शों की सामाजिक व मानव विषयी अज्ञानता का परिणाम भारत ही नहीं, पूरा विश्व भुगत रहा है। आगे चलकर जैसे जैसे पश्चिमी विद्वानों का परिचय भारतीय दर्शन से होता गया, सभी भारतीय दर्शन के विचारों से सहमत दिखे। आर्थिक क्षेेत्र भी इसका अपवाद नहीं है, पश्चिमी विद्वानों के भारतीय दर्शन समर्थित कोटेशनों  से साहित्य पटा पड़ा है। पं दीनदयाल उपाध्याय भी इसी विचार दर्शन के संवाहक थे। यद्यपि दीनदयाल जी के जाने के बहुत समय बाद इस विषय पर एक सम्पूर्ण पुस्तक डा म ग बोकरे की Hindu Economics वर्ष 1993 मे आई। विसंगति देखिये डा बोकरे को अपने विषय से भारतीय अर्थशास्त्रियों को परिचित कराने से कहीं सरल पश्चिमी अर्थशशास्त्रियों को परिचित कराना लगा। जब डा बोकरे ने कनाडा तथा अमेरिका के प्रसिद्ध अर्थशशास्त्री जे के गालब्रेथ को हिन्दू इकनॉमिक्स से अवगत कराया, उन्होने न सिर्फ इन विचारों की सराहना की, यह भी कहा कि पश्चिमी अर्थशशास्त्रियों को प्राचीन भारत की आर्थिक व्यवस्थाओं को भी जानना समझना चाहिये।

परम पूज्यनीय गुरू जी ने प्रारम्भ मे तथा बाद मे दीनदयाल जी ने हिन्दू तत्वज्ञान के इन्ही आधारों को विकसित किया। श्री गुरू जी तथा दीनदयाल जी के विचारों मे इतनी समानता है, कि यही लगता है दीनदयाल जी श्री गुरू जी के विचारों को आगे बढ़ा रहे हैं। दोनो महानायकों की इस एकीकृत विचार सृष्टि के सम्बन्ध मे श्री दत्तोपन्त ठेंगड़ी जी एक स्थान पर अपनी पुस्तक "प्रस्तावना" मे लिखते हैं - कालीकट का अधिवेशन समाप्त हुआ था। जनसंघ के कुछ नेताओं के साथ पंडित जी बंगलोर से डोडाबल्लारपुर पँहुचे थे। वहां संघ का शिविर लगा था और स्वयं श्री गुरू जी शिविर मे उपस्थित थे। सायंकाल श्री गुरू जी का बौद्धिक वर्ग होना था। किन्तु उससे पूर्व चायपान के समय श्री गुरू जी ने कहा. " अब दीनदयाल जी बोलेंगे।" इस पर सब चकित रह गये। एक ने कहा " शिविर मे सब लोग आपके मार्ग दर्शन के लिये एकत्र हैं।" श्री गुरू जी ने कहा, "नहीं भाई! दीनदयाल जी ही बोलेंगे।" इस पर किसी ने कहा, "वह तो जनसंघ के अध्यक्ष हैं।" इस पर श्री गुरू जी ने तुरन्त कहा,"नहीं. दीनदयाल जी संघस्वयंसेवक हैं, वह स्वयंसेवक के नाते बोलेंगे, जनसंघ के अध्यक्ष के नाते नहीं ।" और श्री गुरू जी की उपस्थिति मे पंडित जी का ही बौद्धिक हुआ। श्री गुरू जी तथा दीनदयाल जी के सम्बन्ध मे जो कुछ भी पढ़ा जाना, कभी कहीं कुछ अन्तर, दो विचार लगे हीे नहीं । पंडित जी द्वारा लिखी अर्थ क्षेेत्र की पुस्तक "भारतीय अर्थनीति विकास की एक दिशा" हो या फिर उनके विचारों पर लिखे गये "विचार दर्शन"। अर्थक्षेेत्र मे पंडित जी  श्री गुरू जी द्वारा 1973 के ठाणे शिविर मे बताये. बिन्दुओं को विस्तारित करते दिखे। मानव जाति के कल्याण के लिये इससे बेहतर कोई अन्य मार्ग है भी  नहीं । श्री गुरू जी द्वारा बताये अर्थक्षेेत्र के यह बिन्दु भौगोलिक, सामाजिक मर्यादाओं से परे जीवन का शाश्वत सत्य हैं। जो अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत तथा अन्य अर्थक्षेेत्र के संगठनों के लिये वेद वाक्य हैं -

1.  प्रत्येक नागरिक को जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं की आपूर्ति मिलनी चाहिये।

2. समाज की सेवा करने के उद्देश्य से ईश्वर का बनाया भौतिक धन, नैतिक तरीकों से         अर्जित करना चाहिये। उसमे से अपनी आवश्यकताओं को पूरा करने के लिये न्यूनतम लेना चाहिये ताकि आप स्वयं को समाज की सेवा करने की स्थिति मेे बनाकर रख सकें, अपने उपयोग के लिये उससे अधिक धन का उपयोग समाज के धन की चोरी माना जायेगा।

3. हम समाज के न्यासी मात्र हैं, हम समाज की सच्ची सेवा तभी कर पायेंगे, जब हम सही अथों मे समाज के न्यासी बन सकें।

4. व्यक्तिगत सम्पत्ति की सीमा निर्धारित की जानी चाहिये, अपने लाभ के लिये किसी को दूसरे के शोषण का अधिकार नहीं होना चाहिये।

5. जिस देश समाज मे लाखों लोग भूख से मर रहे हों, विलासिता तथा आडम्बरपूर्ण खर्च करना पाप है। सभी प्रकार के उपभोगों पर युक्ति संगत प्रतिबन्ध लगने चाहिये। उपभोगवाद तथा हिन्दू संस्कृति की आत्मा मे कोई सम्बन्ध नहीं ।

6. हमारा ध्येय अधिकतम उत्पादन, समान वितरण होना चाहिये। राष्ट्र को आत्मनिर्भर बनाना हमारा त्वरित ध्येय होना चाहिये।

7. बेरोजगारी और अर्धरोजगारी की समस्या से युद्धस्तर पर निपटना चाहिये।

8. औद्योगीकरण आवश्यक होने पर भी पश्चिमी देशों की तरफ देखकर इसका अन्धानुकरण नहीं किया जाना चाहिये। प्रकृति का शोषण नहीं दोहन हो। हमारी द्रष्टि से पर्यावरण, प्राकृतिक सन्तुलन तथा भावी पीढ़ियों की आवश्यकतायें कभी ओझल नहीं हहोनी चाहिये । शिक्षाा, पर्यावरण, अर्थशास्त्र तथा नीतिशास्त्र का सम्पूर्ण विचार होना चाहिये।

9. हमे प्रचंड पूजी वाले उद्योगों की अपेक्षाा श्रमोन्मुखी परियोजनाओं पर अधिक बल देना चाहिये।

10. हमारे तकनीकज्ञों को पारम्परिक उत्पादन तकनीक मे सुधार लाने वाले तन्त्रज्ञाान को विकसित करना चाहिये, इस बात का ध्यान रहे कि इन सुधारों से श्रमिकों की बेरोजगारी न बढ़े। उपलब्ध व्यवस्थापकीय या तकनीकी कौशल बरबाद न हो। वर्तमान उत्पादन साधन पूंजी के प्रभाव से पूर्ण मुक्त हों। इसके लिये उत्पादन के केन्द्र कारखाने न होकर, ऊर्जा की सहायता से गृहउद्योगों की मौलिक तकनीक का विकसित स्वरूप हो।

11. उत्पादकता तथा रोजगार वृद्धि का नियमित आकलन हो।

12. श्रम भी उद्योग की पूंजी है। श्रमिकों के श्रम का मूल्यांकन कम्पनी के अंश (share) के रूप मे किया जाना चाहिये। श्रम को पूंजी मानकर श्रमिकों को अंशधारक के रूप मे प्रोन्नत कर श्रमिकों का स्तर उठाना चाहिये ।

13. ग्राहक हित तथा देश का आर्थिक हित समतुल्य है। सभी औद्योगिक सम्बन्धों मे तीसरा पक्ष सर्वाधिक महत्वपूर्ण है। सामूहिक सौदेबाजी का वर्तमान पश्चिमी स्वरूप इसके अनुरूप नहीं है। इसे किसी अन्य सम्बोधन जैसे राष्ट्रीय वचनबद्धता से जोड़ा जाना चाहिये। मालिक तथा कर्मचारी दोनो. की वचनबद्धता राष्ट्र के प्रति हो।

14. श्रम का अतिरिक्त मूल्य राष्ट्र को समर्पित किया जाना चाहिये।

15. हम औद्योगिक स्वामित्व के सम्बन्ध मे किसी कठोर नीति के समर्थक नहीं हैं, सभी प्रकार के स्वरूपों जैसे निजी उद्योग, राज्य के उद्योग, स्वयं रोजगार, संयुक्त स्वामित्व, राज्य व निजी स्वामित्व तथा लोकतान्त्रिक ढ़ांचे वाले आदि आदि। प्रत्येक उद्योग के स्वामित्व का निर्धारण उसके चरित्र तथा राष्ट्रीय अर्थव्यवस्था मे योगदान के अनुरूप तय किया जाना चाहिये।
16. हम आर्थिक, सामाजिक नीति का कोई भी स्वरूप विकसित करने के लिये स्वतन्त्र हैं, अनिवार्य यह. है कि वह नीति धर्म के मूलचरित्र के अनुरूप हो।

17. सामाजिक ढ़ांचे मे परिवर्तन का तब तक कोई उपयोग नहीं, जब तक प्रत्येक नागरिक के विचारों को उपयुक्त दिशा न दी जाये। व्यवस्था का अच्छा या बुरा संचालन उसे संचालित करने वाले व्यक्तियों पर निर्भर करता है।

18. व्यक्तिगत तथा सामाजिक सम्बन्धों के बारे मे हमारा द्रष्टिकोण संघर्षात्मक नहीं, सहिष्णु हो। उसका भाव हो कि सभी प्राणियों मे एक ही तत्व विद्यमान है। सामूहिक, सामाजिक व्यक्तित्व का व्यक्ति जीवित प्रतिबिम्ब है।

19. किसी भी राष्ट्र के सामाजिक, आर्थिक क्रम के वास्तविक ढा़ंचे को गढ़ने के लिये उसका संस्कारित होना आवश्यक है।

पंडित जी मौलिक चिन्तक थे। उन्हे मालूम था कि कल्याणकारी अर्थव्यवस़्था का यही मार्ग है। इन तत्वों की सरल तथा विस्तृत व्याख्या अपने साहित्य तथा सम्बोधनों मे की है। कल तक यह तत्व विश्व के लिये जितने आवश्यक थे, आज विश्व को इनकी कहीं अधिक आवश्यकता है। वर्तमान मे हम जिस मार्ग पर चल रहे हैं, वह असमानता की दिशा मे ले जाता है और हम इस मार्ग पर काफी दूर निकल चुके हैं। आज वैश्विक अर्थक्षेेत्र असमानता की इस घुटन को झेलने के लिये बाध्य है। विकास का लक्ष्य्य लेकर गढ़ी गई अर्थ क्षेेत्र की तमाम परिभाषायें आज पथभ्रष्ट हो मुट्ठी भर लोगों के हित संरक्षण मे लगी हैं। संरक्षण का यह दायरा भी धीरे धीरे संकुचित होता जा रहा है। बड़ी बात यह कि इस घुटन से मुक्ति के प्रयास मे जो भी, जहां भी हाथ पैर मार रहा है। वह मुक्त होने के स्थान पर और अधिक जकड़ता जा रहा है। आज विश्व के सामने पं दीनदयाल जी द्वारा बताये मार्ग के अतिरिक्त कोई पर्याय नहीं।