Monday, 6 February 2017

मुलायम ने शिवपाल को ठिकाने लगाया

मुलायम को नेताजी बनाने और देश की राजनीति को शिखर तक पंहुचाने में शिवपाल की भूमिका कौन नहीं जानता। यह सही है कि मुलायम से उम्र में 16 साल छोटे शिवपाल ने अपना राजनीतिक सफर अपने बड़े भाई की अगुवाई में ही शुरू किया। शिवपाल को भी मुलायम से पिता जैसा प्रेम मिला और वह भी अपने बड़े भाई के साथ पार्टी मजबूत करने में जी जान से जुट गये। उन्हे अपने बड़ेभाई के आगे बढ़ने में अपनी उपेक्षा जैसी भावना छू भी नहीं गई थी। वह अपने बड़े भाई से इतने एकात्म थे कि स्वार्थ उनके पास आने से भी घबराता था। मुलायम ने भी उन्हें भरपूर प्यार और सम्मान दिया। परन्तु अपने अत्यधिक नजदीकी को भी अवसर आने पर स्वार्थ साधने के लिए पटखनी न दे वह राजनीति ही क्या?

शिवपाल को अपने पिता जैसे बड़े भाई पर जरा भी संदेह नहीं था कि वक्त आने पर वह अपनी विरासत उनको सौंपेंगे। उधर राजनीति में अखिलेश की सक्रियता, मुलायम को कुछ अलग सोचने को मजबूर कर रही थी। शिवपाल पर अपना प्रेम दिखाने का मौका मुलायम को 2012 के यूपी चुनाव के बाद मुख्यमंत्री की कुर्सी सौंपने का मिला। यह वह अवसर था जहां से शिवपाल और अखिलेश की सीमायें निर्धारित होनी थी। अखिलेश की चिंता थी यदि चाचा को कुर्सी मिली तो वह काफी समय खींच लेंगे, इस दौरान यदि मुलायम निकल लिए तो चाचा पुत्र मोह में बेटे आदित्य को उन पर तजरीह न दे दें। राजनीति की द्रष्टि से समाजवादी पार्टी में सत्ता के बंटवारे का यह अहम् पडाव था। यहीं मुलायम ने शिवपाल को पहला गच्चा दिया। मुलायम ने अखिलेश की मुख्यमंत्री पद पर ताजपोशी की तथा शिवपाल को यह समझाया कि पार्टी को नया व युवा चेहरा मिलने से हमें देश की राजनीति में विशेष भूमिका प्राप्त करने में मदद मिलेगी। अखिलेश अभी नया है, सिर्फ नाम के लिए कुर्सी पर बैठा है, संभी कुछ संभालना तो तुम्हें ही है।सरल हृदय शिवपाल भाई और भतीजे का यह चक्रव्यूह समझ न सके, उसमें फंस गए।

मुलायम और अखिलेश के सामने अब सबसे बड़ी चिंता शिवपाल के राजनीतिक प्रभाव को पार्टी में कम और समाप्त करने की थी। इसके लिए दोनों ने मिलकर जो जाल बुना उसमें मुलायम के जिम्मे शिवपाल को साधने और अखिलेश के जिम्मे बगावती तेवर दिखाने का काम था। अखिलेश दो वर्षों तक तो शिवपाल को मुख्यमंत्री की तरह व्यवहार करने की छूट दिये रहे, फिर धीरे धीरे शिवपाल का विरोध करने लगे। अखिलेश यह जानते थे कि विरोध किस सीमा में और कितना किया जाये, जिसके कारण शिवपाल भड़ककर रस्सी ही न तोड़ डालें । उधर मुलायम शिवपाल से चिपक लिए, यह दिखाने लगे कि वह भाई को बेटे से अधिक मानते हैं। इसी क्रम में वह भाई के साथ खड़े होकर सार्वजनिक मंचों से भी अखिलेश की आलोचना करने से नहीं चूके। 

सरल हृदय शिवपाल भाई की भक्ति में अन्धे होकर मुलायम के नाटक को सच मानते रहे। अखिलेश सत्ता के बंटवारे को चुनाव के पहले ही निर्णायक बनाना चाहते थे, ताकि सत्ता मिलने के बाद संघर्ष होने पर यदि पार्टी दो फाड़ होती है। तो कहीं पार्टी का बहुमत न चला जाये और शिवपाल भाजपा के साथ मिलकर मुख्यमंत्री की कुर्सी तक न पहुंच जाएं। अत: अखिलेश ने अंतिम​ चरण में पूरी बगावत कर दी। अब मुलायम को अपनी भूमिका निभानी थी। वह शिवपाल को साधे रहे, अखिलेश को गाली देते रहे। यहां तक कि शिवपाल के कहने पर अखिलेश को पार्टी से निकालने का नाटक भी कर दिया। झगड़े को चुनाव आयोग भी पंहुचा दिया, परन्तु चुनाव आयोग के सामने बेटे का विरोध न कर साइकिल चुनाव चिन्ह भी उसे दिलवा दिया।

मुलायम और अखिलेश ने मिलकर आपरेशन शिवपाल पूरा कर लिया। अब शिवपाल और उनके बेटे की समाजवादी पार्टी में औकात विधायक या सांसद का टिकट मांगने पर सिमट गई है। टिकट देना न देना अखिलेश पर निर्भर करता है। मुलायम और अखिलेश इतने चालाक हैं कि उन्होंने यह व्यवस्था भी जमा ली कि यदि चुनाव में शिवपाल मुलायम की असलियत सूंघ रस्सी तुड़ा कर भागें, तो भी अखिलेश को होने वाले नुकसान को पूरा किया जा सके। कांग्रेस से चुनाव पूर्व उदार समझौता इसी रणनीति के तहत है। राजनीतिक पंडित शायद इसे समझे नहीं या फिर अन्य कारणों से इसे अभिव्यक्ति नहीं दी। आज पार्टी पर अखिलेश का पूरी तरह कब्जा है, मुलायम नाटक पूरा कर अखिलेश और कांग्रेस के प्रचार को तैयार हैं। शिवपाल अपनी विधायकी बचाने और अपने बेटे का राजनीतिक भविष्य बचाने की कोशिश में लगे हैं।

Sunday, 5 February 2017

ट्रेन में यात्रियों से रोज 4 करोड़ 60 लाख लूट रहे पैन्ट्री वाले

एक अनुमान के अनुसार रेल में प्रतिदिन 2.3 करोड़ यात्री सफर करते हैं। इन यात्रियों को. अधिकृत वेटरों द्वारा खाना सप्लाई करने में अबाधित लूट का सिलसिला कई वर्षों से चल रहा है। इस लूट में वेटर, पैन्ट्री मैनेजर, कैटरिंग ठेकेदार व रेल अधिकारी सभी सम्मिलित हैं। लगातार लगातार​ सघन प्रवास के बाद भी हमारा ध्यान इस तरफ इसलिए नहीं जा सका क्योंकि हमारे भोजन का प्रबंध हमारे कार्यकर्ता करते हैं, जो बीच सफर में भी स्टेशन पर आकर हमें भोजन दे जाते हैं। ट्रेन यात्रियों की भोजन में होने वाली लूट की तरफ हमारा ध्यान हमारे एक मित्र ने खींचा, जिसने इस लूट के खिलाफ आवाज उठाई। हम उसकी आवाज को आगे बढ़ाने का प्रयास कर रहे हैं। आगे की कहानी मै अपने मित्र के ही शब्दों में बताता हूं।


अपने कार्य की प्रकृति के कारण मुझे अक्सर सफर करना पड़ता है। ट्रेन में मिलने वाले खाने को लेकर मैं अक्सर आशंकित रहता था कि कहीं कुछ गलत हो रहा है। पिछले सप्ताह मैं विशाखापट्टनम से हावड़ा का सफर यशवंतपुर हावड़ा एक्सप्रेस द्वारा कर रहा था। मैने वेटर से एक शाकाहारी खाना लाने के लिये कहा। कीमत पूछने पर वेटर ने मुझे ₹90 बताया। अब मैं खाने की सही कीमत जानने के प्रयास में लगा। मैं हैरान रह गया जब मैंने IRCTC Help: IRCTC Latest Food Menu Rates, नाम की वेबसाइट खोली। ट्रेन में वेटर यात्रियों को जो शाकाहारी खाना ₹90 व मांसाहारी भोजन ₹100 में बेच रहा था, वेबसाइट पर उसकी कीमत क्रमश: ₹50 व ₹55 ही लिखी हुई थी। इसके अतिरिक्त एक अन्य विकल्प स्टैन्डर्ड थाली मील के रूप में ₹35 शाकाहारी व ₹40 मांसाहारी के लिए भी मौजूद था। अपनी लूट को व्यापक बनाने के लिए पैन्ट्री वाले इस विकल्प को हमेशा नदारद ही रखते हैं।

जब वेटर पैसे लेने आया और उसने मुझसे ₹90 मांगे तो मैंने उससे रेट कार्ड दिखाने को कहा। वेटर ने रेट कार्ड जैसी किसी वस्तु के अपने पास होने से इनकार किया। जब मैंने उसे वेबसाइट पर लिखे रेट पढ़ाये तो वह मुझसे ₹50 लेने के लिए तैयार नहीं गया और प्रार्थना करने लगा कि मैं यह बात किसी. और से न कहूं। मैं इतने अधिक गुस्से में था कि 13 बोगियों वाली ट्रेन के सभी डिब्बों में, खाना लेने वाले सभी यात्रियों को यह बात बता आया। मैं पैन्ट्री कार में भी गया। वहां जब मैंने मैनेजर से रेटकार्ड मांगा तो पहले तो वह टालमटोल करने लगा, फिर बोला रेट कार्ड खो गया है, वह जल्दी ही दूसरा ले आयेगा। पैन्ट्री का मैनेजर भी वेटर की तरह ही, लगभग वही जवाब दे रहा था,. जैसे यह पहले से ही तय था कि इस तरह की स्थिति आने पर किस को क्या कहना और करना है। लगभग यही स्थिति सभी ट्रेनों की पैन्ट्री कारों व जिन ट्रेनों में पैन्ट्री नहीं होती, स्टेशनों से खाना सप्लाई किया जाता है, वहां की है।

पैन्ट्री का मैनेजर हर सम्भव कोशिश कर रहा था कि मैं कम्पलेन्ट बुक में शिकायत न लिखूं। अत: काफी हीला हवाली और आधा घंटा लगाने के बाद उसने कम्पलेन्ट बुक मुझे यह कहते हुये दी कि इसको कौन देखता है और उनके नीचे से ऊपर तक सम्बन्ध हैं। यही नहीं उसने मेरी शिकायत शिकायत​ पर यह टिप्पणी भी लिखी कि यह यात्री इरादतन जब भी सफर करता है शिकायत करता है तथा इससे अमुक अमुक बिल नम्बर के द्वारा ₹50 ही लिए गये हैं।

ट्रेन में रोजाना 2.3 करोड़ सफर करने वाले यात्रियों में यदि 5% यात्री भी खाना लेते हैं, तो यह संख्या 11,50,000 होती है। ₹40 प्रति यात्री अधिक वसूलने पर रोजाना 4 करोड़ 60 लाख रुपये यात्रियों से लूट लिए जाते हैं। यह स्थिति सभी ट्रेनों की पैन्ट्री कारों व जिन ट्रेनों में पैन्ट्री नहीं होती, स्टेशनों से खाना सप्लाई किया जाता है, वहां की है। रेलों की खानपान सेवा में यह अपराध संगठित रूप से चल रहा है। रेल मंत्रालय इस तरफ आंख बन्द कर बैठा है।

अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत रेल मंत्रालय से मांग करती है कि इस लूट को तुरंत रोका जाये। रेल स्टेशनों व ट्रेनों में जगह जगह खान-पान सेवा के रेट कार्ड बोर्ड लगाकर इसे प्रचारित किया जाये। रेल पैन्ट्रियों व स्टेशनों पर भोजन के दोनों विकल्प पर्याप्त मात्रा में यात्रियों को उपलब्ध कराये जायें। ग्राहक पंचायत को अनेकों यात्रियों से शिकायत मिलती है कि वेटर मांगने पर भी बिल नहीं देते। अत: पारदर्शी व्यवहार के लिए यात्रियों को बिल देना अनिवार्य किया जाये। यात्री भी रेलों में कोई भी खाद्य पदार्थ खरीदते समय रेट कार्ड दिखाने का आग्रह करें तथा बिल मांगें। अपनी शिकायत लिखने में किसी प्रकार की कोताही न करें।

Friday, 3 February 2017

बजट में दिखा सरकार का अलग चाल, चेहरा और चरित्र




2017-18 के लगभग 21.5 लाख करोड़ रुपए के बजट ने नेपथ्य में गये भाजपा के चाल, चेहरे व चरित्र के नारे को मुखरित कर दिया। बजट में मोदी​ सरकार का देश की आज़ादी के बाद अब तक आई तमाम सरकारों से अलग चाल, चेहरा और चरित्र स्पष्ट नजर आया। सत्ता में रहते सभी धन बटोरने के जुगाड़ में ही रहते थे। यह कठिन बात है कि इस स्थिति में कोई अपने परही अंकुश लगाने. का साहस दिखाये। समाज जीवन में पारदर्शिता लाने के लिए मोदी सरकार ने राजनीतिक दलों पर सिर्फ 2000 रु तक नकद लेने की सीमा ही नहीं लगाई, आय कर में छूट लेने के लिये इन पर तमाम अनुशासन पालन करने की शर्तें भी लगा दी।

बजट इस दृष्टि से से भी महत्वपूर्ण​ है कि इस समय दुनिया के तमाम समृद्ध देश अपनी आन्तरिक व्यवस्थायें, जिनमें आर्थिक व्यवस्था विशेष है, संवारने और सुधारने में लगे हैं। जैसे ब्रिटेन ने यूरोपीय यूनियन छोड़ दी, अमेरिकी ट्रम्प सरकार तमाम बदलाव करने में लगी है। धीरे धीरे विश्व में यह प्रचलन बढ़ेगा। इससे यह स्पष्ट संकेत मिल रहे हैं कि 90 के दशक से चला वैश्वीकरण का ताना बाना आगे चलकर कमजोर पड़ने की पूरी सम्भावना है। अत: हमें भी अपने आर्थिक आधार को मजबूत व स्वावलम्बी बनाने की जरुरत है।  

आज भी भारत का मुख्य आर्थिक आधार गांव व किसान ही है। जो जीडीपी में बहुमूल्य योगदान के साथ देश को आर्थिक मजबूती के साथ रोजगार देता है। बजट में गांव और किसान की चिंता की गई है। किसानों को कर्ज़ देने के लिए धन का आवंटन बढ़ाने, 60 दिन के कर्ज की माफी की व्यवस्था है। किसानों की सबसे बड़ी समस्या प्राकृतिक या किसी अन्य आपदा के चलते फसल नष्ट होना थी। इन स्थितियों में फसल बीमा किसानों के लिये बड़ी राहत है, यह योजना देश को मोदी सरकार की ही देन है। बजट में फसल बीमा के दायरे को बढ़ाया गया है। देश में आज भी आधे से अधिक खेती के लिये सिंचाई के लिए मौसम पर निर्भर है। मार्च 2017 तक 10 लाख तालाबों के पूरा होने होने​ के बाद और 5 लाख तालाब बनाने की योजना कृषि क्षेत्र की सिंचाई व ग्रामीण क्षेत्र की पानी की आवश्यकता को पूरा करेगी। मनरेगा में बढ़ाये धन से अधिक रोजगार तथा गांवों को सड़क से जोड़ना व बिजली उपलब्ध कराना, बहुसंख्य आबादी के जीवन स्तर को ऊपर उठाने के साथ ही, इन क्षेत्रों से शहरों की ओर होने वाले पलायन को रोकने में सहायक होगा।

बढ़ती आर्थिक असमानता विश्व के लिए चिंता का विषय है। अमीर पर अधिक व गरीब पर कम टैक्स लगाने वाली आदर्श टैक्स योजना अब तक किताबों में ही सिमटी थी। मोदी सरकार ने बजट में इसे किताबों से निकाल मूर्त रूप देकर आर्थिक असमानता पर प्रहार किया है। अब 3 लाख तक की आय करमुक्त होगी,. 5 लाख तक की आय पर 10% के स्थान पर 5% टैक्स  ही देना होगा। 50 लाख से 1 करोड़ तक की आय पर 10% सरचार्ज लगाने का प्रावधान किया गया है।

500-1000 रु के नोटों को बन्द कर मोदी सरकार तिजोरियों में बंद पैसे को पहले ही बैंको तक लाकर काले धन को टैक्स व जुर्माना लेकर सफेद बनाने की प्रक्रिया में लगी थी। भ्रष्टाचार व काले धन की उत्पत्ति को रोकने तथा अधिक से अधिक लोगों को टैक्स की परिधि में लाने के लिये बजट में अनेकों उपाय करने के साथ साथ, सरकार आवश्यकता के अनुसार नये नये कदम उठा रही है।

लघु एवं मध्यम श्रेणी के उद्योगों का देश की जीडीपी व रोजगार में बड़ा बड़ा योगदान है । इन्हे बड़े उद्योगों के साथ प्रतिस्पर्धा करने में कठिनाई थी। इन उद्योगों को सशक्त करने के लिये इन्हे टैक्स में 5% की छूट दी गई. है, ताकि वह विकसित हो सकें। छोटे मकानों के निर्माण को मूलभूत ढांचे की श्रेणी देना, इस क्षेत्र को विकसित करने के साथ ही बड़ी संख्या में रोजगार निर्माण में सहायक होगा।

देश में आर्थिक अपराधों को रोकने की समुचित व्यवस्था का अभाव था। कोई भी व्यक्ति वित्तीय लेनदेन के व्यापार को खोल, गरीब ग्राहकों की लाखों करोड़ों की पूंजी लेकर गायब हो जाता था। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत इस सम्बन्ध में अनेकों वर्षों से प्रभावी नियम कानून कानून​ बनाने की मांग कर रही थी। बजट में इसे रोकने की व्यवस्था के साथ ही जो लोग बैंको का पैसा लेकर. विदेश भाग जाते थे, उनकी सम्पत्ति जब्त करने संबंधी कानून बनाने की बात है।

2016-17 के बजट में राजस्व घाटा 2.3% प्रस्तावित था। इस घाटे को 2.1% पर समेट कर सरकार ने अपनी कथनी और करनी को एक सिद्ध कर दिया है। FRBM कमेटी ने बजट के वित्तीय घाटे को 3% सीमित करने की अनुशंसा की थी। वित्त मंत्री ने इस अनुशंसा के अनुरूप इसका लक्ष्य जीडीपी का 3.2% निर्धारित किया है।

सभी जानते हैं कि आर्थिक प्रगति करने में किसी भी देश को पर्याप्त समय लगता है। यह बात 70 वर्षों से बजट द्वारा स्वार्थ साधने वालों को न तो दिखाई देगा, न समझ आयेगा। इसीलिए वह अच्छे दिन की आहट सुन पाने में असमर्थ हैं। देश ने अब तक जैसा देखा है, अनेकों वर्षों तक लगातार रहने वाली सरकारें भी इस बजट में लिए गये निर्भीक व जोखिम भरे निर्णय लेने से कतराती हैं। चाहे यह निर्णय देश की प्रगति के लिए आवश्यक ही क्यों न हों, मोदी सरकार ने देशहित को तरजीह देते हुए सर्वहारा की भलाई के लिये भविष्य की दिशा निर्धारित करने वाला बजट प्रस्तुत कर अपनी सरकार के अलग चाल, चेहरे व चरित्र की प्रामाणिकता सिद्ध कर दी है।


Friday, 11 November 2016

आम आदमी को रूला दिया सरकार ने।

सरकार का 500-1000₹ के नोट बन्द करने का निर्णय कितना भी देश हित में हो, इसने आम आदमी को रूला दिया है। आम आदमी को रूलाने का पूरा श्रेय उन लोगों को जाता है, जिन पर इस योजना के क्रियान्वयन की जिम्मेदारी थी। आने वाले दिनों में आम आदमी की परेशानियां बढ़ने की पूरी सम्भावना है।

500-1000₹ के पुराने नोट बन्द करने के बाद सरकार ने पुराने नोटों को बदलने की व्यवस्था तो की, परन्तु नकद व्यवहार में 86% अधिकार जमा चुके 500-1000₹ के नोटों के चलन के समय ही 100-50₹ के नोट रोजमर्रा के नकद व्यवहार को सम्भाल नहीं पा रहे थे। ऐसे में 500-1000₹ के नोट बन्द कर पूरी नकद अर्थव्यवस्था का भार 50-100₹ के नोटों पर डाल दो चार दिन में हालत सामान्य करने की सलाह किस विद्वान के दिमाग की उपज है, बात समझ से परे है। 

इन स्थितियों में जहां होना यह चाहिये था कि 500 व 2000₹ के नये नोट एक साथ बाजार में उतारे जाते, सिर्फ 2000₹ का नोट बाजार में उतार कर सरकारने जन सामान्य से बहुत मंहगा मजाक किया है। आज ग्राहक 2000₹ का नया नोट हाथ में लेकर बाजार में अपनी 50-100 रूपये की जरूरतें पूरी करने के लिये धक्के खाने को बाध्य है। पहले. 1000₹ के नोट के ही 100₹ के फुटकर मिलने में परेशानी होती थी। अब 2000₹ के नोट के छुट्टे पाने के लिये ग्राहक हलाकान हो रहा है। सरकार के पास यदि 500₹ के नोट की तैयारी नहीं थी तो निर्णय लागू करने के लिये थोड़ा रूका जा सकता था।

शीघ्र से शीघ्र हालात सामान्य करने के लिये सरकार पर्याप्त संख्या में 500₹ के नये नोट जारी कर, उनका उचित अनुपात में बैंको द्वारा वितरण कराये। बैंको को 100₹ के नोट भी बड़ी संख्या में वितरण के लिये दे।

500 - 1000 के पुराने नोट बन्द, कैशलैस इकनामी की तरफ कदम

500-1000₹ के पुराने नोट बन्द होते ही, एक बात जोर शोर से प्रचारित हुई। सरकार बड़े नोटों का अर्थव्यवस्था में प्रचलन बन्द कर छोटे नोटों को ही अब रखेगी। धीरे धीरे स्पष्ट हुआ कि सरकार पुराने 500-1000₹ के नोट तो रद्द कर रही है, पर साथ में 500-2000₹ के नोट अभी तथा 1000₹ का नोट बाद में ला रही है। इसके कारण अपने रोजमर्रा के खर्चों से जूझते लोगों के बीच भ्रम फैला, जब 500-1000₹ के नोट बन्द ही नहीं हो रहे हैं, फिर यह उपक्रम क्यों ? इससे नोट बन्दी के कारण कोमा में गये विपक्षी नेताओं को आक्सीजन मिली। उन्होने लोगों के भ्रम का फायदा उठाते हुये, जनता की परेशानियों का हवाला देते हुये, जनता के कन्धे पर बन्दूक रख मोदी पर गोले दागने शुरू कर दिये। भ्रम में होने के बावजूद जनता को समझ नहीं आ रहा था, पर अहसास हो रहा था कि उसके लिये कुछ अच्छा हुआ है। नेताओं के एक स्वर में विलाप से वह समझ गया कि गहरी चोट कहां लगी है। उसने कहना शुरू कर दिया कि तकलीफ हम झेल लेंगे, कदम अच्छा है।

अर्थव्यवस्था में सिर्फ छोटे नोट रखने की बात करने वाले, पहले यह समझ लें 13,069 बिलियन रूपयों वाली अर्थव्यवस्था का आकार बहुत बड़ा है, इसमें 86% मूल्य के 500-1000₹ के नोटों का चलन इस  बात का स्पष्ट संकेत है कि बड़े नोटों के बिना यह नहीं चलने वाली। उस पर भी इसमें प्रतिवर्ष 17% के नकली नोट बढ़ते जा रहे हैं। इसमें से बैंको के पास सिर्फ 620 बिलियन रूपयों की ही मुद्रा है। बाकी बची 12449 बिलियन रूपयों की मुद्रा कुछ चलन में है, बाकी लोगों की तिजोरी, गद्दों में दबी पड़ी है। जिसे बाहर निकालने का एक ही रास्ता था, उसका अन्तिम संस्कार कर दिया जाये, जो मोदी ने कर दिया। इतनी बड़ी नकद अर्थव्यवस्था का सुचारू संचालन बड़े नोटों के बिना सम्भव ही नहीं है। इसी कारण 500, 2000 और आगे 1000₹ का नोट सरकार को लाना पड़ रहा है। अब पुराने 500-1000₹ के नोट बन्द करने से इस विशालकाय नकद अर्थव्यवस्था के आकार में बड़ी कटौती करना सरकार के लिये सम्भव होगा। क्योंकि पुराने 500-1000₹ के नोटों को बैंकों के फिल्टर से निकालने की प्रक्रिया में इन नोटों का बहुत बड़ा हिस्सा बाहर होने वाला है। राजनेताओं की चिल्ल पों का यही मुख्य कारण है। एक अनुमान के अनुसार यदि सरकार नकद मुद्रा के संचार पर सही नियन्त्रण रखने में सक्षम रहती है तो देश की 13069 बिलियन रूपयों की नकद अर्थव्यवस्था, 9-10 हजार बिलियन रूपयों तक सिकुड़ सकती है। यदि देश में 500-1000 रुपये के नोटों के प्रचलन को समाप्त करना है तो इस नकद  के आकार को 4-5 हजार बिलियन रूपयों तक सीमित करना पड़ेगा। जिन देशों में 100-50 के नोट ही सबसे बड़े नोट के रूप में प्रचलित हैं। वहां की स्थितियां इसी प्रकार की हैं। इंग्लैण्ड की नकद अर्थव्यवस्था 60 बिलियन पौण्ड की है, जबकि अमेरिका की मात्र 1200 बिलियन डालर की ।

भारत में नकद नोटों के प्रचलन में कटौती करने का एक ही रास्ता है। कैश लैस इकनामी की तरफ बढ़ना, जिससे इतनी बड़ी नकद मुद्रा के रख रखाव खर्च में बड़ी कटौती के साथ ही भ्रष्टाचार और काले धन पर लगाम कसने में भी बहुत बड़ी मदद मिलेगी। इसी कैश लैस इकनामी का जिक्र मोदी दो माह पूर्व अपनी "मन की बात" में कर रहे थे, जिसमें आर्थिक लेन देन के व्यवहार में नकद मुद्रा की आवश्यकता ही न पड़े। यह काम क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चेक, ई ट्रान्सफर आदि विभिन्न तकनीकों द्वारा सम्भव है, उसे अपनाने की आवश्यकता है। हम अभी इससे बहुत दूर हैं, हमारा 90% लेन देन नकद मुद्रा से ही होता है। यही मुख्य वजह है कि सिर्फ 2 नोट वह भी 500-1000₹ के बन्द करने पर दो दिन में ही बड़ी संख्या में लोग अपनी रोजमर्रा की जरूरतों को पूरा करने के लिये जूझते दिखाई पड़ने लगे । वरना हफ्ते दस दिनों तक इसका प्रभाव पता ही नहीं चलता।

पूरी दुनिया कैशलैस अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ रही है। कुछ बहुत आगे निकल चुके हैं तो कुछ बहुत पीछे हैं, पर सभी प्रयास कर रहे हैं कि कैशलैस अर्थव्यवस्था को अधिकतम स्तर तक अपनाया जा सके।वर्तमान में विश्व के पांच देशों की अर्थव्यवस्था को कैशलैस अर्थव्यवस्था कहा जा सकता है। स्वीडन जहां नकद लेन देन का चलन मात्र 2%है, कनाडा जहां यह 10% तथा दक्षिण कोरिया में 20% है। अफ्रीका के सोमालीलैन्ड व केन्या की गिनती भी विश्व के कैशलैस अर्थव्यवस्था वाले देशों में है। आस्ट्रेलिया, सिंगापुर, हांगकांग, इंग्लैण्ड, अमेरिका तथा नाइजीरिया भी इस दिशा में प्रयत्नशील हैं।

500-1000₹ के पुराने नोट बन्द किये जाने के बाद हम भी इस दिशा में तेजी से बढ़ सकते हैं। परन्तु इसके लिये सरकार के उचित नियन्त्रण व प्रयास की जरूरत है। देश में कोई नई तकनीक आई नहीं कि व्यवसायिक संस्थान ग्राहकों को लूटना शुरू कर देते हैं। ग्राहकों को लूटने की दौड़ में सहकारी और सरकारी संस्थान भी बराबर के सहभागी रहते हैं। सभी जानते हैं कैशलैस अर्थव्यवहारों में व्यवसायिक संस्थानों के कैश के रख रखाव खर्च में बड़ी कमी आती है। अत: कैशलैस व्यवहार के माध्यमों का उपयोग करने वाले ग्राहकों को अतिरिक्त लाभ देकर प्रोत्साहित करना चाहिये, न कि रेल, पैट्रोल पम्प, ज्वैलरों व अन्य व्यवसायियों की तरह अतिरिक्त पैसा वसूल कर उसे हतोत्साहित करे।

Wednesday, 9 November 2016

500 व 1000₹ के नोट बन्द, काले धन व आतंकवाद पर जबरदस्त प्रहार

2 माह पूर्व जब प्रधानमन्त्री मोदी "मन की बात" में कैश लैस इकनामी का जिक्र कर रहे थे, डेबिट/क्रेडिट कार्ड प्रयोग को बढ़ावा देने के लिये, उन्हे कुछ छूट देने के विचार की बात कर रहे थे। दूर दूर तक भी कोई यह नहीं सोच रहा था कि मोदी मन ही मन में देश में काले धन की उत्पत्ति के श्रोत प्रचलित नकद मुद्रा के विशालकाय कोष को फिल्टर करने की ठान चुके हैं, योजना बना चुके हैं। वैसे भी पिछले 60 वर्षों में हम सरकारी योजनाओं को शोर मचाने वाले भोंपू मान, उन पर ध्यान न देने के अभ्यस्त हो चुके हैं। इसीलिये हम किसी भी सरकारी योजना की घोषणा को गम्भीरता से नहीं लेते और यदि हम कुछ गम्भीरता दिखाना भी चाहें, देश के विपक्षी दल उन योजनाओं की इतनी चीरफाड़ कर डालते हैं कि मामले टांय टांय फिस्स् वाले ही नजर आते हैं। देश के विपक्षी अब भी चेत जायें, कुछ रचनात्मक सोचना शुरू करें। वरना उनके कालबाह्य होने में अधिक समय नहीं है।

8 तारीख को शाम 8 बजे राष्ट्र के नाम सन्देश द्वारा मध्य रात्रि से 500 व 1000₹ के नोट रद्द करने का निर्णय प्रधानमन्त्री ने यक ब यक नहीं लिया। इससे पीछे विभिन्न योजनाओं की पूरी श्रंखला है, तैयारी है, जिसे देश की विपक्षी राजनीति ने कभी समझने का प्रयास ही नहीं किया। इस विषय में मोदी सरकार गम्भीर है, सावधानी व दृढ़ निश्चय के साथ एक एक कदम लक्ष्य की तरफ बढ़ाती जा रही है। याद कीजिये 2015 में जब "जनधन योजना" में शून्य बैलेन्स से बैंकों में बचत खाते खुलवाये जा रहे थे। 10 करोड़ लोगों को बैंक से जोड़ने के इतने बड़े काम को अनदेखा कर दिया। आज कोई यह नहीं कह सकता कि उसका बैंक में खाता नहीं है, जिसमें वह अपने 500-1000 के पुराने नोट कोे बदलने के लिये. जमा करे। 1₹ प्रतिमाह अपने बैंक खाते से कटा कर, 12₹ प्रतिवर्ष दे 2 लाख के प्रधानमन्त्री सुरक्षा बीमा को भी हम भूल चुके हैं, यहां तक कि 291₹ प्रतिमाह उसी बैंक खा में कटवा कर 1000 व 5000₹ प्रतिमाह की अटल पेन्सन योजना भी हमें याद नहीं। विपक्षियों ने इन सभी कल्याणकारी योजनाओं को प्रयत्न कर कर भुलवाया, जबकि यह सभी योजनायें कालाधन व भ्रष्टाचार मुक्त अर्थव्यवस्था की स्थापना की प्रारम्भिक तैयारियां थी।

मोदी सरकार का सुधार कार्यक्रम यहीं नहीं रूका, विदेशी बैंकों में कालाधन जमा कराने वालों के लिये. सख्त नियम, अघोषित आय की घोषणा करने वाली योजना, बेनामी सम्पत्ति सम्बन्धित कानून और अब  500 व 1000₹ के नोट रद्द, सभी कुछ सुव्यवस्थित क्रमबद्ध तरीके से चल रहा है। यह निर्णय सतही तौर पर नहीं लिये जा रहे हैं। मोदी सरकार की देश में मुद्रा के चलन पर पैनी नजर है, नकद राशि का यह चलन ही भ्रष्टाचार और काले धन का जनक है। मोदी सरकार अब तक इस सम्बन्ध में विशेषज्ञों की अनेको समितियां बना चुका है। उनके द्वारा दी गई रिपोर्टों का गम्भीर अध्ययन कर चुका है। अभी पिछले सप्ताह ही अवकाश प्राप्त न्यायधीशों की एक समिति की रिपोर्ट आई है। जिसमें नकद खरीद की अधिकतम सीमा 3 लाख रुपये करने तथा नकद राशि रखने की अधिकतम सीमा 15 लाख ₹ निर्धारित करने की संतुस्ति है। अतः 500 व 1000₹ के नोट बन्द होने के बाद मोदी सरकार कुछ और निर्णय भी ले तो आश्चर्य नहीं, तय है भ्रष्टाचार व कालेधन मुक्त अर्थव्यवस्था की दिशा में बढ़ते जाना। 

देश में प्रचलित कुल मुद्रा का 86% 500 व 1000₹ के नोटों की शक्ल में है। कुल प्रचलित मुद्रा के 86% भाग को फिल्टर करना बहुत बड़ा काम है, जो सरकार की बड़ी पूर्व तैयारी के बिना सम्भव न हो पाता। विचार करें पुराने नोटों के बदले नये नोट बैंक से ही मिलेंगे अर्थात देश में प्रचलित सभी नोट मुद्रा का 86% बैंक में जमा होंगे, आप पुराने नोट बैंक में तय समय सीमा में जमा कराइये, वहां से नये नोट प्राप्त करिये। 2016 मार्च तक यह स्पष्ट हो जायेगा कि देश में प्रभावी मुद्रा कितनी है। कई लोग इस बात को लेकर भ्रमित हैं कि जब 500व 1000₹ के नोट रद्द ही करने थे, तो दोबारा 500 व 2000₹ के नये नोट जारी करने की क्या आवश्यकता थी। सीधी सी बात है, देश में सभी नोटों व सिक्कों को मिलाकर कुल 13069₹. की मुद्रा प्रचलन में है, जिसमें से 620 बिलियन मात्र ही बैंकों के पास है। मुद्रा के इतने बड़े बोझ को छोटे नोट नहीं उठा सकते, विशेषकर तब तक जब तक कि अधिकतर लेन देन कैश लैस न हों (क्रेडिट/डेबिट कार्ड, चेक, ई ट्रान्सफर आदि) सरकार इसी तैयारी में है। सरकार का यह कदम बहुत बड़ा व निर्णायक है, आलोचक यह तैयारी भी रखें कि सरकार अन्य कदम भी उठा सकती है।

कैशलैस अर्थव्यवस्था की तरफ बढ़ते इस कदम का देश पर पड़ने वाला प्रभाव अभी देखना है। वैसे वर्तमान में विश्व की अनेको सरकारें विभिन्न कारणों से इस दिशा में बढ़ रही हैं। यहां तक कि छोटे छोटे देश जैस़े सोमालीलैन्ड, केन्या, दक्षिणी कोरिया, नाइजीरिया आदि भी इसमें अत्यधिक रूचि ले रहे हैं, स्वीडन, आस्ट्रेलिया व इंग्लैण्ड आदि भी प्रयास में हैं, Cashless Economy पर हम अगले. Blog में विस्तार से चर्चा करेंगे।

Monday, 24 October 2016

GST पर चर्चा में वही नदारद जिसे टैक्स देना है


देश में वस्तु एवं सेवा कर ( GST ) पर जबरदस्त चर्चा छिड़ी हुई है। कहा जा रहा है कि सभी प्रभावित पक्ष इस गहन मन्थन में लगे हुये हैं, सिर्फ उसको छोड़कर जिसे अपनी जेब से इस कर को चुकाना है। वह पक्ष जिससे यह टैक्स वसूला जायेगा। उसे चर्चा में सम्मिलित करना कोई महत्वपूर्ण भी नहीं समझता, यह भी जरूरत नहीं समझी जाती कि उससे पूछ तो लिया जाये कि भाई तुम कितना भार वहन कर पाने में सक्षम हो। जो भी पक्ष इ्स चर्चा में सम्मिलित हैं या इसे अन्तिम रूप देने की कोशिश कर रहे है परजीवी (Parasites) हैं। उनमे से कोई भी 1 नये पैसे के बराबर भी कर का भार वहन करने वाला नहीं है, न सरकारें, न उद्योगपति और न ही व्यापारी। हमारी सरकारों के न जाने कब अक्ल आयेगी या वह कब समझेंगे कि जिनके सहारे उनकी वित्तीय व्यवस्थायें चल रही हैं, जो इस मामले में सबसे महत्वपूर्ण पक्ष हैं। उनकी भी राय ले ली जाये, उनसे भी पूछ लिया जाये। हम यहां ग्राहकों के प्रतिनिधि बनने की दुकान चला रहे, उन इक्के दुक्के स्वनामधन्य लोगों की बात नहीं कर रहे, जन संगठनों की बात कर रहे हैं। अखिल भारतीय ग्राहक पंचायत सरकार के इस रूख की घोर निन्दा करती है।

विद्वानों द्वारा कर निर्धारण करने की नीतियों से सम्बन्धित विचार आज ठीक उसी तरह अर्थशास्त्र की पुस्तकों मे दफन हो चुके हैं, जिस प्रकार अर्थशास्त्र के विद्यार्थियों को पढ़ाये जाने वाले, वस्तु का विक्रय मूल्य निर्धारित करने में उसके उत्पादन मूूल्य की भूमिका से सम्बन्धित विचार। समाज की आर्थिक विषमता दूर या कम करने की भूमिका से अब कर निर्धारणकर्ता बहुत दूर जा चुके हैं। कर सरलीकरण या कर सुधार के नाम पर आसान तरीकों से अधिक से अधिक धन उगाही ही उनका एकमेव उद्देश्य बन चुकी है। इस सम्बन्ध में विभिन्न स्तरों पर किये जाने वाले दुष्प्रचार का आलम यह है कि जो व्यक्ति सरकार को एक पैसा टैक्स नहीं देता, उसे कर द्वारा पैसा देकर सरकार चलाने वाला माना जा रहा है। जिसके पैसे से सरकार चल रही है, उसे अधिक निचोड़ा जा रहा है। मजे की बात यह कि अपने पैसे से सरकार चलाने वाले भी नहीं जानते कि सरकार उनके पैसे से चल रही हैं, वह भी यही समझते हैं कि सरकार उनके नहीं किसी दूसरे (धनाड्यों) के पैसे से चल रही है। यह हकीकत है कि सरकार देश की 85% गरीबी रेखा के नीचे, ऊपर रहने वालों, निम्न मध्यम वर्ग तथा मध्यम वर्गीय लोगों के पैसे से चल रही है। यह मै नहीं कह रहा आंकडे कह रहे हैं। आप किसी भी वर्ष के कर एकत्र करने से सम्बन्धित आंकडे देख लीजिये। स्मरण रहे कि व्यक्तिगत आय कर के अतिरिक्त वसूल किये जाने वाले सभी कर अन्तत: ग्राहक को ही अपनी जेब से चुकाने पड़ते हैं।

सरकारों का प्रयास हमेशा कर की आय बढ़ाने का रहता है। कभी किसी तो कभी किसी बहाने से, परन्तु चिन्ता की बात यह है कि कर का सबसे अधिक बोझ ग्राहकों के उसी वर्ग पर डाला जाता है, जिसे इस बोझ से सबसे अधिक संरक्षण देने की जरूरत होती है। ग्राहक, कर के सम्बन्ध में एक महत्वपूर्ण बात जान लें कि जिन वस्तुओं का ऊला ढाल अधिक होता है। उन पर लगने वाले कम कर के कम प्रतिशत से भी राजस्व का बहुत बड़ा हिस्सा आता हैं। परन्तु यह गरीब वर्ग पर ही सर्वाधिक बोझ डालता है। सरकार कर ढ़ांचे में जब भी कोई बदलाव लाती है, उसका मूल लक्ष्य कर से आने वाले राजस्व को बढ़ाना होता है। यद्यपि यह बदलाव गरीब ग्राहकों को राहत देने के नाम पर लाये जाते हैं, परन्तु हर बार उन पर ही अतिरिक्त बोझ लाद दिया जाता है। इसी अनुभव के कारण जब पूरा देश GST पर कशीदे पढ़ने में व्यस्त था। ग्राहक पंचायत स्थिति का अवलोकन कर रही थी, उसे मालूम था जो कुछ भी कहा जा रहा है, वास्तविक स्थिति उससे बहुत अधिक भिन्न होगी। अब इसी बात को ले लीजिये, समान 18% कर की बात चल रही थी, पहली बैठक जो पूरी सफल भीा नहीं रही, उसमे कर के चार स्तरों 6%, 12%, 18% तथा 26% की बात की जाने लगी। सरकार के मुख्य दावे कि पूरे देश में किसी भी वस्तु के कर की एक दर होने के कारण, एक जैसी कीमत होगी, भी खटाई मे जाती नजर आ रही है। क्योंकि GST लागू होने पर बाकी सभी कर समाप्त  करने की बात कहने वालों के सुर अभी से बदलने लगे हैं। अभी भी सही वक्त नहीं आया है GST पर टिप्पणी करने का, स्थिति थोड़ी स्पष्ट होने दीजिये। फिर भी हम आपको विश्वास दिलाते हैं कि GST लागू होने पर उसके वह प्रभाव आपको दूर दूर तक ढूंढने पर भी नहीं मिलेंगे, जिनके ढोल इसे प्रचारित करने के लिये पीटे गये जैसे GST लागू होने पर ग्राहकों को वस्तुयें सस्ती मिलने लगेंगी। समर्थन लेने के लिये जिन्हे लालच दिया गया, उन्हे तो चर्चा में दूर दूर तक भी जगह नहीं दी जा रही है। सरकार बिना विलम्ब ग्राहक क्षेत्र में कार्य करने वाले जन संगठनों को भी चर्चा के लिये आमन्त्रित करे।

वर्तमान सरकार दीनदयाल उपाध्याय के आदर्शों को लेकर चल रही है। दीनदयाल जी का यह शताब्दी वर्ष चल रहा है। अत: सरकार को पंक्ति के अन्तिम सिरे पर बैठे व्यक्ति का विचार करना चाहिये। यह विचार अनुदान के माध्यम से करना बेमानी है। यह सही स्वरूप में कर सुधार के माध्यम से ही लागू हो सकता है। अत: सरकारों को टैक्स सुधार के उन अध्यायों को फिर से खोलने की आवश्यकता है। जिनमें अमीरों पर अधिक कर तथा गरीबों पर कम कर लगाने की बात कही गई है। आज विश्व के अनेको अर्थशशास्त्री इस बात पर पुनः जोर देने लगे हैं। विश्व की बढ़ती आर्थिक असमानता की स्थिति. में सरकारों द्वारा यह मार्ग अपनाने की आवश्यकता है। यह मार्ग अप्रत्यक्ष कर (Indirect Tax) की गली से होकर निश्चित रूप से नहीं गुजरता।