Tuesday, 3 May 2016

अर्थरचना मे कब साकार होंगे दीनदयाल उपाध्याय के विचार


पंडित दीनदयाल उपाध्याय जी ने जनसंघ के पूनाशिविर मे भारतीय अर्थव्यवस्था के सम्बन्ध मे अपने विचार व्यक्त करते हुये कहा था - "समृद्धि के फलों को चखने की स्वतन्त्रता देने वाली शोषण मुक्त विपुलता की अर्थव्यवस्था प्राप्ति हमारा राष्ट्रीय लक्ष्य होना चाहिये।" इसी को ध्यान मे रखकर पंडित जी अंत्योदय की बात कहा करते थे। परन्तु कालान्तर मे हमारी अर्थव्यवस्था के पाश्चात्य अनुकरण ने धीरे धीरे वह सभी बुराइयां आत्मसात कर ली जिनसे उन्हे दूर रखना था। भारतीय चिनंतन के पक्षधर दीनदयाल जी जीवन को समग्र दृष्टि से देखते थे। उसमे पारिवारिक, सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक, तत्वों केसाथ ही अपने इर्द गिर्द मौजूद प्राकृतिक अवयवों के साथ साथ परलौकिक द्रष्टि भी समाविष्ट थी। इन सभी तत्वों के संयुक्त स्वरूप द्वारा समायोजित जीवन रचना को ही वह मानव समाज के लिये कल्याणकारी व्यवस़्था मानते थे। उस समय की प्रचलित अर्थनीतियों से उनका मतभेद था। वह कहा भी करते थे -  "जिस अर्थशास्त्र को मानव के समग्र जीवन और उसके आर्थिक घटकोंं की तरह आर्थिकेतर घटकों का भान ही न हो, वह मानव जीवन को शास्वत कल्याण की दिशा नहीं दे सकता।"  परन्तु उस कालखंड मे पश्चिमी देशों मे पली बढी, भारतीय जीवन के पक्षों से अनभिज्ञ, पाश्चात्य दर्शन को ही प्रगति का एकमेव शास्वत पंथ मानने वाली मंडली ही सत्ता पर काबिज थी, जो भारतीय दर्शन को पुरोगामी मानती थी, लिहाजा अन्य देशों के साथ साथ हम भी उसी मार्ग पर बढ चले और शनः शनः भारतीय जीवन दर्शन से दूर होते चले गये।

दीनदयाल जी का आर्थिक चिन्तन मौलिक व भारतीय जीवन दर्शन के अनुरूप था। इसमे परम पूज्यनीय गुरू जी द्वारा १९७२ के ठाणे शिविर मे आर्थिक विषयों के सम्बन्ध मे किये मार्गदर्शन की छाया प्रतिबिम्बित होती है।एक पंरकार से दीनदयाल जी परम पूज्यनीय गुरू जी के विचारों को धरातल पर उतारने के प्रयास मे लगे थे। पंडित जी की अंत्योदय गुरू जी द्वारा कहे गये शब्दों - प्रत्येक नागरिक की मूलभूत आवश्यकतायें पूरी होनी चाहिये। का विकसित स्वरूप है। इससे गुरू जी व दीनदयाल जी की वैचारिक साम्यता भी दिखाई देती है। पंडित जी उन परिस्थितियों को अच्छी तरह जानते समझते थे, जिनके चलते स्वतन्त्रता के बाद के काल खंड मे भारतीय अर्थव्यवस्था का मौलिक स्वरूप विकसित करने केे प्रयास मे लगे दादाभाई नारोजी, आर सी दत्त व लोकमान्य तिलक के विचारों को हाशिये पर छोड़ दिया गया था।

यह कहना भी सही नहीं होगा कि अर्थ चिन्तन की इस दिशा को भारतीय भूमि पर ही मान्यता प्राप्त थी।सर्वकल्यीणकारी अर्थरचना विकसित करने मे आर्थिक घटकोंं के साथ साथ अनार्थिक घटकों की महत्वपूर्ण भूमिका को पश्चिमी अर्थशशास्त्री भी पहचानने लगे थे। दीनदयाल जी के आर्थिक चिन्तन का समर्थन विश्व के अनेको अर्थशास्त्रियों ने किया। वर्तमान मे अमीर गरीब के तेजी से बढते अन्तर को देखता विश्व दीनदयाल जी के विचारों की सार्थकता को तेजी से पहचान रहा है। जीवन स्तर विकसित करने के नाम पर अनैतिक शोषण का व्यापार चारो तरफ हावी हो चला है। प्रसिद्ध चिन्तक अल्विन टाफ्लर अपनी पुस्तक फ्यूचर शॉक मे लिखते हैं -"आधुनिक अर्थरचना दोषपूर्ण है, क्योंकि यह अत्यधिक अर्थकेन्द्रित है। इसमे पुरी शक्ति धन, उपयोगिता तथा मूल्य पर ही लगायी गई है।" इस एकांगी मार्ग का अनुसरण करने से आर्थिक के साथ साथ सामाजिक जीवन मे भी अनेको समस्यायें खडी हो गई हैं। धीरे धीरे इस तथ्य को विश्व के अनेको विद्वानों  का समर्थन मिला है। प्रा गुन्नार मिर्डल का कहना है - अर्थशास्त्रियों द्वारा निरूपित उत्पादन के घटकोंं के गुणधर्मों के साथ आर्थिकेतर घटकों का भी पर्याप्त सम्बन्ध रहता है। इसलिये आर्थिक घटकोंं के साथ साथ आर्थिकेतर घटकों का भी विचार करने वाले अर्थशास्त्र को हमें विकसित करना होगा।

अर्थरचना के सम्बन्ध मे यथार्थ यह है कि अपने जन्म के समय से ही अर्थरचना एक प्रभावशाली समूह के प्रभाव मे चली गई । धीरे धीरे उस वर्ग ने उसे अपने हितों के अनुरूप मोड़ना शुरू कर दिया। वर्तमान मे यह सिर्फ उसी वर्ग के हित साधने मे लगी है। इस वर्ग का प्रभाव इतना है कि वह सम्पूर्ण उत्पादन तन्त्र को ठप्प कर समस्त आर्थिक जीवन को पंगु बनाने मे सक्षम है। ऐसा भी नहीं कि इस प्रभावशाली वर्ग ने कभी उत्पादन तन्त्र पर आक्रमण कर व्यवस़्था को अपने हित मे मोडने का प्रयास न किया हो, अधिक लाभ कमाने के अपने लक्ष्य की पूर्ति के लिये यह बाजार मे अपने प्रभाव का मांग व पूर्ति को अमानवीय तरीकों से प्रभावित करने का प्रयास करते हैं। दीनदयाल जी ने "विकास की दिशा" नामक पुस्तक मे लिखा है कि अमेरिका मे दूध का उत्पादन अधिक हो जाने के कारण दूध के दामों को गिरने से रोकने  के लिये, यह १० लाख स्वस्थ व दुधारू गायों को मारने का निर्णय ले लेते हैं। लाखों टन गेहूं समुद्र मे सिर्फ इस कारण से फिकवा देते हैं ताकि अनाज के दामों मे कमी न आने पाये। अर्थरचना पर वर्ग विशेष केे प्रभाव के कारण ही विश्व के अनेको महान चिन्तकों के विचारों के बावजूद इस विषय पर कुछ भी नहीं किया जा सका।

यह अर्थरचना अपने आसपास के बाजार, मूल्य तथा क्षेत्र सभी प्रभावित करती है। बाजार का आकार बढाने के लिये शहर, राज्य और देश की सीमा तोड़ अर्न्तराष्ट्रीय बाजारों पर अधिपत्य, मूल्य के विषय मे बाजार मूल्य की सभी स्थापित मान्यताओं को नष्ट कर स्वेच्छाचारी प्रवृति अपनाने का षढयन्त्र तथा उसके बाद पूंजी निर्माण के सभी सम्भावित क्षेत्रों पर अधिकार तथा नवीन क्षेत्रों की रचना सम्मिलित है। वर्तमान मे यह षढयन्त्र लोकहित व जनकल्याण का मुलम्मा चढाकर आता है ताकि लोग समझ न सकें और जब तक समझ मे आये बात हाथ से निकल चुकी हो। 

अमेरिकी अर्थशशास्त्री स्टैसी मिशैल इस सम्बन्ध मे अपनी पुस्तक "बिग बाक्स स्विन्डल" मे लिखती हैं - The economic structure that present economy is propogating represent a modern variation on the old European Colonial System, which was designed not to build economically viable and self reliant communities but to extract their wealth and resources. "

Monday, 2 May 2016

विश्व की आर्थिक समीकरणें बदल रही हैं, हल्के मे मत लेना!


ग्राहक आन्दोलन का अर्थ अपने आसपास कानून के अनुपालन वाली संरचना खड़ी करना तथा जहां यह नहीं है वहां पर इसकी व्यवस़्था करने तक मर्यादित नहीं है। विशेष रूप से ग्राहक पंचायत जैसे  संगठनों से, उनके लिये आवश्यक है कि विश्व की आर्थिक हलचलों तथा उसके ग्राहकों पर पड़ने वाले आर्थिक प्रभावों के साथ राजनीतिक, सामाजिक, पारिवारिक, पर्यावरणीय प्रभावों का अध्यन विश्लेषण कर उनसे ग्राहकों को अवगत करायें, मेरा यही प्रयास रहता है।

जनवरी 2016 मे मैक्सिको के दावोस मे विश्व आर्थिक समुदाय| (World Economic Forum) की बैठक हुई। इस बैठक मे जिन मुद्दों पर चर्चा हुई, उनमे चौथी औद्योगिक क्रान्ति विश्व के आर्थिक मानचित्र को तहस नहस करने वाली है। विश्व आज बहुत बड़े आर्थिक परिवर्तन के मुहाने पर खड़ा है। नवीन प्रतिमान स्थापन (Paradigm Shift) को अनदेखा करना मूर्खता होगी विशेष रूप से तब, जब उसके चिन्ह आकार लेते दिखाई दे रहे हों। वर्ष 1900 का विश्व आज नहीं है, आज जो है आने वाले वर्षो  का विश्व उससे बहुत भिन्न होगा। अतः मिलने वाले संकेतों के आधार पर किसी भी द्रष्टि से उसका विचार उपयोगी ही होगा। यहां हम कुछ क्षेत्रों की समीक्षा करते हैं।


बीसवीं शताब्दी के अन्त से कुछ पूर्व तक स्विट्जरलैंड घड़ियोंं के मामले मे विश्व के प्रथम क्रम पर था। 1932 मे जापान के इसाक कोगा पहली बार घड़ियों मे क्वार्ज का सफल प्रयोग करने मे सफल हुये थे। यह स्विट्जरलैंड के लिये बहुत बड़े प्रतिमान स्थापन (Paradigm Shift) की आहट थी, जो उन्होने नहीं सुनी, नतीजतन स्विट्जरलैंड की घड़ियों के व्यापार को बहुत बुरा हश्र झेलना पड़ा। यदि अभी की बात करें तो वर्ष 1998 तक फोटो पेपर बनाने वाली कोडक कम्पनी दुनिया मे होने वाले फोटो पेपर की खपत का 85% बेचा करती थी। कम्पनी मे 1,70,000 कर्मचारी कार्य करते थे। क्या आपने 1998 मे यह सोचा भी था कि तीन वर्ष बाद आप कागज पर फोटो नहीं लेंगे। आज कम्पनी दीवालिया हो चुकी है। उनका व्यापार गायब हो चुका है। यह स्थितियां अचानक ही नहीं आई, 1975 मे डिजिटल कैमरे का आविष्कार हो चुका था, यह अलग बात है कि वह 10,000 पिक्सल का ही था, परन्तु मूर के सिद्धान्त के अनुरूप था। यद्यपि इसे काफी समय तक निराशा झेलनी पड़ी परन्तु कुछ समय पूर्व ही यह मुख्यधारा मे आ गया। आने वाले 10 वर्षों मे कोडक कम्पनी जैसा हाल बहुत सी कम्पनियों का होने वाला है। अभी लोग इसे समझ नहीं रहे हैं। यह सभी क्षेत्रों मे होने वाला है क्रत्रिम ज्ञान, स्वास्थ्य, कारों, शिक्षा, 3D प्रिन्टिंग, कृषि, रोजगार, स्वायत्ता आदि सभी क्षेत्र इससे प्रभावित होने वाले हैं।

आने वाले 5 - 10 वर्षों मे पारम्परिक उद्योगों को सबसे अधिक सॉफ्टवेयर प्रभावित करेगा। "ऊबर" मात्र एक सॉफ्टवेयर टूल है, वह दुनिया की सबसे बड़ी टैक्सी कम्पनी है परन्तु उसके पास कारें नहीं हैं। Airbnb विश्व की सबसे बड़ी होटल कम्पनी है परन्तु उसके पास बिल्डिंगें नहीं हैं।

क्रत्रिम ज्ञान - 

दुनिया को आदमियों से बेहतर कम्प्यूटरों ने समझा है। विश्व के सबसे बुद्धिमान ज्ञानियों, प्रोफेशनलों, विशेषज्ञों को कम्प्यूटर ने उम्मीद से 10 वर्ष पहले ही धराशायी कर दिया है। अमेरिका मे नये वकीलों को काम नहीं मिल रहा है, क्योंकि IBM Watson द्वारा आपको अच्छी से अच्छी कानूनी सलाह सेकेन्डों मे , वह भी 90% सटीक मिल जाती है। आने वाले समय मे 90% कम वकीलों की आवश्यकता रह जायेगी। वह भी सिर्फ विशेषज्ञों की।

Watson कैन्सर का पता लगाने मे नर्सों की मदद कर रहा है । फेसबुक ने एक पेटर्न के आधार पर पहचानने की तकनीक विकसित कर ली है। अतः अब वह आदमी के चेहरे पहचानने मे आदमी से अधिक सक्षम व विश्वसनीय है।  वर्ष 2030 तक कम्प्यूटर मनुष्य से अधिक बुद्धिमान बन जायेगा।

निजी कारें -

वर्ष 2018 मे पहली बार लोगों के उपयोग के लिये स्वचलित कार आयेगी। वर्ष 2020 के आसपास कार उद्योग का विघटन प्रारम्भ हो जायेगा। आप को कार खरीदने की जरूरत ही नहीं होगी। आप फोन पर कार बुलायेंगे, कार आपके सामने होगी, आपको गन्तव्य तक पंहुचा देगी। आपको उसे पार्क करने की जहमत नहीं उठानी है, आप तो बस जितने किलोमीटर चल कर आये हैं, उसका भुगतान कर दीजिये। कारों के मामले मे यह बहुत उपयोगी होगा। हमारे बच्चों को ड्राइविंग लाइसेन्स की जरूरत ही नहीं होगी, वह कभी कार खरीदने वाले ही नहीं हैं। इससे शहरों मे बदलाव दिखेगा, क्योंकि हमे 90 से 95% कम कारों की जरूरत रह जायेगी। हम कार पार्किंग वाले स्थानों पर पार्क विकसित कर सकेंगे। इसके अतिरिक्त विश्व मे प्रतिवर्ष 1.2 मिलियन लोग सड़क दुर्घटना के शिकार होते हैं। वर्तमान मे 1 मिलियन किमी पर सड़क दुर्घटना होती है, स्वचलित कारों से यह 10 मिलियन कि मी तक हो जायेगी और हम प्रतिवर्ष लाखों लोगों की जान बचाने मे सक्षम होंगे।

इसके कारण अधिकतर कार कम्पनियां दीवालिया हो जायेंगी। पारम्परिक कम्पनियां नई सोच के सहारे अधिक बेहतर कार तो बना सकती हैं, परन्तु तकनालाजी कम्पनियां (टेसला, एप्पल, गूगल) क्रान्तिकारी कदम उठाकर पहियों वाले कम्प्यूटर बनाने लगेंगे। बड़ी बड़ी कार कम्पनियों के इन्जीनियर टेसला से बुरी तरह डरे हुये हैं।

बीमा कम्पनियां -

बीमा कम्पनियों के बहुत बुरे दिन आाने वाले हैं। दुर्घटनाओं के बिना बीमा 100 गुना से अधिक सस्ता हो जायेगा। कार बीमा जैसे घटक तो गायब ही हो जायेंगे।


भूमि भवन बिक्री व्यापार -

इस क्षेत्र मे भी परिवर्तन होगा। जब आप यात्रा के समय तथा घर से काम करने मे सक्षम होंगे तो आप किसी अच्छे  स्थान पर थोड़ा अधिक दूर रहने से परहेज नहीं करेंगे। 2020 तक विद्युत कारें मुख्यधारा मे आ जायेंगी। अतः शहरों मे भी कम शोर, कम प्रदूषण होगा। बिजली बहुत ही सस्ती व स्वच्छ हो जायेगी । सोलर विद्युत उत्पादन की परिपूर्णता का ग्राफ 30 वर्षों का है परन्तु उसका प्रभाव अभी से दिखने लगा है। पिछले वर्ष विश्व मे सोलर बिजली उत्पादन ईकाइयों की स्थापना पारम्परिक बिजली उत्पादन ईकाइयों से कहीं अधिक की गई । सोलर ऊर्जा के कारण दामों मे इतनी अधिक कमी आयेगी कि 2025 तक सभी कोयला कम्पनियां व्यापार से बाहर होंगी।

बिजली के सस्ते उत्पादन से ही पानी की प्रचुर मात्रा तथा उसके अलवणीकरण की प्रक्रिया जुड़ी है। वर्तमान मे अलवणीकरण प्रक्रिया मे 2 किलोवाट प्रति घंटा बिजली प्रत्येक क्यूबिक मीटर के लिये लगती है। हमारे पास पानी की कमी नहीं है, स्वच्छ पीने योग्य पानी की कमी अवश्य है। सोचिये आपको उतना पानी बिना किसी लागत के मिल जाये,  जितना आप चाहते हैं।


स्वास्थ्य - 

ट्राईकार्डर - X. का मूल्य इस वर्ष घोषित कर दिया जायेगा। कई कम्पनियां रोग पहचानने वाले उपकरण बनाने लगी हैं। स्टार ट्रैक कम्पनी के उपकरण का नाम ट्राईकार्डर है। यह हमारे फोन के साथ मिलकर काम करेगा। यह हमारे रैटीना स्कैन, रक्त नमूने तथा सांसों को लेकर, उनका विश्लेषण 54 जैवचिन्हों के सहारे करेगा, जिससे रोग की पहचान लगभग हो जायेगी । यह सस्ता तो होगा साथ ही पृथ्वी पर रहने वाले सभी को विश्वस्तरीय सर्वोत्तम   दवा लगभग मुफ्त मे प्राप्त हो जायेगी ।


3D प्रिन्टिंग -

10 वर्षों के अन्तराल मे विश्व के सबसे सस्ते 3D प्रिन्टरों के दाम 18000 डालर से 400 डालर पर आ टिके हैं। साथ ही इनकी स्पीड भी काफी बढ़ी है। सभी प्रमुख कम्पनियां 3D प्रिन्टिंग शूज बना रही हैं। अब स्पेस स्टेशनों पर भी 3D प्रिन्टरों की मदद से उतने पुर्जों की जरूरत नहीं रह जायेगी, जितनी हुआ करती थी। वर्ष के अन्त तक स्मार्टफोनों मे 3D स्कैनिंग की सुविधा आने लगेगी। आप अपने पैर का 3D फोटो भेज दीजिये और घर पर अपनी नाप का जूता मंगवाइये। चीन मे एक 6 मन्जिला भवन का पूरा 3D. चित्र लिया गया है। 2027 तक जितनी भी वस्तुओं का उत्पादन होता है, उनके 10% का 3D फोटो उपलब्ध होगा।


व्यापार के अवसर -

आप स्वयं से पूछिये भविष्य मे आप किस तरह का अवसर चाहते हैं, यदि आप को लगता है कि आप वह प्राप्त कर सकते हैं,  तो सोचिये कि आप कैसे उसे जल्दी से जल्दी पा सकते हैं। यदि आप उसे अपने फोन की मदद से नहीं प्राप्त कर सकते हैं, तो भूल जाइये। 20 वीं शताब्दी मे सफलता प्राप्ति का कोई भी विचार 21 वीं शताब्दी मे सफल नहीं होगा ।

रोजगार -

आने वाले 20 वर्षों मे 70 से 80% रोजगार समाप्त हो जायेंगे। यद्यपि बहुत से नवीन रोजगार भी उत्पन्न होंगे। परन्तु यह स्पष्ट नहीं कि इतने कम समय मे पर्याप्त रोजगार उपलब्ध हो सकेंगे।

कृषि -

आने वाले समय मे खेतों मे शत प्रतिशत रोबोट काम करेंगे। तीसरी दुनिया के किसान अपने खेतों मे प्रबन्धकों की तरह काम करेंगे। नमी वाले वातावरण मे फसल उगाने की तकनीक एयरोपोनिक्स (Aeroponics) के कारण बहुत ही कम पानी लगेगा। पहली क्रत्रिम बछड़े के मांस से बनी "पेट्रीडिस" अब उपलब्ध है और यह गाय द्वारा पैदा किये बछड़े के मांस से बनी डिस से 30% सस्ती है। वर्तमान मे 30% कृषि कार्यों मे गायों  की आवश्यकता पड़ती है। कल्पना कीजिये यददि हमे उसकी जरूरत ही नहीं रहे । बहुत से अनुुसन्धान चल रहे हैं, जो बाजार मे शीघ्र ही अनेको जीवों से उपलब्ध होने वाले प्रोटीन उपलब्ध करा देंगे, जिनमे मांस से अधिक प्रोटीन होगा। यह वैकल्पिक उद्गम वाले प्रोटीन के नाम से जाने जायेंगे। क्योंकि आज भी बहुत से लोग कीड़ों को खाने से सहमत नहीं हैं।

MOODIES नामक एेप प्रचलन मे है, जो बताता है आप किस मूड मे हैं। 2020 तक इस तरह के एेप भी आ जायेंगे जो आपके चेहरे के भावों से बता देंगे, आप सच बोल रहे हैं या झूठ। आप कल्पना कीजिये टीवी पर राजनीतिक बहस चल रही है, पता चल रहा है कौन नेता झूठ बोल रहा है।

आयु -

वर्तमान मे औसत आयु 3 माह प्रतिवर्ष के आधार पर बढ रही है। 4 वर्ष पूर्व तक जीवन 79 वर्षों के आसपास होता था। अब यह 80 वर्ष हो गया है। यह अपने आप बढ़ रहा है। अनुमान है 2036 तक प्रतिवर्ष 1 वर्ष से भी अधिक आयु बढ़ने लगेगी। हम सभी एक लम्बे समय तक जीवित रहेंगे। सम्भवतः 100 से भी अधिक वर्षों तक।


शिक्षा -

आज अफ्रीका तथा एशिया मे भी सस्ते स्मार्टफोन 5 से 6 हजार रूपयों मे उपलब्ध हैं। 2020 तक 70% लोगों के पास स्मार्टफोन होगा। जिसका अर्थ है प्रत्येक व्यक्ति किसी न किसी प्रकार की विश्वस्तरीय शिक्षा से जुड़ा होगा। प्रत्येक बच्चा खान एकडमी का प्रयोग कर सकता है, वह सब सीख समझ सकता है, जो प्रथम विश्व के देशों के रहने वाले बच्चे सीखते समझते हैं। सामग्री के सभी भाषाओं मे अनुवाद के कारण यह सभी को सहज उपलब्ध रहेगी।

Saturday, 30 April 2016

'कोलस्ट्राल' सदी का सबसे बड़ा घोटाला ?

अमेरिका का कृषि विभाग प्रत्येक 5 वर्षो मे खाद्य पदार्थों के सम्बंध मे दी गई अपनी सूचनाओं का पुर्नमूल्यांकन करता है। अपनी वर्ष 2015 की सूचना मे इसने कहा है कि DGAC अपनी उस सूचना को वापस ले लेगी जिसमें उसने अमरीकियों को प्रतिदिन 300 mg से अधिक कोलस्ट्राल का सेवन न करने की सलाह दी थी। विस्तृत जांच के बाद अब जो प्रमाण सामने हैं उनके अनुसार अधिक कोलस्ट्राल युक्त खाद्य पदार्थों तथा सीरम(रक्त) कोलस्ट्राल मे कोई सम्बंध नही है। अमेरिकन हैल्थ असोसिएसन व अमेरिकन कालेज आफ कार्डियोलोजी की यह अनुशंसा है। इससे स्पष्ट हो गया है कि 1970 से  हृदय रोगों से बचने के लिए अधिक कोलस्ट्राल वाले खाद्य पदार्थों के बारे मे यह मानना गलत था कि इनसे रक्त प्रवाह बाधित होता है। अब अंडे, मक्खन, वसायुक्त डेयरी उत्पाद, मूंगफली, नारियल तेल व मांस आदि को सुरक्षित मान लिया गया है। लोगों को खाद्य पदार्थों के बारे मे सलाह देने वाली समिति अब कोलस्ट्राल छोड़ चीनी (sugar) को चिन्तित करने वाला मानकर, इस पर ध्यान केन्द्रित करेगी।

हृदय रोग विशेषज्ञ डा स्टीवन निसेन का कहना है - "यह सही निर्णय है। दशकों तक हमें खाद्य पदार्थों के बारे मे भ्रामक जानकारी दी गई। जब हम अधिक कोलस्ट्राल वाला भोजन करते हैं, तो हमारे शरीर को कोलस्ट्राल कम मात्रा मे बनाना पडता है। इसके विपरीत कम कोलस्ट्राल युक्त भोजन करने पर हमारे लीवर व शरीर को अधिक कार्य करना पडता है।"

प्रतिदिन के आवश्यक मेटाबोलिज्म के लिये हमारे शरीर को 950 mg कोलस्ट्राल की जरुरत पडती है, जिसे हमारा लीवर बनाता है। हम जो भोजन करते हैं उससे मात्र 15% कोलस्ट्राल ही मिलता है। यदि हम कम वसा वाला भोजन करेंगे तो हमारे लीवर को 950 mg कोलस्ट्राल प्राप्ति के लिये अधिक कार्य कर क्षतिपूर्ति करनी पडती है।


हमारे शरीर मे कोलस्ट्राल लीवर द्वारा ही बनाया जाता है। हमारा मस्तिष्क मूल पदार्थ कोलस्ट्रोल से ही बना है। धमनियों के सैलों को क्रियाशील रखने के लिये यह जरुरी है। कोलस्ट्राल स्टीरयाड, हार्मोन्स, एस्टोजन सहित, टेस्टोस्टीरिआन तथा कोर्टीस्टीरियाड की उत्पत्ति का आधार है। शरीर मे कोलस्ट्राल का अधिक मात्रा मे पाया जाना, इस बात का संकेत है कि व्यक्ति के लीवर का स्वास्थ्य उत्तम है।

डा जार्ज वी मान M.D. associate director of the Framingham study for the  incidence and prevalence of cardiovascular disease (CVD) and its risk factors कहते हैं - भोजन मे सेचुरेटेड फैट तथा कोलस्ट्राल कोरनरी तथा हृदय रोग का कारण नहीं। इस बात को मानना इस सदी की सबसे बडी भूल है। विशेषज्ञ कहते हैं कि LDL या HDL कुछ भी नहीं, कोलस्ट्राल शरीर मे ब्लाकेड के लिए जिम्मेदार नहीं।

यह पहली बार नहीं हुआ है। विशेष रुप से भारतीय खानपान को गलत ठहरा कर बाजार मे बहुत से उत्पाद उतार कर अरबों रूपयों की चोट ग्राहकों को दी गई। एक बार लोगों को उन उत्पादनों को बाजार मे प्रचलित होने दिया, ग्राहकों को उनकी आदत लग गई कि फिर विशेषज्ञों की राय के द्वारा उस निष्कर्ष को पलट दिया गया। यहाँ भी यही हुआ है, भारत मे जिन खाद्य पदार्थों को स्वास्थ्यवर्धक माना जाता था। सभी को कोलस्ट्राल के नाम पर किनारे कर, नवीन नवीन कम कैलोरी वाले पदार्थों को सामने लाया गया। कोलस्ट्राल देश के स्वास्थ्य क्षेत्र मे खलनायक बनकर उभरा और उसने डाक्टरों, दवा उत्पादकों, शरीर मे लगाये जाने वाले कृत्रिम यन्त्रों आदि सभी की व्यापारिक परिभाषायें बदली। इतने दिन दुनिया को बेवकूफ बनाकर खरबों रुपये इधर उधर करने के बाद अन्ततः मुहर भारतीय मनीषियों द्वारा बताये खान पान के उसी व्यवहार पर ही लगी, जो हमारे देश मे सदियों से प्रचलित था। यह उन लोगों के लिये सोचने का विषय है जो अपने देश समाज से जुडी हर वस्तु रीति रिवाज को पिछडा मानते हैं, परन्तु अन्ततः उसी को मानने  को बाध्य होते हैं।

Thursday, 21 April 2016

क्यों नहीं थम रहे किसानों के आँसू ?

एड्मस्मिथ को भी अधिक से अधिक धन उत्पन्न करने की संकल्पना देते समय शायद यह बात मालूम नहीं होगी कि आने वाले समय मे उत्पादर्नो का  भी वर्गीकरण किया जायेगा, यह वर्गीकरण उत्पादन के माध्यम से धन कमाने की सूची से कुछ उत्पादनों को बाहर का रास्ता दिखाकर उनकेे सिद्धान्त को चुनौती देगा। उत्पादनों का यह वर्गीकरण एक को मालामाल तथा दूसरे को कंगाल बनायेगा। औद्योगिक क्षेत्र तथा कृषि क्षेत्र के उत्पादनों का यही हाल है। कृषि क्षेत्र पर देश की 62 करोड़ जनसंख्य़ा की निर्भरता अर्थशास्त्र की इस समस्या के लिये गम्भीर स्थिति पैदा कर रही है। यही वजह है कि किसानों की आर्थिक स्थिति चरमराती जा रही है। हमारे देश की बहुसंख्य आबादी का यह आर्थिक आधार होने के कारण विस्फोटक स्थिति आती जा रही है।

कृषि क्षेत्र को स्वावलम्बी बनाने तथा उसकी प्रगति का नारा देकर हम उसकी औद्योगिक उत्पादनों पर निर्भरता लगातार बढाते चले गये। यद्यपि यह सच है कि कृषि क्षेत्र मे होने वाले अनुसन्धानों और तकनीक विकास|  के कारण हम इस क्षेत्र| की उत्पादन क्षमता बढाने मे सफल हुये। परन्तु इससे कृषि की उत्पादन लागत बहुत अधिक बढाने के साथ साथ हमने अपनी भूमि की उर्वरकता से भी अनेको स्थानों पर समझौता करना पड़ा है। इसके बावजूद हम आज तक न तो उत्पादनों की विशिष्टता के अनुसार भूमि चिन्हित कर पाये हैं, न ही किसान को समुचित आर्थिक आधार दे पाये। कृषि विकास की योजनाओं मे निवेश करते समय ध्यान इस बात पर दिया जाना था कि कृषि कार्य मे प्रयोग किये जाने वाले संसाधनों की कीमतें बढने के साथ किसानों की आर्थिक स्थिति भी इतनी मजबूत हो कि वह इन संसाधनों की बढती कीमतों का बोझ उठाने मे सक्षम हो। हमने कृषि मे प्रयोग किये जाने वाले  संसाधनों की कीमतें तो बेइन्तिहा बढा दी, परन्तु किसानों को बीच मझधार मे छोड़ दिया, जिसका नतीजा सामने है।

आज २१वीं सदी मे भी देश की कुल आबादी का ५२ प्रतिशत हिस्सा आय के लिये कृषि पर आश्रित है। यदि हम आजादी के बाद के ६७ वर्षों के कालखंड में बनाई विभिन्न योजनाओं मे कृषि को दिये प्रश्रय पर द्रष्टि डालें तो निराशा ही हाथ लगती है। अब यह योजनाकारों का कौन सा गणित था कि देश मे प्रतिवर्ष १ लाख ८० हजार बच्चों के जन्म लेने की परिस्थितियां सामने होने के बावजूद, न तो हमने कृषि के लिये अधिक भूमि संरक्षित की, न ही कृषि योग्य भूमि के लिये आवश्यक संसाधन जुटाने के पर्याप्त प्रयास किये। उल्टे हमने वर्ष २००७ मे खेती के लिये उपलब्ध १७ करोड़ हैक्टेयर भूमि मे से ५करोड़ हैक्टेयर भूमि उद्योगपतियों को SEZ बनाने के लिये देकर, खेती योग्य भूमि घटाकर १२ करोड़ हैक्टेयर कर ली। विडम्बना देखिये,इसमे भी मात्र ५ करोड़ हैक्टेयर भूमि पर ही सिंचन सुविधायें उपलब्ध हैं, शेष ७ करोड़ हैक्टेयर भूमि पर तो आज भी खेती भगवान भरोसे हो रही है। इन स्थितियों मे किसान और गांवों को जहां जि हालत मे होना था वहीं पर हैं।

देश मे किसान आत्महत्या छूत की बीमारी की तरह फैलती जा रही हैं। पहले विदर्भ तक सीमित यह| बीमारी आज मराठवाड़ा, बुन्देलखंड, आन्ध्र प्रदेश, कर्नाटक और तेलंगाना तक पांव पसार चुकी है। इन आत्महत्याओं के कारणों का विश्लेषण करने पर जो बात सामने आती है। वह किसी भी लोकतान्त्रिक देश का सिर शर्म से झुकाने के लिये पर्याप्त है। आन्ध्र प्रदेश उच्च न्यायालय मे इससे सम्बन्धित जो तथ्य सामने आये हैं, उनके अनुसार आन्ध्र मे ही अगस्त २०१५ से फरवरी २०१६ के बीच कम से कम ३४१ किसानों ने आत्महत्यायें  की हैं। रितु स्वराज वेदिका (RSV) नामक संस्था द्वारा किये गये सर्वेक्षण मे यह बात साामने आई है। संस्था के कार्यकर्ताओं द्वारा उन परिवारों से मिलने के बाद, जिनममे आत्महत्यायें हुई हैं, जो तथ्य सामने आये हैं, वह किसी भी लोकतान्त्रिक देश व समाज को शर्मशार करने के लिये पर्याप्त है। यह कैसी अर्थव्यवस्था है जो धनी उद्योगपतियों को ४ लाख करोड़ रुपये हजम करने केे लिये दे देती है, परन्तु गरीब किसान को अपनने पास तक फटकने नहीं देती। सर्वे मे ४० किसान परिवारों से सम्पर्क करने पर मालूम हुआ कि सिर्फ ५ परिवारों को ही बैंकों ने कर्ज दिया था, और यह कि उन पर ४.२७ लाख रुपये  का औसत कर्ज था। ३५ किसान साहूकारों से कर्ज लेने और २४ से ६० प्रतिशत तक ब्याज चुकाने को मजबूर थे। ४० मे से ३९ लोगों द्वारा आत्महत्या करने का कारण सूखे आदि के कारण फसल नष्ट होना और समय पर सरकारी सहायता न मिलना है। 

वर्तमान सरकार के बजट को किसानों का बजट बताकर इसकी बहुत सराहना हुई। यह बात ही इस बात को सिद्ध करने के लिये पर्याप्त है कि पिछले दशकों मे किसान और कृषि की कितनी बुरी तरह उपेक्षा की गई। जबकि इस बजट मे किसानों के लिये योजनाओं पर धन उड़ेलने जैसी कोई बात नहीं है। कृषि क्षेत्र को इस बजट मे मात्र १२,४२९ करोड़ की रकम आवंटित की गई है, जिसमे ११,६५७ रु कृषि और ७७२ करोड़ रुपये सिंचन के लिये हैं। अन्दाज इसी से लग जायेगा कि देश की ६२ प्रतिशत जनसंख्या के हिस्से मे आई इस रकम की ३२ गुना  रकम तो उद्योग सिर्फ बैंकों से लेकर डकार चुके हैं, इसमें यदि उन्हे उपलब्ध कराये गये अन्य संसाधनों को भी जोड़ दिया जाये तो यह रकम १०० गुना से भी ऊपर पँहुच जायेगी। इस बात मे सन्देह नहीं कि इन ६७ वर्षों मे सरकारों ने यदि इस क्षेत्र मे उचित निवेश किया होता तो हम इजरायल, आस्ट्रेलिया व कनाडा जैसे देशों के समकक्ष होते। देश मे रोजगार, शहरी क्षेत्रों की ओर पलायन, ग्रामीण जीवन स्तर, किसान आत्महत्या जैसी अनेको समस्याओं के मकड़जाल मे न उलझे होते।

विडम्बना ही है कि देश मे एक लीटर पानी एक किलो गेँहू से अधिक दाम पर बिक रहा है। वह एक किलो गेँहू जिसे पैदा करने के लिये किसान न जाने कितना खून पसीना बनाकर बहा देता है और यह सरकार, समाजसेवियों, अर्थशशास्त्रियों, योजनाकारों मे किसी को दिखाई नहीं दे रहा है। देश के अच्छे दिनों की चाबी इसी पहेली के हल मे है। परन्तु इसका हल वर्तमान अर्थनीति के पास नहीं है, क्योंकि उसे तोड़ मरोड़ कर इतना विकृत किया जा चुका है कि सुधार सम्भव नहीं । इसके लिये हमे वैकल्पिक मार्ग तलाशनाा होगा। वर्तमान मे समूचा विश्व इस असमानता की अर्थनीति की जकड़न मे छटपटा रहा है।

Sunday, 10 January 2016

GST - बेगानी शादी मे अब्दुल्ला दीवाना (ग्राहक)

GST अर्थात गुड्स व सर्विस टैक्स आजकल सुर्खियों मे है । संसद इसे पारित कर दे, यह लागू हो जाये तो देश को अलादीन का चिराग मिल जाये। तिलमिलायी कांग्रेस इस अलादीन के चिराग को सरकार के हाथ से दूर रखना चाहती है। इसलिये जब तब बनती दिखती बात अन्त मे बिगड ही जाती है।


GST मे अनेको हिस्सेदार हैं केन्द्र सरकार, राज्य सरकारें, उद्योग, वर्तमान मे टैक्स वसूलने वाले विभिन्न विभाग और जिससे GST मे ली जाने वाली रकम की एक एक पाई वसूली जानी है वह ग्राहक। सभी हिस्सेदारों ने अपना अपना नफा नुकसान अच्छी तरह देख समझ लिया है। यही नहीं अपने हित साधने वाली बातें मनवा भी ली हैं।  सिर्फ ग्राहक को छोडकर, उसे नहीं मालूम क्या होने वाला है, कैसे उसके दिन बहुरेंगे। बस उसे तो सब बेगानी शादी का दीवाना अ्ब्दुल्ला बनाने पर तुले हैं।

ग्राहक आन्दोलन का कार्यकर्ता होने के कारण यह बात तो समझ आती है कि GST लागू होते ही अनेको वस्तुओं सेवाओं पर लगने वाले टैक्स की रकम जो अभी 8 से 12% है 18% हो जायेगी, परन्तु इसके लागू होने से ग्राहक को मिलने वाला कोई एक लाभ भी मुझे दूर दूर तक नजर नहीं आता। देश के 125 करोड ग्राहक फिर भी GST का स्वागत करने को तैयार हैं। बशर्ते सरकार घोषणा करे कि वह उत्पादनों और सेवाओं की उन कीमतों को सार्वजनिक करेगी जिन पर GST वसूला जायेगा।

Friday, 16 October 2015

दालें दुर्लभ वस्तुओं मे शामिल

भारतीय दलहन शोध संस्थान के अनुसार वर्ष 2030 तक देश की जनसंख्या 1.6 बिलियन पँहुच जायेगी और उसे 32 मिलियन टन दालों की आवश्यकता पडेगी। इस लक्ष्य के अनुसार देश को प्रतिवर्ष दलहन के उत्पादन मे 4.2% बढोत्तरी करने की जरूरत है। देश मे दलहन उत्पादन का अब तक का इतिहास बहुत निराशाजनक रहा है। पिछले 40 वर्षों मे दलहन का उत्पादन देश मे 1% वार्षिक से भी कम गति से बढा है। जबकि देश की जनसंख्या इससे दुगनी गति से बढी है।

दशकों से हमारे नेताओं द्वारा इस क्षेत्र की उपेक्षा ही वर्तमान हालातों की जिम्मेदार हैं। बलराम जाखड और शरद पवार जैसे कृषि मन्त्री यह योजनायें तो बनाते रहे कि हम अफ्रीका, बर्मा और उरूग्वे जैसे देशों मे दाल की खेती करवाकर वहां से दाल आयात करें। परन्तु उन्होने यह कभी नहीं सोचा कि देश का किसान दाल की खेती से क्यों भाग रहा है। उसे कैसे प्रोत्साहित किया जाये। दालों का जोत क्षेत्र कैसे बढाया जाये। दालों की प्रति हेक्टयर उपज बढे, इसके लिये क्या किया जाये। अतः हम आज जिस स्थिति मे हैं, उसके बीज हमने वर्षों पूर्व बोये थे। मजे की बात यह कि दालों का उपभोग करने वाला बडा देश होने के बावजूद हम इसके महत्व को नहीं समझे, आस्ट्रेलिया समझ गया, 1970 मे हमसे 400 ग्राम दाल के बीज लेकर गया। 10 वर्ष बाद उसका दलहन का जोत क्षेत्र था 90 लाख हेक्टयर, आज वह हमारे देश को दाल निर्यात कर रहा है। मालाबी जैसे छोटे देश भी हमे 5000 टन दाल आयात करने की स्थिति मे हैं। ।

यद्यपि दालों के लिये हमारा देश विश्व का सबसे बडा उत्पादक, उपभोक्ता व आयातक है। दुनिया की कुल दाल की खेती के एक तिहाई भाग मे हम दाल की खेती करते हैं। दुनिया के दाल उत्पादन का 20 प्रतिशत उत्पादन हमारे यहां होता है। परन्तु हम अपनी जरूरत से काफी पीछे हैं और हमने इसपर उचित ध्यान भी नहीं दिया, क्योंकि आजादी के बाद भी हमारे शासक नेता अंग्रेजों की मानसिकता मे जी रहे थे। अंग्रेज दाल का उपयोग करते नहीं हैं, इसे दूसरे दर्जे का अनाज मानते हैं। हमारे नेताओं ने भी यही किया दाल को दूसरे दर्जे का अनाज मानकर इसके विकास पर समुचित ध्यान ही नहीं दिया। गेंहू - चावल मे ही लगे रहे, देश मे दाल की कमी को आयात के सहारे पूरा करते रहे।

देश मे दाल उत्पादन की तरफ उचित ध्यान न देने के कारण किसान इस फसल की ओर आकर्षित नहीं हुये क्योंकि लम्बी अवधि की फसल होने साथ इसमे कीटों व बीमारियों का खतरा अधिक था, अच्छे बीजों की कमी भी थी, दूसरे किसान को बाजार मे दलहन की फसल के खरीदार भी नहीं मिलते थे। 2008 से सरकार ने दालों के समर्थन मूल्य की घोषणा जरूर शुरू कर दी, परन्तु सरकार द्वारा खरीद न करने के कारण किसान को व्यापारियों पर ही आश्रित रहना पडता है। इन कठिनाईयों की तरफ सरकार ने ध्यान नहीं दिया, किसान दलहन की फसलों से किनारा करते रहे। नतीजतन 1980 - 81 मे 22.46 मिलियन हेक्टयर मे 10.63 मिलियन टन के उत्पादन को 35 वर्ष बाद 2013 - 14 मे हम 19.7 मिलियन टन तक ही पँहुचा पाये। सरकार द्वारा इस ओर देर से ध्यान देने के कारण हम काफी पिछड चुके हैं। कुछ दिन पहले ही चने और तुवर की 100 दिनों मे तैयार होने वाली फसल खोजने मे हमे सफलता मिली, दक्षिण भारत के लिये JG-11 नाम की किस्म भी तैयार की गई है। परन्तु 760 किलो प्रति हेक्टयर की  पैदावार को अन्य देशों की तरह 1200 किलो प्रति हेक्टयर तक ले जाना शेष है। संक्षेप मे कहें तो दलहन उत्पादन के लिये देश मे अनुसन्धान, किसानों को प्रोत्साहन, बुआई के क्षेत्र को बढाना, पैदावार को बढाना आदि महत्वपूर्ण चुनौतियां देश की सरकार के सामने हैं।

वर्तमान बाजार को देखें तो अनियमित वर्षा ने  30% फसल बरबाद कर दी। 2013-14 मे 19.25 मिलियन टन की तुलना मे 17.3 टन दलहन का ही उत्पादन हुआ। दूसरे देशों मे भी फसल खराब हुई है, जिससे कीमतों मे 20 से 30 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। डालर की तुलना मे रूपये की गिरावट ने स्थिति को और बिगाडा है। यद्यपि सरकार द्वारा आयात की गई 10,000 टन तुवर, उडद दाल प्रक्रिया मे है। 5000 टन दाल और आयात की जा रही है। कठिन हालातों के बावजूद इस तरह की परिस्थितियों का अनैतिक लाभ उठाने वालों की भी कमी नहीं है। जमाखोरों द्वारा मुनाफाखोरी के लिये माल बाजार से गायब करने के चलते हालात अधिक खराब हुये हैं। सरकार को जमाखोरों पर कठोर कार्यवाही करने की जरूरत है, तभी ग्राहक को थोडी बहुत राहत मिलनी सम्भव है। वरना ग्राहक की दाल गलनी कठिन है।

Thursday, 15 October 2015

सावधान रहकर ऑनलाईन मार्केटिंग का लाभ उठायें

अॉन लाईन शापिंग कम्पनियों  की आजकल बाढ आई हुई है। घर पर बैठकर फुर्सत से खरीदारी वह भी दुनिया भर के ब्रान्डों की, बाजार से सस्ते दामों पर, घर पँहुच सेवा और न जाने क्या क्या। आज के  समय मे यदि आप अॉनलाईन शॉपिंग से परिचित नहीं, अॉनलाईन शॉपिंग नहीं करते तो आप पिछडते जा रहे हैं। इस आधुनिक मार्केटिंग तकनीक का लाभ उठाने से वंचित हैं।

समय परिवर्तनशील है। जीवन के प्रत्येक क्षेत्र मे नये नये प्रयोग हो रहे हैं। एल्विन टॉफलर की 3rd वेव थ्योरी रंग ला रही है। अब तक के निर्धारित नियम व व्यवस्थायें ध्वस्त हो रही हैं, उनके स्थान पर नवीन व्यवस्थायें जन्म ले रही हैं। नये सिद्धान्त बन रहे हैं। जिनके चिन्ह हमे अपने आसपास प्रचुरता मे दिखाई देते हैं। हम किसी भी नयी  व्यवस्था को अपनाने से सिर्फ इसलिये मना नहीं कर सकते, क्योंकि अबसे पहले की व्यवस्था अलग तरह की थी। समाज, उत्पादन तथा बाजार मे जो paradigm shift हो रहा है, हमे उससे ताल जरूर मिलानी है। यह दीगर बात है कि हम उस नवीन व्यवस्था का कितना और कैसे उपयोग करते हैं। अतः ऑनलाईन मार्केटिंग का जड़ से विरोध करना बेमानी है।

बाजार मेे ग्राहक को उत्पादन मंहगे मिलने के सम्बन्ध मे अधिकतर अर्थशास्त्रियों का अभिमत बाजार मे बडी संख्या मे बिचौलियों का होना बताया जाता था। कहा जाता था इसीकारण बाजार मे उत्पादन अपनी उत्पादन लागत से बहुत अधिक दामों पर बिकता था।अॉन लाईन कम्पनियों ने एक बात तो स्पष्ट कर दी कि इसने व्यापारी या बिचौलियों को जो ग्राहकों को 9 रु की वस्तु 90रु मे बेचकर बेहिसाब लूट रहे थे, किनारे बैठाकर, ग्राहकों को अतिरिक्त लाभ का हिस्सेदार बना  दिया। बाजार मे सम्पत्तियां अत्यधिक मंहगी होने का लाभ भी ऑनलाईन कम्पनियों को मिला। जब तक यह लाभ ग्राहक को मिलता है, इसे लेेने मे कोई हर्ज नहीं। वैसे ऑनलाईन कम्पनियों मे भी यह विचार तेजी से पनप रहा है कि जो दिखता है वह बिकता है। इसलिये ऑनलाईन कम्पनियां बडे बडे शहरों मे अपने शो रूम खोलने परभी विचार करने लगी हैं। उनका यह भी मानना है कि इस प्रकार वह अपने ग्राहकों को और बेहतर सेवायें दे सकेंगी।

अॉन लाईन कम्पनियों ने उत्पादन मूल्य और विक्रय मूल्य के विशालकाय अन्तर को देश के सामने स्पष्ट कर दिया है। वस्तुओं की कीमतों मे बाजार और अॉन लाईन कम्पनियों मे विशालकाय अन्तर इसीलिये दिखाई देता है, क्योंकि उत्पादक उत्पादन लागत से बहुत अधिक कीमत एम आर पी मे लिखते हैं। टैक्स चोरी जैसी बातें अॉन लाईन व्यवसाय मे तथ्यहीन हैं। इतनी जगह लिखापढी होती है कि टैक्स  वसूलने वाले विभागों की ये आसान पकड मे हैं। ग्राहक कानून भी इन कम्पनियों पर पूरी तरह लागू है। ग्राहक उपभोक्ता फोरम मे जा सकता है।

परन्तु प्रत्येक चमकने वाली वस्तु जिस तरह सोना नहीं होती, उसी तरह थोडी सी असावधानी ग्राहक के लिये समस्या भी खडी कर सकती है। अत: ग्राहकों को इन कम्पनियों से खरीदारी करते समय अलग तरह की सावधानियां अपनाने व सतर्क रहने की आवश्यकता है।

१. बाजार की खरीदारी की तरह इसमे भी समय लगायें। सिर्फ उत्पादन की फोटो देखकर वस्तु न खरीदें।
२. कई बार देखा गया है कि वस्तु का चित्र ब्रान्डेड कम्पनी का होता हैै, परन्तु विवरण दूसरा लिखा होता है। अत: पूरा विवरण पढने के बाद, चित्र से उसे मिलाकर सुनिश्चित होनेो के बाद ही आर्डर दें।
३. वस्तु के साथ दी जानकारी को पूरा पढें, समझें। यदि फिर भी वस्तु के विषय मे कोई शंका है तो आर्डर देने से पूर्व कम्पनी से लिखकर पूछ लें।
४. किसी ब्रान्ड की वस्तु और उसके जैसी वस्तु मे बहुत अन्तर होता है। अत: like, type या as जैसे शब्दों के चक्र मे न उलझें।
५. वस्तु के मूल्य को आर्डर देने से पूर्व स्थानीय बाजार मे सुनिश्चित कर लें। अनेको बार वस्तु उसी दाम पर या सस्ती स्थानीय बाजार मे मिल जाती है।
६. जहां तक सम्भव हो payment on delivery option का उपयोग करें।
७. वस्तु सन्तोषप्रद न होने पर शिकायत तुरन्त करें।
८. आप जिस कम्पनी को आर्डर कर रहे हैं, उसके बारे मे अच्छी तरह समझ लें। आजकल बहुत सी नकली कम्पनियां भी धोखाधडी करने के लिये सक्रिय हैं।